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नये परिदृश्य में हसीना के प्रत्यर्पण का यक्ष प्रश्न

भारत ने आम तौर पर शरणार्थियों को वापस न भेजने (नॉन-रिफाउलमेंट) की नीति अपनाई हुई है। इसी नीति के तहत, दलाई लामा जैसे प्रमुख राजनीतिक शरणार्थियों को ऐतिहासिक रूप से संरक्षण दिया गया है। हालांकि, भारत 1951 के शरणार्थी कन्वेंशन...

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भारत ने आम तौर पर शरणार्थियों को वापस न भेजने (नॉन-रिफाउलमेंट) की नीति अपनाई हुई है। इसी नीति के तहत, दलाई लामा जैसे प्रमुख राजनीतिक शरणार्थियों को ऐतिहासिक रूप से संरक्षण दिया गया है। हालांकि, भारत 1951 के शरणार्थी कन्वेंशन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है।

शेख़ हसीना, जो 5 अगस्त, 2024 को हिंसक प्रदर्शनकारियों से जान बचाते हुए ढाका से गाजियाबाद के लिए एक सीक्रेट फ्लाइट से भागी थीं, अभी फांसी से दूर हैं, और नई दिल्ली निर्वासन में रह रही हैं। शेख़ हसीना का सवाल विक्रम और बेताल की तरह मोदी सरकार के कंधे पर सवार है। चूंकि प्रधानमंत्री मोदी को ‘एआई समिट’ में उपस्थित रहना था, इसलिए तारिक़ रहमान के शपथ ग्रहण समारोह में उन्होंने ढाका, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को भेजा। बांग्लादेश की तरफ से उन्हें सौंपने के बार-बार अनुरोध के बावजूद भारत में हसीना की मौजूदगी पिछले 18 महीनों में दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के बीच झगड़े की एक बड़ी वजह रही है।

भले ही भारत, ढाका के साथ ‘पोस्ट हसीना पार्टनरशिप’ बनाने के लिए उत्सुक है, लेकिन कई जियोपॉलिटिकल एनालिस्ट ने कहा, कि वे ऐसे हालात की कल्पना नहीं कर सकते, जिसमें नई दिल्ली पूर्व प्रधानमंत्री को मौत की सज़ा का सामना करने के लिए बांग्लादेश को सौंप दे। ढाका रह चुके भारत के पूर्व हाई कमिश्नर पिनाक रंजन चक्रवर्ती ने कहा, ‘नई दिल्ली उन्हें मौत की तरफ कैसे धकेल सकती है?’

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हसीना, बांग्लादेश की सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहीं, वो शेख मुजीबुर रहमान की सबसे बड़ी बेटी हैं। शेख मुजीबुर रहमान ने 1971 में पाकिस्तान से आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व किया था। शेख हसीना कोई पहली बार भारत में शरणागत नहीं हुई हैं। 15 अगस्त, 1975 को बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की ढाका में उनके धानमंडी स्थित घर पर मिलिट्री तख्तापलट के दौरान हत्या कर दी गई थी। इस हमले में उनकी पत्नी, तीन बेटे और दूसरे रिश्तेदार मारे गए थे। उनकी दो बेटियां संयोगवश बच गयीं, जो घटना के समय जर्मनी में थीं। उनमें एक शेख हसीना और दूसरी शेख़ रेहाना थीं। हसीना के पास अपने पति एमए वाजेद मियां के साथ भारत में शरण लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

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वर्ष 1975 से 1981 तक वे सभी दिल्ली के पंडारा रोड में एक नकली पहचान के साथ रहे। लेकिन अब नरेंद्र मोदी सरकार, हसीना के ‘निर्वासन पार्ट-टू’ को लेकर दुविधा में है। हसीना ने 2022 के इंटरव्यू में मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद के पलों को याद करते हुए कहा, ‘मिसेज इंदिरा गांधी ने तुरंत जानकारी भेजी, कि वह हमें सुरक्षा और पनाह देना चाहती हैं।’ दिल्ली आने के बाद, हसीना इंदिरा गांधी से मिलीं, तभी उन्हें अपने परिवार के 18 सदस्यों की हत्या के बारे में पता चला।

हसीना ने 2022 में न्यूज़ एजेंसी एएनआई को बताया, ‘इंदिरा गांधी ने हमारे लिए सारे इंतज़ाम किए। मेरे पति के लिए नौकरी भी।’ दिल्ली में हसीना पहले 56 रिंग रोड, लाजपत नगर-3 में रहती थीं, फिर दिल्ली के पंडारा रोड के घर में शिफ्ट हो गईं। छह साल बाद, 17 मई, 1981 को, हसीना बांग्लादेश लौटीं। वापसी के बाद देश पर कब्ज़ा कर चुकी मिलिट्री सरकार के खिलाफ एक लंबी और मुश्किल लड़ाई की शुरुआत की। करप्शन के आरोपों में जेल के बावजूद, हसीना डटी रहीं। आखिरकार, 1996 में शेख़ हसीना सत्ता में आईं, और पहली बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं।

