विश्वविद्यालयों की ब्रांडिंग के युग में मौलिकता का प्रश्न
बाजार चालित नव उदारवादी व्यवस्था शिक्षण क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लेती है, तो यूनिवर्सिटीज अपनी 'ब्रांड' वैल्यू बेचने लगती हैं। यूं भी औपनिवेशिक काल की सोच के चलते मूल रिसर्च करने के बजाय नकल की प्रवृत्ति बढ़ी। एआई इंपेक्ट समिट...
बाजार चालित नव उदारवादी व्यवस्था शिक्षण क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लेती है, तो यूनिवर्सिटीज अपनी 'ब्रांड' वैल्यू बेचने लगती हैं। यूं भी औपनिवेशिक काल की सोच के चलते मूल रिसर्च करने के बजाय नकल की प्रवृत्ति बढ़ी। एआई इंपेक्ट समिट में गलगोटिया विवि की प्रोफेसर ने जो किया, उससे यह स्पष्ट होता है कि किसी नकल करने वाले देश के लिए मौलिक बनना आसान नहीं।
यकीन मानिए, मुझे हैरानी नहीं हुई जब मुझे पता चला कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने हाल ही में देश की राजधानी में हुई भारत एआई इंपेक्ट समिट में विवाद खड़ा कर दिया है। जी हां, प्रोफेसर नेहा सिंह को अपनी यूनिवर्सिटी की ‘उपलब्धि’ दिखाने के लिए झूठा दावा करने में ज़रा भी झिझक महसूस नहीं हुई। हां, हम सबने देखा कि किस प्रकार उन्होंने सरकारी टेलीविजन चैनल डीडी न्यूज़ को विवरण दिया—और वह भी उस किस्म की ‘चतुराई’ के साथ जो हम कॉर्पोरेट कंपनियों के ज़हीन सेल्समैन में देखते हैं— कि ‘ओरियन’ नाम का रोबोटिक श्वान यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस में विकसित किया गया है, जबकि कड़वा सच यह है कि इस रोबोट को चीनी रोबोटिक्स कंपनी, ‘यूनिट्री’ ने ईजाद किया है, और यह भारत में भी ऑनलाइन बेचा जाता है।
इसमें अचरज नहीं है क्योंकि हमारी पीढ़ी ने यूनिवर्सिटी के जिस आदर्श को संजोया था, वह भरभरा कर टूट चुका है। हमने सोचा था कि किसी यूनिवर्सिटी की पहचान उसकी व्यावहारिक सहभागिता, अर्थपूर्ण अनुसंधान, आलोचनात्मक विचार, नैतिक संवेदनशीलता और सबसे ऊपर, शिक्षण की गरिमा से जानी जाएगी। एक यूनिवर्सिटी, जैसा कि हम मानते हैं, वह गुणवत्ता में किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान, शॉपिंग मॉल या विज्ञापन एजेंसी से अलग जगह होती है। लेकिन फिर, हम एक बिल्कुल अलग समय में जी रहे हैं। जैसे-जैसे बाजार चालित नव उदारवादी मशीनी तार्किकता शिक्षण क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लेती है, शिक्षा पूरी तरह से व्यापार बन जाती है, आलोचनात्मक विमर्श बलि चढ़ जाता है, छात्र उपभोक्ता बनकर रह जाता है और अध्यापक सेवा प्रदाता की भूमिका निभाने लगता है।
कोई हैरानी नहीं कि एक यूनिवर्सिटी भी अपनी ‘ब्रांड’ वैल्यू बेचने लगी हैं -जैसे कोई कंपनी डिटर्जेंट पाउडर बेचती हो और बेचे जाने वाले अपने उत्पाद के फायदों के बारे में हर तरह के झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर दावे करे। असल में, रोबोटिक्स, डेटा साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस- ये फैंसी ‘उत्पाद’ हैं जिन्हें नवउदारवादी यूनिवर्सिटी रणनीतिक विज्ञापनों और बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों के ज़रिए बेचना चाहती है। इसलिए अगर कोई यूनिवर्सिटी एआई के क्षेत्र में अपनी उपलब्धि के बारे में झूठे दावे करती हो तो आपको और मुझे हैरानी क्यों होनी चाहिये? एक प्रकार से, प्रोफ़ेसर नेहा सिंह को दोष नहीं दिया जाये क्योंकि आखिरकार वे खुद एक ऐसी संस्कृति का उत्पाद हैं जो यूनिवर्सिटी को लाभ कमाने वाला एक धंधा, एक प्रोफ़ेसर को जन संपर्क एजेंट और छात्र अथवा अभिभावक को एक संभावित ग्राहक की तरह लेता है।
भले ही गलगोटिया यूनिवर्सिटी फिलहाल खबरों में है, लेकिन सच तो यह है कि एक यूनिवर्सिटी को ‘ब्रांड’ के तौर पर बेचने का यह काम अब आम बात है। और शिक्षा के इस किस्म के सरेआम व्यवसायीकरण को ‘रैंकिंग’ की राजनीति और आगे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है। सड़क किनारे लगे बिलबोर्ड या चमकदार पत्रिकाओं एवं अख़बारों में दिए भव्य विज्ञापन देखिए, तो आप आसानी से गौर कर सकते हैं कि कैसे इन सभी संस्थानों को ‘टॉप रैंकिंग यूनिवर्सिटी’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।
