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किशोरों की यौन स्वायत्तता से जुड़े यक्ष प्रश्न

किशोरावस्था में शरीर में प्राकृतिक रूप से हार्मोनल परिवर्तन होते हैं। इस उम्र में  आकर्षण, अनुराग और प्रेम जैसे कोमल भाव तथा विपरीत लिंग की यौनता को जानने की तीव्र इच्छा किशोरों के सामान्य लक्षण हैं। उचित मार्गदर्शन व जानकारी...

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किशोरावस्था में शरीर में प्राकृतिक रूप से हार्मोनल परिवर्तन होते हैं। इस उम्र में  आकर्षण, अनुराग और प्रेम जैसे कोमल भाव तथा विपरीत लिंग की यौनता को जानने की तीव्र इच्छा किशोरों के सामान्य लक्षण हैं। उचित मार्गदर्शन व जानकारी के अभाव में प्रायः किशोर भटकते है। 

किशोर यौन शोषण संरक्षण अधिनियम, 2012 (पोक्सो एक्ट) के दुरुपयोग को लेकर चिन्ता व्यक्त करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार से यह विचार करने को कहा है कि क्यों न ‘रोमियो-जूलियट’ उपबन्ध जोड़कर किशोरों के बीच पारस्परिक सहमति से बने यौन व्यवहार को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया जाए। इस परामर्श का उद्देश्य किशोरों को अपराधीकरण से बचाने के साथ उनकी यौन स्वायत्तता को व्यावहारिकता के नजरिए से देखना भी है।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के प्रकाशन ‘क्राइम इन इण्डिया-2023’ के अनुसार पूरे देश में ‘पोक्सो एक्ट’ के अन्तर्गत कुल 7,305 मामले दर्ज हुए थे, इनमें से 4,321 मामले बलात्कार, 2,619 गलत यौन-स्पर्श और 264 मामले अन्य प्रकार के यौन-उत्पीड़न से सम्बन्धित थे। इन मामलों में 18 वर्ष से कम आयु के 2,478 नाबालिगों की संलिप्तता भी पाई गई थी जिन्हें हिरासत में लिया गया था।

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18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्तियों के बीच शारीरिक सम्बन्ध ‘पोक्सो एक्ट’ के प्रावधानों के अनुसार पूर्णतया प्रतिबन्धित है और घोषित संगीन अपराध है। अतः नाबालिगों के बीच सहमति से बने शारीरिक सम्बन्धों के मामलों में कानून लागू करने वाली एजेंसियां अक्सर इस दुविधा में पड़ जाती है कि कानून को ‘जैसा है वैसा ही’ लागू किया जाए या ‘जैसा होना चाहिए’ वैसा लागू किया जाए। विदित हो कि कानून की व्याख्या करने और उसे ‘जैसा होना चाहिए’ वैसा लागू करने के आदेश देना केवल संवैधानिक न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र है। पुलिस और निचली अदालतें कानून को जस का तस लागू करने के लिए ही अधिकृत हैं, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को इस विषय पर ऐसा उपाय करने का सुझाव दिया है, जिससे सहमति से यौन सम्बन्ध बनाने वाले अवयस्कों को कानून का संरक्षण प्राप्त करने के लिए बार-बार उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय की शरण में न आना-जाना पड़े। इस उपाय को सर्वोच्च न्यायालय ने ‘रोमियो-जूलियट’ उपबन्ध की संज्ञा दी है।

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‘रोमियो-जूलियट’ उपबन्ध अंतर्राष्ट्रीय कानूनी प्रथाओं में पहले से ही मौजूद है, जहां अवयस्कों के बीच बने सम्बन्धों और निकटता की बारीकियों को मानव विकास प्रक्रिया का एक आवश्यक हिस्सा माना जाता है। इन कानूनों को इस प्रकार बनाया गया है कि आपराधिक यौन-विचलन और सहमति पर आधारित गैर-शोषणकारी किशोर शारीरिक सम्बन्धों के बीच कानून लागू करने वाली संस्थाएं अपने स्तर पर ही विभेद कर सके ताकि किशारों के अनावश्यक अपराधीकरण को रोका जा सके।

संयुक्त राज्य अमेरिका के कम से कम 43 राज्यों ने यौन गतिविधियों में संलिप्त किशोरों को अपराधी बनाए जाने से बचाने के लिए ‘क्लोज-इन-एज’ छूट (आयु-समीपता अपवाद) सिद्धांत को अपनाया है। इस अपवाद में एक आयु वर्ग के किशारों को अपने से नजदीक के आयु वाले अवयस्क के साथ सहमति से किया गया यौन व्यवहार को अपराध नहीं माना जाता है। कनाडा में 14 और 15 वर्ष के अवयस्क अपने से पांच वर्ष के आयु-अन्तर वाले साथी के साथ सहमति से सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं। फिलीपींस के कानून में 16 वर्ष की आयु वाले किशोरों को तीन वर्ष के आयु-अन्तर वाले साथी के साथ शारीरिक निकटता की अनुमति है। जॉर्जिया में नाबालिगों द्वारा परस्पर सहमति से तीन वर्ष तक के आयु-अन्तर वाले साथी के साथ यौन व्यवहार को बलात्कार नहीं दुर्व्यवहार माना जाता है। भारत में यौन सहमति की आयु 18 वर्ष है, यहां तक कि असहमति से बनाए गए सम्बन्ध को लेकर नाबालिग पत्नी अपने पति पर भी दुराचार का मुकदमा दायर कर सकती है। ‘पोक्सो एक्ट’ एक लिंग-निरपेक्ष कानून है और इस कानून में अवयस्कों द्वारा यौन व्यवहार के लिए दी गई पारस्परिक तथ्यात्मक सहमति की मान्यता नहीं है। तदानुसार, नाबालिगों द्वारा यौन गतिविधियों में संलिप्तता स्वतः ही अपराध बन जाती है।