लेकिन उस कालखंड से इस समय अलग परिस्थितियां हैं। पीएम मोदी बांग्लादेश के सन्दर्भ में अपनी पूर्ववर्ती इंदिरा गांधी की राह पर चले ज़रूर, मगर इसके अंजाम का आकलन मोदी के रणनीतिकार सही से नहीं कर पाए। वर्ष 2013 में भारत-बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि हुई थी। और 2016 में इसमें बदलाव किया गया था, जो कम से कम एक साल की जेल की सज़ा वाले अपराधों के दोषी या अभियुक्तों की अदला-बदली की अनुमति देती है। इसमें आतंकवाद, ट्रैफिकिंग और ऑर्गनाइज़्ड क्राइम जैसे अपराध शामिल हैं, लेकिन यदि कोई राजनीतिक क़ैदी है, तो उसके प्रत्यर्पण से मना करने की सहूलियत भी संधि में है। 11 पेज की संधि के अनुच्छेद 6-7 और 8 को ध्यान से पढ़ा जाये, तो शेख हसीना को आपराधिक धाराओं से भी छूट मिल जाती है। भारत इन्हीं धाराओं के आधार पर शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण से मना करने की स्थिति में है। इस संधि पर हस्ताक्षर करने वाले तत्कालीन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे और उनके समकक्ष डॉ. मोहिनुद्दीन ख़ान आलमगीर अभी जीवित हैं।

बहरहाल, 17 नवंबर, 2025 को 453 पेज के फैसले में, बांग्लादेश की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने शेख़ हसीना और दो सह-आरोपियों को दो अलहदा मामलों में मौत की सजा सुनाई थी। उन्हें पिछले साल 5 अगस्त को ढाका के चंखारपुल में छह निहत्थे प्रदर्शनकारियों की गोली मारकर हत्या करने के आरोप संख्या 4 के तहत मौत की सजा सुनाई गई थी। आरोप संख्या 5 के तहत, आरोपियों पर उसी दिन अशुलिया में छह छात्र प्रदर्शनकारियों को गोली मारने का आरोप था, जिनमें से पांच को बाद में जला दिया गया था, जबकि छठे को कथित तौर पर जिंदा रहते हुए आग लगा दी गई थी। पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल को भी मौत की सजा सुनाई गई, जबकि पूर्व पुलिस महानिरीक्षक चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून, जो सरकारी गवाह बन गए थे, को इस मामले में पांच साल की कैद की सजा सुनाई गई थी। भारत का कहना है, कि वह पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण के लिए बांग्लादेश के आग्रह की जांच कर रहा है।

क्या भारत ने पहले कभी किसी राजनीतिक शरणार्थी का प्रत्यर्पण किया है? भारत ने आम तौर पर शरणार्थियों को वापस न भेजने (नॉन-रिफाउलमेंट) की नीति अपनाई हुई है। इसी नीति के तहत, दलाई लामा जैसे प्रमुख राजनीतिक शरणार्थियों को ऐतिहासिक रूप से संरक्षण दिया गया है। हालांकि, भारत 1951 के शरणार्थी कन्वेंशन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। आपराधिक मामलों या राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर विशिष्ट व्यक्तियों के प्रत्यर्पण या निर्वासन का उसका अपना इतिहास रहा है।

वर्ष 1959 से भारत ने दलाई लामा को राजनीतिक शरण दे रखी है। चीन ने उसका कड़ा विरोध किया था, लेकिन प्रत्यर्पण की मांग पूरी नहीं हुई। चीन से हमारे संबंध दोस्ती और कुश्ती वाले रहे हैं। चीन से गलवान-देपसांग झड़प भी हुई, तो उभयपक्षीय व्यापार एकदम से रुक नहीं गया। तो क्या हम बांग्लादेश से चीन जैसा सम्बन्ध बनाये रखना चाहते हैं, या फिर शेख हसीना की ‘कूटनीतिक बलि’ दे दी जाएगी? यह आधिकारिक रूप से स्पष्ट नहीं है, कि शेख हसीना किसी थर्ड कंट्री में शरण चाहेंगी। शेख़ हसीना की क़ीमत पर कोई तीसरा देश क्यों अपने सम्बन्ध तारिक़ रहमान सरकार से ख़राब करेगा? बीएनपी को इतना बड़ा जनादेश सहानुभूति वोट, और शेख हसीना शासन में हुए सितम की वजह से मिला है। तारिक़ रहमान हर हाल में शेख़ हसीना से पुराना स्कोर सेटल करना चाहेंगे।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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