दुनिया भर के शेयर बाजार के खिलाड़ियों से लेकर ताकतवर केंद्रीय बैंकों के प्रमुखों तक, सबकी नजरें ब्रिक्स की उभरती अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं की बैठक में होने वाले फैसलों पर टिकी हैं। इन अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक व्यापार और वित्तीय लेन-देन में अमेरिकी डॉलर के दबदबे के लिए खतरा माना जाता है।
शाओमी के बिजनेस मॉडल को लेकर चीनी सत्ता के गलियारों में घबराहट ऐसे समय हो रही है, जब शनिवार से दिल्ली में ब्रिक्स शिखर बैठक होने जा रही है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने गुरुवार को कहा कि चीन को उम्मीद है कि भारत वहां निवेश करने और काम करने वाली सभी देशों की कंपनियों के लिए एक निष्पक्ष, न्यायपूर्ण, पारदर्शी और बिना भेदभाव वाला बिजनेस माहौल देगा। गुओ ने साथ में इसकी भी घोषणा की कि राष्ट्रपति शी ब्रिक्स बैठक में नई दिल्ली जा रहे हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ से उन रिपोर्टों के बारे में पूछा गया था, जिनमें कहा गया था कि भारत के सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस ने शाओमी की जांच की सिफारिश की है। गुओ ने कहा कि उन्हें खास स्थिति के बारे में पता नहीं है।
भारत के सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (एसएफआईओ) ने चीनी स्मार्टफोन कंपनी शाओमी के बिजनेस मॉडल और विदेशी निवेश नियमों के कथित उल्लंघन की एक विस्तृत जांच की सिफारिश की है। एसएफआईओ यह जांच करना चाहता है कि क्या 2020 की सीमा झड़पों के बाद चीनी निवेश पर कड़े नियमों के बावजूद शाओमी ने अनिवार्य मंजूरियां ली थीं या नहीं। कंपनी पर धन के प्रवाह और रॉयल्टी भुगतान जैसे मामलों में गड़बड़ी का संदेह है। यह प्रस्ताव अभी कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय की मंजूरी के लिए लंबित है।
कोई सात साल बाद चीनी राष्ट्रपति शी भारत आ रहे हैं। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के समिट में शामिल होने पर सस्पेंस बना हुआ था, जो गुरुवार को क्लियर हो गया। चीन के लिए यह समिट इसलिए अहम है, क्योंकि यह ब्रिक्स की 20वीं सालगिरह है और यह ऐसे समय में हो रही है, जब वैश्विक शासन में अव्यवस्था बढ़ रही है।
जैसे-जैसे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन नजदीक आ रहा है, दुनिया भर के शेयर बाजार के खिलाड़ियों से लेकर ताकतवर केंद्रीय बैंकों के प्रमुखों तक, सबकी नजरें इन उभरती अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं की बैठक में होने वाले फैसलों पर टिकी हैं। इन अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक व्यापार और वित्तीय लेन-देन में अमेरिकी डॉलर के दबदबे के लिए खतरा माना जाता है।
धीमी प्रगति के बावजूद, डी-डॉलरलाइज़ेशन (डॉलर पर निर्भरता कम करने की प्रक्रिया) चर्चा का विषय बन गई है। इसकी मुख्य वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वे बयान हैं, जिनमें उन्होंने ब्रिक्स देशों के समूह को चेतावनी दी थी कि अगर वे वैश्विक व्यापार में डॉलर के दबदबे को खत्म करने की कोशिश करते हैं, तो उन पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया जा सकता है।
मॉस्को, नई दिल्ली या पेइचिंग में बाजार संभालने वाले सभी मंत्रियों और अधिकारियों ने बार-बार जोर देकर कहा है कि ब्रिक्स का कोई भी देश डॉलर के खिलाफ किसी तरह की वैचारिक लड़ाई नहीं लड़ रहा है। लेकिन, यह हाथी के दांत दिखाने जैसा है। डॉलर के एकाधिकार को समाप्त करने की छटपटाहट तो है। यदि ब्रिक्स के देशों में आपसी मतभेद न हों, तो डॉलर का विकल्प कब का तैयार हो जाता।