सहमति से सम्बन्ध स्थापित करने वाले किशोरों की सूचना पुलिस तक पहुंचाने में ‘पोक्सो एक्ट’ की धारा 19(1) का प्रमुख योगदान है, जिसके अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति, जिनमें चिकित्सा पेशेवर भी शामिल हैं, यदि किसी नाबालिग के यौन गतिविधि में शामिल होने की जानकारी प्राप्त कर लेता है, तो उसे इसकी सूचना पुलिस को देना कानूनी रूप से अनिवार्य हो जाती है। ऐसी रिपोर्ट न करने वालों को 6 माह तक के कारावास का दण्ड दिया जा सकता है। परिणामस्वरूप, नाबालिग विवाहित गर्भवती महिलाएं और यौन गतिविधियों में शामिल अविवाहित किशोर अपनी चिकित्सीय समस्याओं के निदान के लिए योग्य डाक्टरों के पास जाने से कतराते हैं। झोलाछाप डाक्टरों की शरण में जाने को मजबूर होते हैं। कभी-कभी अति चिन्ताग्रस्त माता-पिता, सामाजिक दबाव के चलते अथवा व्यक्तिगत प्रतिशोध के वशीभूत, अपने बच्चों के सहमति-आधारित सम्बन्धों को बलात्कार या छेड़छाड़ के रूप दिखा पुलिस को सूचना दे देते हैं, ताकि पोक्सो अधिनियम के अन्तर्गत उनके अवयस्क यौन साथी को दण्डित कराया जा सके। वर्ष 2023 में ‘पोक्सो एक्ट’ के अन्तर्गत 2,478 मामले नाबालिगों के विरुद्ध दर्ज हुए थे। इनमें से कुछ परस्पर सहमति से जिज्ञासावश बनाए गए सम्बन्ध भी शामिल हैं।

किशोरावस्था जीवन के विकास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसमें किशोरों के शरीर में प्राकृतिक, रचनात्मक और हार्मोनल परिवर्तन होते हैं, जो कालान्तर में मनुष्योचित भावनाओं के प्रारम्भ और परिपक्वता का कारण बनते हैं। इस उम्र में परस्पर आकर्षण, अनुराग और प्रेम जैसे कोमल भाव तथा अपने विपरीत लिंग की यौनता एवं शारीरिकता को जानने की तीव्र इच्छा किशोरों के व्यवहार में दृष्टिगोचर होना एक सामान्य लक्षण है। उचित मार्गदर्शन और जानकारी के अभाव में प्रायः किशोर भटक जाते हैं। आयु-सम्बन्धी शारीरिक, जैविक और भावनात्मक असंतुलन उन्हें यौन-विचलन की दलदल में धकेल देता है, क्योंकि नाबालिग प्राकृतिक परिवर्तनों और यौन व्यवहार के परिणामों को समझने के लिए पूर्णतया सक्षम नहीं होते हैं।

‘पोक्सो एक्ट’ का मूल उद्देश्य वयस्कों द्वारा बच्चों के यौन शोषण को रोकना और उनकी रक्षा करना है। यह उचित प्रतीत नहीं होता कि किशोरों के बीच कौतूहलवश तथा सहमति से बने यौन सम्पर्क को भी इस अधिनियम के अन्तर्गत अपराध की श्रेणी में रखा जाए। दूसरी ओर, वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के दृष्टिगत किशोरों के सभी सहमति-आधारित सम्बन्धों को पूरी तरह अपराधमुक्त करना भी कठिन प्रतीत होता है, क्योंकि भारतीय समाज इसके लिए तैयार दिखाई नहीं देता है। इसीलिए, मौजूदा कानूनों में ही कुछ संशोधन करके उचित रास्ता निकालने की जरूरत है।

‘एक्स’ बनाम प्रधान सचिव, स्वास्थ्य एवं अन्य, प्रकरण में 29 सितम्बर, 2022 को सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि पोक्सो अधिनियम की धारा 19(1) के अन्तर्गत पुलिस को दी जाने वाली सूचना में चिकित्सा पेशेवरों को नाबालिग की पहचान और अन्य व्यक्तिगत विवरण प्रकट करने की आवश्यकता नहीं है। यह व्याख्या पंजीकृत चिकित्सा पेशेवरों के एतद्-सम्बन्धी वैधानिक दायित्व और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नाबालिगों के निजता के अधिकारों के बीच टकराव को रोकती है। इस फैसले को नज़ीर मानकर अवयस्कों द्वारा सहमति से बनाए गए यौन-सम्बन्धों को अपराध नहीं दुर्व्यवहार की श्रेणी में रखा जा सकता है। उन्हें उचित मार्गदर्शन देने की व्यवस्था की जा सकती है।

इसके अतिरिक्त, 16 से 18 वर्ष आयु-समूह के वे किशोर, जो सहमति से यौनाचार के मामलों में संलिप्त हो जाते हैं, को किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की मौजूदा व्यवस्था के अनुसार वयस्कों की तरह मुकदमा चलाकर दण्डित करने के प्रावधानों की भी समीक्षा करने की जरूरत है। इसके बजाय, ऐसे किशोरों को सामुदायिक सेवा और निगरानी में सदाचार की परिवीक्षा (प्रोबेशन) जैसे गैर-हिरासती सुधारात्मक उपायों के दायरे में लेकर उन्हें मार्गदर्शन देने के प्रयास होने चाहिए।

लेखक हरियाणा के पुलिस महानिदेशक रहे हैं।

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