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चुनौतीपूर्ण दौर में रणनीतिक समझौतों की अनिवार्यता

नई विश्व व्यवस्था में द्विपक्षीय संबंधों और मुक्त व्यापार समझौतों का विस्तार ज़रूरी है। लेकिन भारत विरोधी भू-राजनीतिक ताकतों के गठजोड़ों के चलते हमें अपनी सुरक्षा और रणनीतिक गठबंधन बनाने पर भी ध्यान देना चाहिये। अमेरिका के इस्लामाबाद के...

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नई विश्व व्यवस्था में द्विपक्षीय संबंधों और मुक्त व्यापार समझौतों का विस्तार ज़रूरी है। लेकिन भारत विरोधी भू-राजनीतिक ताकतों के गठजोड़ों के चलते हमें अपनी सुरक्षा और रणनीतिक गठबंधन बनाने पर भी ध्यान देना चाहिये। अमेरिका के इस्लामाबाद के प्रति नरम रुख और चीन-पाक के मंसूबों से सतर्क रहना होगा वहीं आंतरिक एकजुटता भी अनिवार्य है।

यूएई के राष्ट्रपति का दिल्ली दौरा और हमारे प्रधानमंत्री के साथ उनकी बातचीत, बगल के पड़ोसी के साथ हमारे ठंडे पड़े रिश्तों के बीच ताज़ी हवा के झोंके जैसा है। अब हमारी निगाह यूरोपियन यूनियन के साथ 'सब समझौतों की जननी' (मदर ऑफ ऑल डील्स) पर लगी है जिसके गणतंत्र दिवस तक संपन्न होने की उम्मीद है। यह समझौता यूरोपियन यूनियन के साथ हमारे संबंधों को नई गति देगा। जिस नई विश्व व्यवस्था की ओर आगे बढ़ रहे हैं, उसके मद्देनज़र द्विपक्षीय संबंधों और मुक्त व्यापार समझौतों का विस्तार करना और भी ज़रूरी हो गया है।

अमेरिका उत्तरोतर संरक्षणवादी बनता जा रहा है और पिछली व्यवस्था के बहुत से प्रावधानों को चुनौती दे रहा है। कनाडा के प्रधानमंत्री ने चीन के अपने हालिया दौरे में चीन के साथ व्यापार समझौते का मसौदा तैयार करते वक्त यही बात कही थी। यह देखते हुए कि हमारे दुश्मन देश हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे, रक्षा/सुरक्षा समझौतों और व्यापार गठबंधनों की ज़रूरत और भी अपरिहार्य बन गई है।

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ज़रूरी है कि सत्ता में बैठे लोग इस पर आत्म-मंथन करें। क्या महज इस तथ्य के आधार पर कि हमारी अर्थव्यवस्था बहुत विशाल है और हमारा व्यापार भी बहुत ज़्यादा है, उससे हम अपने पड़ोसी पर अजेयता का अहसास करने लगें? तो यह भी पूछा जाए कि पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान को व्हाइट हाउस, पेंटागन, बीजिंग, रियाद, अंकारा आदि में इतना सम्मान क्यों मिल रहा है? पाकिस्तान को चीन से आर्थिक और सैन्य सहायता मिली है। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीनी हथियारों ने प्रदर्शन किया, भले ही चीन के साथ हमारा व्यापार 150 बिलियन डॉलर से ज़्यादा है, जबकि इसकी तुलना में पाकिस्तान और चीन का द्विपक्षीय व्यापार लगभग 15-20 बिलियन डॉलर है। लेकिन उनके पास सीपीईसी (चीन-पाक आर्थिक गलियारा) है जो ग्वादर बंदरगाह के साथ, मध्य पूर्व और यूरोप के लिए चीनी बेल्ट एंड रोड पहल (बीआरआई) का प्रवेश द्वार है। पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी (पाक अधिकृत कश्मीर में) चीन को सौंप दी थी (जिस पर हमें ऐतराज है) और जहां से होकर काराकोरम राजमार्ग गुज़रता है (जो बीआरआई का अहम हिस्सा है) और यह दोनों देशों के प्रगाढ़ रणनीतिक भाईचारे को दर्शाता है। दूसरी ओर, चीन के साथ हमारा सीमा विवाद है, और चीनी लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों पर दावा करते हैं। इसके मद्देनजर अंदाजा लगा सकते हैं कि पाकिस्तानी शस्त्रागार में पूर्ववत आर्थिक व सैन्य मदद आती रहेगी।

