अब ट्रंप की गिद्ध दृष्टि का शिकार ईरान है। तेल की खुशबू उन्हें पागल बनाती है। दावा करते हैं कि ईरान की जनता को कट्टरपंथी व्यवस्था से आजाद कराएंगे। यह वही ट्रंप हैं जो खुद टैरिफ के ऐसे कट्टर आतंकी हैं यानी उन्हें देखकर कट्टरपंथ भी शरमा जाए।
आंखों में शांति के नोबेल का सपना और उंगलियों में मिसाइल के बटन। कल तक वे शांति-दूत बनने का दम भरते थे, आज वे मध्यपूर्व में बम बरसा रहे हैं। दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप जब बोलते हैं, तो लगता है कोई कार्टून बोलता है। डोनाल्ड ट्रंप जब शांति के नोबेल की चर्चा करते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे कसाई छुरी धोते हुए शाकाहार पर भाषण की जुगाली कर रहा हो। ट्रंप की शांति ठीक वैसी है जैसी मोहल्ले का दबंग कहता है, ‘मैं बहुत सीधा आदमी हूं, लेकिन अगर कोई सीधा न चले तो…...’
दुनिया के दारोगा बनकर वेनेजुएला को ऐसे नाप लिया जैसे कोई संप्रभु राष्ट्र नहीं, बल्कि व्हाइट हाउस की पिछवाड़े पड़ी पैतृक जमीन हो। जिस देश की जनता ने अपना नेता खुद चुना, वहां ट्रंप साहब ने ‘स्वयंभू राष्ट्रपति’ पैदा कर दिया। न चुनाव, न संसद, न जनता। उन्हें लगता है कि दुनिया का लोकतंत्र तो व्हाइट हाउस के रिमोट कंट्रोल से चलता है। वेनेजुएला के मामले में ट्रंप ने यह साबित कर दिया कि उनके लिए विश्व के देश अब भूगोल नहीं, बल्कि शतरंज की गोटियां हैं। वह जब चाहें उन्हें उलट-पलट सकते हैं।
अब ट्रंप की गिद्ध दृष्टि का शिकार ईरान है। तेल की खुशबू उन्हें पागल बनाती है। दावा करते हैं कि ईरान की जनता को कट्टरपंथी व्यवस्था से आजाद कराएंगे। यह वही ट्रंप हैं जो खुद टैरिफ के ऐसे कट्टर आतंकी हैं यानी उन्हें देखकर कट्टरपंथ भी शरमा जाए। सैकड़ों प्रतिशत टैरिफ की धमकी ऐसे दी जाती है जैसे किराएदार को डराने के लिए कहा जा रहा हो ‘बहुत मत बोलो, नहीं तो बिजली-पानी का बिल बढ़ा दूंगा।’
पल में तोला, पल में माशा वाले ट्रंप यू-टर्न राष्ट्रपति बन गए हैं आज युद्ध तो कल सीजफायर। परसों फोन कॉल और फिर बयान कि ‘मैंने कभी कहा ही नहीं।’ उनके झूठों की कतार इतनी लंबी है कि अब तो लाइनें भी थक गई हैं, और झूठ खुद शर्मसार होकर मुंह फेरने लगे हैं। ट्रंप अपने बयानों में बार-बार फिसलते हैं। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर वे नैतिकता के प्रोफेसर बन जाते हैं।
नोबेल शांति पुरस्कार की बात करते-करते बारूद पर कविता लिख रहे ट्रंप अब डोनाल्ड डक जैसे दिखने लगे हैं। ट्रंप आज भी दुनिया को डराने में लगे हैं। कभी टैरिफ से, कभी धमकी से, कभी ट्वीट से। पर इतिहास बड़ा बेरहम होता है। वह न टैरिफ जानता है, न ट्वीट मानता है। वह सिर्फ इतना लिखेगा—‘जिसने शांति के नाम पर सबसे ज्यादा आग बेची, वह खुद अपने ही धुएं में गुम हो गया।’ इतिहास जब ट्रंप का हाल देखेगा, तो शायद यही लिखेगा कि जो खुद शांति की बात करता रहा और हर तरफ युद्ध और अशांति फैलाता रहा।

