नये साल से इतनी उम्मीदें बांध ली जाती हैं कि नया साल उम्मीदों के बोझ से ही बेहोश जाता है, ऐसा लगता है। अगर नये सालों से संकल्पों से बिजली बनाना संभव होता तो उससे इतनी बिजली बन जाती कि भारत जैसा देश उसका निर्यात भी कर लेता।
नया साल आ चुका है और पुराने टाइप के संकल्प नयी स्टाइल से लिये जा चुके हैं कि कल से जिम जायेंगे और कल से सिगरेट पीना छोड़ देंगे। कल से खाने-पीने में अनुशासन बरतेंगे।
नया साल आते ही सब लोग ऐसे बरताव करते हैं- जैसे कल से ही दुनिया बदल जाएगी या हम ही बदल जायेंगे, कोई जादू हो जायेगा। लेकिन असलियत यह है कि दुनिया वही रहती है, बस बहाने नए हो जाते हैं। दुनिया एक रात में बदल कैसे सकती है। पाकिस्तान जैसा दुष्ट देश एक रात में कैसे सुधर सकता है। अमेरिका के ट्रंप का नोबल लालच एक रात में कैसे बदल सकता है। एक रात में कुछ नहीं हो सकता, कुछेक बदमाशियों और चोरी के अलावा। नये साल से इतनी उम्मीदें बांध ली जाती हैं कि नया साल उम्मीदों के बोझ से ही बेहोश जाता है, ऐसा लगता है। अगर नये सालों से संकल्पों से बिजली बनाना संभव होता तो उससे इतनी बिजली बन जाती कि भारत जैसा देश उसका निर्यात भी कर लेता। नये साल के संकल्पों से अगर पहाड़ बनाना संभव होता है, तो इतना बड़ा पहाड़ बनता कि एवरेस्ट झुककर उस पहाड़ से कहता-बड़े मियां नमस्कार कबूल फरमायें।
सब तरफ संकल्प बरस रहे हैं। संकल्पों का तूफान है, सुनामी है। देखिए, हमारे नेता भी नए साल पर संकल्प लेते हैं। कहते हैं—इस साल भ्रष्टाचार खत्म करेंगे!
और चुनावी रैलियों में नया साल का नारा : विकास होगा!
फिर दिखता है कि सीवर का पानी पीने के पानी के साथ मिलकर कह रहा है-सबका साथ, सबका विकास।
क्रिकेटर भी नए साल पर ट्वीट करते हैं—इस साल देश को गौरवान्वित करेंगे! और पहले मैच में कैच छोड़कर देश को तनावग्रस्त कर देते हैं।
नया साल, नया टूर्नामेंट... वही पुराना बहाना :
पिच खराब थी, किस्मत ने साथ नहीं दिया। लगता है क्रिकेटर और नेता दोनों एक ही कोचिंग से बहाने सीखते हैं।
और दर्शक?
जनवरी में संकल्प लेते हैं—अब क्रिकेट पर समय बर्बाद नहीं करेंगे!
फरवरी आते ही टीवी पर चिल्लाते हैं—अरे अंपायर अंधा है क्या!
जनता भी पीछे नहीं रहती।
ट्रैफिक नियम मानने का संकल्प : लाल बत्ती पर रुकेंगे! और फिर हॉर्न बजाकर बोले—भाई जल्दी है, नया साल है!
फिटनेस का संकल्प : सुबह दौड़ेंगे!
और दौड़े भी... लेकिन बेड से किचन तक! नया साल दरअसल नया बहाना महोत्सव है।
बहानों का एक और मौका, जो हर साल बार-बार मिलता है। नये साल के आसपास झूठ-झूठ जैसा नहीं लगता। आम तौर पर जनता से नेता झूठ बोलते हैं पर नये साल में खुद से खुद को झूठ बोलने का लाइसेंस मिल जाता है।