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इसके अलावा, उन्होंने अब सऊदी अरब के साथ एक सुरक्षा समझौता किया है जो ज़रूरत पड़ने पर उन्हें मदद का आश्वासन देता है। एक नए प्रस्तावित त्रिपक्षीय गठबंधन में तुर्की की पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ मिलकर मिनी-नाटो जैसा गठबंधन बनाने की उम्मीद है। याद रखें कि पाकिस्तान के साथ हालिया टकराव के दौरान तुर्की ने ही एकजुटता दिखाने के लिए अपना एक युद्धपोत भेजा था, और कथित तौर पर लड़ाई में उसके बनाए ड्रोनों का भी इस्तेमाल किया गया था। यहां भी, भारत-सऊदी द्विपक्षीय व्यापार 40 बिलियन डॉलर से ज़्यादा है, जबकि पाक-सऊदी व्यापार सिर्फ़ 5 बिलियन डॉलर...फिर भी उनके बीच रक्षा समझौता है। पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी अरब को उसकी सुरक्षा ज़रूरतों के लिए सैनिक मुहैया करवाता रहा है और इस बात पर ध्यान देना ज़रूरी है कि वह एकमात्र इस्लामिक देश है जिसके पास परमाणु क्षमताएं हैं। हाल ही में इस्राइल द्वारा कतर में और अमेरिका द्वारा ईरान पर बमबारी को देखते हुए लगता है कि तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सुरक्षा समझौते के पीछे भू-राजनीतिक मजबूरियां हैं। अल जज़ीरा के एक हालिया लेख के अनुसार, पाकिस्तान एशिया और अफ्रीका के कई देशों को फाइटर जेट बेचने जा रहा है। जेएफ-17 लड़ाकू जेट चीन और पाकिस्तान के संयुक्त उपक्रम में बनाए जा रहे हैं, और इसके नवीनतम ब्लॉक 3 वेरिएंट को 4.5 जेनरेशन के लड़ाकू विमान के रूप में वर्गीकृत किया गया है। 25-30 मिलियन डॉलर की अपेक्षाकृत कम कीमत के साथ इसे कई वायु सेनाओं द्वारा आकर्षक विकल्प माना जा रहा है। यह देखते हुए कि भू-राजनीतिक ताकतें खेल कर रही हैं जो केवल व्यापारिक संबंधों पर हावी हो रही हैं, जब तक हम एक सशक्त सक्रिय नीति नहीं अपनाते, हम खुद को उतरोत्तर अलग-थलग पड़ते पा सकते हैं।

अमेरिका अभी भी बड़ी समस्या बना हुआ है, और उसने हाल ही में फिर से इस्लामाबाद की ओर नर्मी भरा रुख अपनाया है। मामलों को और जटिल बनाने के लिए, अमेरिकी टैरिफ और प्रतिबंधों का खतरा हमारे सिर पर मंडरा रहा है। इसके परिणामस्वरूप न केवल हमारे निर्यात में मंदी आई, बल्कि रूस से हमारे तेल आयात में भी भारी कमी करनी पड़ी है।