भले ही ब्रिक्स शिखर बैठक में डी-डॉलरलाइज़ेशन पर खुलकर चर्चा न हो, लेकिन सम्मेलन के दौरान देशों के बीच होने वाली बातचीत में करेंसी स्वैप (मुद्रा की अदला-बदली) और व्यापार ढांचे पर चर्चा होने की पूरी संभावना है। मूल सदस्य देशों—भारत, रूस, चीन, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका—के नेताओं के बीच और हाल ही में ब्रिक्स में शामिल हुए कई अन्य देशों, जैसे ईरान, सऊदी अरब, मिस्र, इंडोनेशिया, यूएई और इथियोपिया, के नेताओं के साथ कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बातचीत होने की उम्मीद है।
वर्ष 2024 में ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार का मूल्य 1.17 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर आंका गया था। माना जाता है कि यह सालाना औसतन 13 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। दुनिया के कुल निर्यात में ब्रिक्स की हिस्सेदारी 24 प्रतिशत है। मगर, राष्ट्रीय मुद्राओं में भुगतान निपटाने की दिशा में ब्रिक्स देशों के विभिन्न कदम, जैसे भारत और रूस के बीच रुपया-रूबल समझौता या डॉलर के बजाय युआन में व्यापार करने की चीन की कोशिशें, जितनी कारगर होनी चाहिए थीं, हुई नहीं।
साल 2000 में, सभी देशों के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा डॉलर के रूप में रखा जाता था। 2026 तक यह घटकर लगभग 57 फीसदी रह गया है। अर्थात, ‘टाइगर अभी जिंदा है’ की तर्ज पर डॉलर अभी जिंदा है। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति बनाने वाली टीम के एक सदस्य ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘यह साफ तौर पर दिखाता है कि कई देशों के केंद्रीय बैंकर डॉलर का भारी भंडार रखने से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिमों को बांटने के लिए या तो दूसरी मुद्राएं या फिर सबसे सुरक्षित निवेश, यानी बुलियन (सोना), खरीद रहे हैं।’
डॉलर पर भरोसे की कमी का यह असर अब खुद अमेरिका के केंद्रीय बैंक द्वारा सोना रखने के मामले में भी दिखने लगा है। सोना महंगा होने की मूल वजह अब सरकारें बन चुकी हैं। डच केंद्रीय बैंक ने इस साल मार्च और अगस्त के बीच उत्तरी अमेरिका से लंदन में लगभग 86 टन सोना ट्रांसफर किया, जिसकी कीमत 10 अरब अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा थी। इससे पहले, जनवरी 2026 में फ्रांस ने अमेरिका में रखा अपना 129 टन सोना बेच दिया था, जो उसके कुल भंडार का लगभग 5 प्रतिशत था। बिक्री से मिले पैसे से फ्रांस ने यूरोप में सोना खरीदा और उसे अपने केंद्रीय बैंक के वॉल्ट में जमा कर दिया। यह कदम लगभग 9 साल पहले राष्ट्रपति ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान जर्मनी के बुंडेसबैंक द्वारा उठाए गए उपाय जैसा ही है, जब उसने फ्रैंकफर्ट में अपने वॉल्ट में 300 टन सोना ट्रांसफर किया था।
मंगलवार को क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा, ‘हालांकि ब्रिक्स किसी भी ‘डी-डॉलरलाइज़ेशन नीति’ के पक्ष में नहीं है, लेकिन सदस्य देश, जिनमें से कई प्रतिबंधों के कारण डॉलर में लेन-देन नहीं कर सकते, हम बस वही कर रहे हैं, जो हमारे राष्ट्रीय हितों के लिए बेहतर है। अमेरिकी कदमों ने ही डॉलर पर भरोसे को कम किया है।’
भारत के नजरिए से यह समस्या काफी पेचीदा है, क्योंकि नई दिल्ली एक तरफ तो रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले दुनिया के सबसे बड़े देशों में से एक बन गई है और दूसरी तरफ पश्चिमी बाजारों, टेक्नोलॉजी और पूंजी तक अपनी पहुंच भी बनाए रखना चाहती है। यहीं पर ब्रिक्स और भी अहम हो जाता है। अध्यक्ष देश की हैसियत से भारत किस करवट बैठता है, इस पर राष्ट्रपति ट्रंप नजरें गड़ाए बैठे हैं।
लेखक जियोपॉलिटिकल मामलों के पत्रकार हैं।

