Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

पारिस्थितिकीय संतुलन न बिगाड़े सौर ऊर्जा मुहिम

‘ओरण’ के अस्तित्व का संकट

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

सौर परियोजनाएं राजस्थान के ‘ओरण’ और राज्य वृक्ष ‘खेजड़ी’ के लिए अस्तित्व का संकट बन गई हैं। पेड़ काटने से मरुस्थल फैलेगा। इन ‘बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट’ में मौजूद दुर्लभ वनस्पतियां व जीवों के घर नष्ट होंगे। वहीं इस भूमि में पैनल बिछने से वर्षा जल संचयन रुक जाता है।

राजस्थान के पश्चिमी अंचल में इन दिनों एक ऐसी गूंज सुनाई दे रही है, जो आधुनिक विकास के मॉडल पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करती है। बीकानेर और जैसलमेर के रेतीले धोरों से उठा ‘खेजड़ी और ओरण बचाओ आंदोलन’ महज़ चंद पेड़ों को बचाने की कवायद नहीं है, बल्कि यह उस प्राचीन पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने की अंतिम पुकार है, जिसने सदियों से थार के मरुस्थल को जीवंत बनाए रखा है। जिस ‘हरित ऊर्जा’ को हम वैश्विक जलवायु परिवर्तन के समाधान के रूप में देख रहे हैं, वही सौर परियोजनाएं आज राजस्थान के ‘ओरण’ और राज्य वृक्ष ‘खेजड़ी’ के लिए अस्तित्व का संकट बन गई हैं।

मरुस्थल के पर्यावरण में ‘ओरण’ की महत्ता को वैज्ञानिक और सामाजिक, दोनों ही धरातलों पर समझना आवश्यक है। ओरण वे सामुदायिक वन क्षेत्र हैं, जिन्हें लोक देवताओं के नाम पर समर्पित कर दशकों और सदियों से संरक्षित किया गया है। सरकारी दस्तावेजों में भले ही इन्हें ‘वेस्टलैंड’ यानी बंजर भूमि के रूप में वर्गीकृत किया गया हो, लेकिन पारिस्थितिकी विज्ञान के नजरिए से ये ‘बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट’ हैं। राजस्थान में लगभग 25,000 ओरण हैं, जो करीब 6 लाख हेक्टेयर भूमि पर फैले हैं। ये क्षेत्र न केवल दुर्लभ वनस्पतियों के घर हैं, बल्कि लुप्तप्राय जीवों के लिए अंतिम शरणस्थली भी हैं। यहां की जैव-विविधता अन्य मरुस्थलीय क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध है, जो पूरे क्षेत्र के सूक्ष्म-जलवायु को नियंत्रित करती है।

Advertisement

थार मरुस्थल में मानसून का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ओरण और खेजड़ी का विनाश इसी गति से जारी रहा, तो धूल भरी आंधियों की तीव्रता उत्तर भारत के मैदानी इलाकों, यहां तक कि दिल्ली-एनसीआर तक, कई गुना बढ़ जाएगी। ओरण की घास और पेड़ों की कमी का सीधा अर्थ है—रेत का अनियंत्रित प्रसार।

Advertisement

सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि ओरण को ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ माना जाए, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में इन्हें आज भी ‘बंजर’ के रूप में दर्ज किया जाना एक बड़ी प्रशासनिक चूक है। इसी चूक का फायदा उठाकर ऊर्जा कंपनियां इन जमीनों को कौड़ियों के दाम पर लीज पर ले रही हैं।

आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में सौर परियोजनाओं के विस्तार के कारण केवल पश्चिमी राजस्थान में 26 लाख से अधिक खेजड़ी के पेड़ काटे गए हैं। वैज्ञानिक शोध जैसे फोटोवोल्टिक हीट आइलैंड इफेक्ट संबंधी अध्ययन चेतावनी देते हैं कि सौर पैनलों का अत्यधिक जमाव स्थानीय तापमान को 3 से 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा देता है। यह ऊष्मा मरुस्थल के नाजुक पारिस्थितिकी संतुलन को बिगाड़ रही है। इसके अतिरिक्त, ‘लेक इफेक्ट’ के कारण आकाश में उड़ते पक्षियों को ऊपर से ये नीले पैनल जलस्रोत का भ्रम देते हैं, जिससे टकराकर उनकी मृत्यु हो रही है।

जल प्रबंधन के दृष्टिकोण से देखें तो थार मरुस्थल में पानी की एक-एक बूंद स्वर्ण के समान है। लेकिन एक विशाल सौर परियोजना को सुचारु रखने के लिए पैनलों की सफाई हेतु प्रति सप्ताह लाखों लीटर पानी की आवश्यकता होती है। यह पानी उसी भूजल स्रोत से खींचा जा रहा है, जो स्थानीय समुदायों और वन्यजीवों की जीवनरेखा है। जब ओरण की ज़मीन पर कंक्रीट के ढांचे और पैनल बिछ जाते हैं, तो वर्षा जल के संचयन की प्राकृतिक प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है।

जलवायु परिवर्तन के चलते जहां मरुस्थलीकरण को रोकना प्राथमिकता होनी चाहिए, वहां खेजड़ी जैसे पेड़ों को काटना आत्मघाती कदम है। खेजड़ी की जड़ें ज़मीन के 30 मीटर नीचे तक जाकर मिट्टी को थामे रखती हैं और धूल भरी आंधियों की गति को नियंत्रित करती हैं। यदि ये ‘प्राकृतिक दीवारें’ ढह गईं, तो मरुस्थल का विस्तार अरावली की सीमाओं को लांघकर उत्तर भारत के मैदानी इलाकों तक पहुंचने में देर नहीं लगाएगा। आवश्यकता इस बात की है कि सौर ऊर्जा का विकास ‘विकेंद्रीकृत’ हो—उपजाऊ ओरण और मारू वनों के बजाय छतों और बंजर पहाड़ों का उपयोग किया जाए।

विकास का पैमाना केवल ‘मेगावाट’ न हो, बल्कि उस पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा भी हो जो सदियों से हमें ऑक्सीजन, चारा और आश्रय देता आया है। मरुभूमि के पर्यावरण, उसकी जैव-विविधता और अनोखी जलवायु को बचाने के लिए ओरण को बचाना अब केवल एक क्षेत्रीय मांग नहीं, बल्कि एक पर्यावरणीय आपातकाल बन चुका है। समझना होगा कि बिना खेजड़ी और ओरण के, राजस्थान का मरुस्थल केवल एक तपता हुआ सौर-कांच का घर बनकर रह जाएगा, जहां जीवन के लिए कोई स्थान नहीं होगा।

यह समय नीति-निर्माताओं के लिए आत्ममंथन का है कि क्या हम एक पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट करके प्राप्त की गई बिजली को वास्तव में ‘हरित ऊर्जा’ कह सकते हैं? मरुभूमि की जैव-विविधता और ओरण की पवित्रता को बचाना अब केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य के लिए एक नैतिक उत्तरदायित्व है।

Advertisement
×