रूस यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा पड़ा है, और यह हमारे लिए अच्छा नहीं क्योंकि हमारा मुख्य हथियार आपूर्तिकर्ता वही है किंतु फिलहाल उसे अपनी ज़रूरतें पहले पूरी करनी हैं। अमेरिकी प्रतिबंधों के खतरे के कारण हमें ईरान के साथ हुए उस समझौते से पीछे हटना पड़ रहा है, जिसके जरिए हमें चाबहार बंदरगाह को विकसित और इस्तेमाल करने में मदद मिली थी, और यह ईरान के साथ बचे-खुचे व्यापार को भी रोक देगा, जो पिछले प्रतिबंधों की वजह से पहले ही काफी कम हो चुका। ईरान पारंपरिक रूप से हमारे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है। चाबहार बंदरगाह हमें ईरान और मध्य एशिया तक पहुंच मुहैया कराता है। हालिया खबरों के अनुसार, बंदरगाह के भविष्य पर अमेरिका के साथ चर्चा हो रही है।

आखिर में, कश्मीर का पुराना सवाल पहले की भांति कायम है, चीन के समर्थन वाला पाकिस्तान हमेशा यथास्थिति बदलने के मौके की ताक में रहता है। उनके दावों और बातों को हम केवल दिवास्वप्न कहकर खारिज नहीं कर सकते। चीन सीमाओं पर नागरिक एवं सैन्य बुनियादी ढांचे को नए स्तर पर ले जा रहा है, चाहे अग्रिम सीमांत एयरबेस हों या सड़कें वगैरह, जैसाकि हम भी कर रहे हैं, लेकिन पैमाना अलग है।

बांग्लादेश में बदले हुए राजनीतिक हालात ने मामलों को और जटिल बना दिया तथा आज उनके वरिष्ठ नेता खुलेआम पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से काटने की वकालत करते सुने जा रहे हैं। इस तथ्य के मद्देनज़र कि मणिपुर में स्थिति शांत नहीं और नागालैंड में समस्या अनसुलझी है, यह हमारे पूर्वोत्तर को असुरक्षित और उपद्रवों के लिए खुला छोड़ देता है। लद्दाख में भी अशांति है और मणिपुर की तरह वहां भी त्वरित समाधान जरूरी है। अगर रूस उलझा हुआ है और अपने सहयोगियों की मदद करने में असमर्थ है और अमेरिका प्रतिबद्ध नहीं है, तो हम मदद के लिए किसकी ओर देखेंगे? यह समय चतुर कूटनीति का है ताकि हमारे खिलाफ़ और नए गठजोड़ को रोका जा सके। हम चीन, सऊदी, यूएई, अमेरिका वगैरह के साथ भारी मात्रा में व्यापार करते हैं, हमें अपने रणनीतिक लक्ष्यों के लिए इसका फ़ायदा उठाना चाहिए क्योंकि सभी बड़ी शक्तियों ने व्यापार को एक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। मज़बूत विदेश नीति एक मज़बूत एकजुट राष्ट्र की नींव पर आधारित हो।

राष्ट्रीय नेतृत्व की ज़िम्मेदारी है कि वह हमें एकजुट रखे, और यह एकता हमारी अपनी गलतियों और स्वार्थी लक्ष्यों के कारण कमज़ोर न पड़ने पाए। केंद्र और राज्यों के बीच अच्छे कामकाजी संबंध होने चाहिए। सभी महत्वपूर्ण मामलों में केंद्र सरकार को चाहिए कि राज्य सरकारों को साथ रखे और उनके नेतृत्व को राष्ट्रीय प्रयासों में शामिल करे। यह रणनीति हमारी सभी आंतरिक सुरक्षा समस्याओं में बहुत कारगर रही है।

भारत की आर्थिक सफलता हमारे पड़ोसियों में ईर्ष्या और दुश्मनी पैदा करती है और इसलिए यह ज़रूरी हो जाता है कि हम अपनी सुरक्षा और रणनीतिक गठबंधन बनाने पर कहीं ज़्यादा ध्यान दें।

लेखक मणिपुर के राज्यपाल एवं जम्मू-कश्मीर में पुलिस महानिदेशक रहे हैं।

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