एआई में नवाचार के साथ मौलिकता की शर्त
देश में नवाचार के तंत्र के विकास की दिशा में पहल सार्थक है लेकिन तकनीकी इनोवेशन का मौलिक होना जरूरी है। जबकि एआई की भाषा में नवाचार कुछ तथ्यों और पैटर्न को समझ तय ढांचे में चीजों को पेश कर...
देश में नवाचार के तंत्र के विकास की दिशा में पहल सार्थक है लेकिन तकनीकी इनोवेशन का मौलिक होना जरूरी है। जबकि एआई की भाषा में नवाचार कुछ तथ्यों और पैटर्न को समझ तय ढांचे में चीजों को पेश कर देना है।
आज हम विकसित दुनिया का जो चेहरा देख पा रहे हैं, उसमें विज्ञान और तकनीकी उन्नति की बड़ी भूमिका है। यही वजह है कि जैसे ही किसी नई तकनीक का आविष्कार होता है, दुनिया में उसे समझने और अपनाने की होड़ पैदा हो जाती है। हाल के अरसे में इंटरनेट के बाद जिस तकनीकी आविष्कार की सबसे ज्यादा चर्चा रही है, वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) है। सवा तीन साल पहले नई भूमिका में अवतरित हुई इस तकनीक के कमाल इतने लुभावने हैं कि लगभग हर महीने दुनिया के किसी न किसी कोने से इससे जुड़े किसी नए करिश्मे की खबर आ जाती है। यही वजह कि इस तकनीक में दुनिया के अग्रणी देशों के साथ कदमताल करने की मंशा से भारत सरकार ने वैश्विक स्तर का पांच दिवसीय एक आयोजन ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट’ नाम से किया और 140 देशों को इसमें आमंत्रित किया।
देश में यह पहल निश्चय ही सराहनीय है, लेकिन तकनीकी नवाचार (इनोवेशन) की कुछ अलिखित शर्तें हैं, जिनमें मौलिकता पहली है। मौलिक और रचनात्मक विचारों-आविष्कारों के बल पर कुछ देश और संगठन तकनीकी श्रेष्ठता और वैश्विक मान्यता अर्जित करते हैं और सफलता की नई मीनारें खड़ी करते हैं। अभिप्राय यह कि तकनीकी नवाचार में नकल या कॉपी-पेस्ट जैसी चीजें नहीं चलतीं। इसमें कुछ अलग हटकर कर दिखाना ही सफलता की प्रमुख अनिवार्यता है। इस दृष्टिकोण से ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट’ में घटित कुछ घटनाओं को देखें, तो लगता है कि एक तकनीक के रूप में एआई की जो बड़ी खामी है, वह इसके परिदृश्य में शामिल हो रहे कुछ लोगों-संगठनों को भी अपनी पकड़ में ले चुकी है और उनका व्यवहार इसी के अनुरूप है।
एआई पर तोहमत यह है कि यह अपनी ओर से कुछ नया नहीं रचती या रचनात्मक नहीं जोड़ती है। कुछ आंकड़ों, तथ्यों और पैटर्न को समझकर एक सुनिश्चित ढांचे में चीजों को पेश कर देना ही इसकी भाषा में नवाचार है, जो असल में नहीं है। चीजों को तेजी से संजोकर नए पैटर्न में कोई सामग्री पेश कर देना तो इसे (एआई टूल्स को) आता है, लेकिन यह औसत इंसानी समझ के दायरे से बाहर नहीं जा पाती। जबकि नवाचार इससे काफी अलहदा होता है। यही वजह कि एआई समिट के तीसरे दिन दिल्ली-एनसीआर के एक निजी विश्वविद्यालय की ओर से महासम्मेलन में दिखाए जा रहे एआई रोबोट और सॉकर ड्रोन को लेकर किए जा रहे दावों की सच्चाई सामने आ गई कि इन्हें चीन और कोरियाई कंपनियों से खरीदा गया है, न कि विश्वविद्यालय के तंत्र और छात्रों ने बनाया है। हालांकि विश्वविद्यालय ने सफाई दी कि उनके कैंपस में इन्हें डिवेलप किया जा रहा था, न कि इन्हें बनाया (बिल्ड किया) गया था। अगर ऐसा भी है, तो यह किसी का चित्र या वीडियो देखकर उसकी नकल (डीपफेक) तैयार करने के समकक्ष बैठता है और हमें एआई को लेकर देश में हो रही पहलकदमियों को लेकर ज्यादा गंभीरता से विचार करने को प्रेरित करता है।
यहां एआई को लेकर भारत में हो रहे कथित नवाचार को लेकर सवाल पैदा होते हैं। जैसे, पहला सवाल यह कि क्या हमें वास्तव में इसकी जरूरत है? एक ऐसी तकनीक, जिस पर आरोप हैं कि वह सैकड़ों क्षेत्रों में दखल देते हुए लाखों रोजगार खा जाएगी, आबादी बहुल देश में तभी कोई अर्थ रखती है, जब उससे नई किस्म के दूसरे लाखों रोजगार पैदा हों। अभी इसका सटीक उत्तर मिलने में वक्त है, क्योंकि चैटजीपीटी के नए अवतार में सामने आए अभी इसे महज सवा तीन साल बीते हैं।