और ऐसी रैंकिंग एजेंसियों की कोई कमी नहीं है जिनकी सेवाएं ये यूनिवर्सिटियां निरंतर लेती रहती हैं और आमंत्रित करती हैं। और इन यूनिवर्सिटी की यत्नपूर्वक गढ़ी गई छवि अक्सर इनकी उपलब्धियों और सबसे बढ़कर, इनके ‘प्रोडक्ट’ (छात्रों) को, गूगल, इंफ़ोसिस, विप्रो, अमेज़न वगैरह से मिलने वाले ‘पैकैज’ के बारे में हर तरह के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों से भरी होती हैं।
समझ नहीं आता कि हंसा जाये या रोया जाये, जब पाते हैं कि कोई यूनिवर्सिटी इस किस्म के शानदार विज्ञापन से खुद को ‘दुकान’ के तौर पर बेच रही होती है, मसलन, ‘यूनिवर्सिटी ने वर्ल्ड क्यूएस यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स: एशिया 2026 में हासिल किया एक और मील का पत्थर... दक्षिणी एशिया में 116वें और पूरे एशिया में 454वें पायदान पर रखा गया है... डिग्री लेने वाले 98 प्रतिशत विद्यार्थियों ने टॉप की कंपनियों में नौकरी पाई; 5.4 लाख रूप औसत सालाना पैकेज; और उच्चतम वेतन 1.5 करोड़ रुपये वार्षिक ‘।
इस किस्म के माहौल में, कोई प्रोफेसर सच की तलाश करने वाला नहीं हो सकता; उसे भी उस यूनिवर्सिटी की ‘ब्रांड वैल्यू’ के बारे में झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने पड़ते हैं जिसने उसे नौकरी पर रखा है। प्रोफेसर नेहा सिंह की मानसिक उलझन समझी जा सकती है। इसके अलावा, ज़िंदा रहने के लिए, इन तमाम शिक्षा दुकानों को लगातार सत्तारूढ़ सरकार को संतुष्ट करना पड़ता है। यह मत भूलिए कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी को, जैसा कि खबरें बताती हैं, एआई प्रदर्शनी हाॅल में चार आईआईटी को कुल मिलाकर मिले बूथ से भी बड़ा बूथ मिला था। और विशेष तौर पर जब हमें बताया जाता है कि भारत को ‘विश्वगुरु’ होने के नाते आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस में पीछे नहीं रहना चाहिए- यह तकनीकी-आदर्शवाद का नवीनतम ब्रांड है जिसे कॉर्पोरेट अरबपति बेचने के लिए बेकरार हैं- तो शायद गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने सत्तारूढ़ सरकार को खुश करने के लिए सारी हदें पार कर दीं और, विडंबना यह कि सरकार को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा। वास्तव में, यह देश में राजनीति और शिक्षा की हालत पर एक दु:खद टिप्पणी है।
इसी प्रकार, मान लीजिए, एक चीनी रोबोटिक श्वान को भारतीय आविष्कार के तौर पर दिखाने की यह अजीब इच्छा यह भी दर्शाती है कि हम भारत को एक नकलची देश में बदलने में कभी शर्म महसूस नहीं करते। शायद, हम अभी तक अपनी चेतना को औपनिवेशिक काल की मानसिकता से उबार पाने में सफल नहीं हो पाए। आज़ादी के बाद के भारत में भी, ‘विकसित’ पश्चिम हमारे लिए सकरात्मक मानक बिंदु के तौर पर था। मसलन, अपनी विशिष्ट शिक्षा संस्कृति को बेहतर बनाने और अपने संस्थान उनके जैसे बनाने, जो आत्मविश्वास से भरपूर हों और स्थानीय ज़रूरतों एवं चुनौतियों के मुताबिक काम करें, इसकी बजाय हम ऑक्सफ़ोर्ड, कैम्ब्रिज, हार्वर्ड या प्रिंसटन को अपने लिए बतौर रोल मॉडल देखते रहते हैं।
मुझे सच में दुख होता है जब मैं देखता हूं कि भारत में एक अच्छे कॉलेज/यूनिवर्सिटी को पूर्व का ‘ऑक्सफ़ोर्ड’ कहा जाता है! इसके अलावा, हमें यूरोपियन/अमेरिकन फैशन की नकल करना पसंद है; बॉलीवुड निर्माता और निर्देशक को सफल पश्चिमी फिल्मों की नकल करते देखना कोई अजीब बात नहीं है, और, जैसा कि कहा जाता है, हमारी ज़्यादातर तकनीकी/व्यावसायिक इनोवेशन मूल रचना होने की बजाय चीनी या पश्चिम के रूपांतरण हैं। क्या यह कहना पूरी तरह गलत होगा कि फ्लिपकार्ट, अमेज़न की निम्नस्तरीय नकल है या ज़ोमैटो, डोरडैश की कॉपी कर रहा है? और यह कॉपी-पेस्ट संस्कृति, अंदरूनी जानकारी रखने वाले हर किसी को मालूम है, शिक्षा जगत में यह आम हो चला है—जिस तरह से रिसर्च पेपर तैयार किए जाते हैं, और, मान लीजिए, मानविकी और सामाजिक विज्ञान विषयों में, हर कोई जूडिथ बटलर और मिशेल फूको की शब्दावली की नकल करने लगता है
वास्तव में, गलगोटिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ने जो किया, उससे पता चलता है कि किसी नकलची देश के लिए मूल खोजकर्ता बनना आसान नहीं है।
लेखक समाज शास्त्री हैं।