दूसरा सवाल है कि क्या भारत को इसे आजमाने की तेजी दिखानी चाहिए? तकनीकें अपनाने व उन्हें समझने को लेकर दुनिया का जो मौजूदा ट्रेंड है, उसके मद्देनजर इस प्रश्न का उत्तर हां है। लेकिन तीसरा अहम सवाल यह है कि आखिर भारत के लोग, सरकार और तमाम संगठन क्या इसमें कोई नवाचार कर पा रहे हैं? इस सवाल का उत्तर दो टुकड़ों में मिलता है। पहला, यदि नवाचार का तंत्र विकसित करने और माहौल बनाने की बात है, तो सरकार और शिक्षण संस्थानों से लेकर तमाम कंपनियां इसमें पूरी ताकत से लग गए हैं- जो सार्थक बात है। लेकिन उत्तर का दूसरा हिस्सा हमें दुविधा में डालता है। यहां यह तथ्य सामने आता है कि तकनीकी नवाचार से जुड़े ज्यादातर मामलों में हमारा देश कॉपी-पेस्ट शैली वाले नवाचार में फंस गया है। हमारे ही आसपास तमाम लोग और कंपनियां गूगल जैसा सर्च इंजन, फेसबुक, इंस्टाग्राम या व्हाट्सऐप जैसा सोशल मीडिया मंच या फिर उन्हीं आविष्कारों को दोहराने का प्रयास करते दिखाई देते हैं, जिनका ईजाद अमेरिका, चीन, जापान, कोरिया में हुआ और हम उनकी नकल तैयार करने लगते हैं। सवाल है कि क्या यह नवाचार है। तो इसका उत्तर है कि यह हमें लकीर का फकीर साबित करता है। हम लीक से हटकर कोई ऐसा नया आविष्कार नहीं कर रहे , जो दुनिया को झकझोर दे और दूसरे देशों को वह भारतीय आविष्कार अपनाने-खरीदने को प्रेरित कर दे।
खासतौर से एआई की बात करें, तो देश में इसे अपनाने को लेकर एक हड़बड़ी भी दिखाई दे रही है जिस कारण गड़बड़ी हो रही है और दुष्प्रभाव पैदा हो रहे हैं- खासकर शिक्षा जगत में। विज्ञान और चिकित्सा जगत में एक नियम बहुत प्रचलित है कि कोई नया ईजाद आमजन के सामने तब तक नहीं लाया जाना चाहिए, जब तक उसके दुष्प्रभावों का सटीक आकलन न हो जाए। फार्मा उद्योग के लिए तो इसके लिए कड़े मानक हैं कि किसी दवा या टीके को बनाने के बाद लंबे समय तक उसका मानव चिकित्सा परीक्षण (ह्यूमन क्लिनिकल ट्रायल) होना चाहिए (कोविड-19 महामारी की जटिल व आपदाकारी स्थितियों को छोड़कर)।
दुनिया के तकनीकी और औद्योगिक विकास के क्रम में भी कोई मशीन या आविष्कार वर्षों या कई बार दशकों के प्रयोगों-परीक्षण के बाद इस स्थिति में आया है कि आमजन उसका इस्तेमाल कर सकें। लेकिन एआई को अपनाने के संबंध में भारत समेत दुनिया के कई देशों में एक किस्म का उतावलापन दिखाई दे रहा है। इंटरनेट व तकनीक से जुड़ी कंपनियों को इसमें मुनाफा नजर आ रहा है लेकिन सरकारों पर इसका पर्याप्त दबाव दिखाई दे रहा है कि वे इसे अपनाएं और इसके लायक तंत्र व माहौल पैदा करें।
इसमें संदेह नहीं है कि उद्योग जगत और इंटरनेट से संचालित अर्थव्यवस्था में इस चमत्कारी तकनीक (एआई) के बेशुमार फायदे हैं। इस नजरिए से वहां एआई टूल्स और सॉफ्टवेयर अपनाना समझदारी हो सकता है। लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में एआई को लेकर तेजी से बन रही स्वीकारोक्ति किसी दबाव का नतीजा ज्यादा लगती है, बजाय इसकी जरूरत के।
अगर पूछा जाए कि शिक्षा बोर्डों, विश्वविद्यालयों और खुद सरकारों के सामने ऐसी क्या मजबूरी है कि वे छात्रों को एआई की जानकारी से लैस करना चाहते हैं। एक सच्चाई यह कि असल में इसके पीछे एआई और डाटा एल्गोरिद्म से जुड़ी तकनीकी व इंटरनेट कंपनियों का दिमाग है। ये कंपनियां अपने कारोबारी मकसद के लिए एआई से जुड़ा डाटा पैदा करके उसका इस्तेमाल करना चाहती हैं ताकि एल्गोरिद्म को उनकी जरूरतों के हिसाब से डिजाइन कर सकें। विशाल आबादी वाले भारत से ज्यादा डाटा और कौन-सा देश मुहैया करा सकता है। ये कंपनियां सरकारों और शिक्षा जगत को एआई के लिए लुभा रही हैं और इसके लिए बेहद सस्ती दरों पर एआई के एप्लिकेशन (ऐप) और संबंधित तकनीकें बेचकर उन्हें अपने झांसे में ले रही हैं।
एआई की दुनिया बेशक तेज हो, लेकिन इसकी एक सबसे बड़ी हकीकत यह है कि यह सच्चाई से अलग एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहां नकली चीजें असली लगती हैं और पराए ज्ञान को लोग अपना मानकर किसी गफलत के शिकार हो सकते हैं।
लेखक मीडिया यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

