हिंदी पखवाड़े के दौरान हर किसी की रक्त-नलिकाओं में हिंदी भाषा का प्रवाह होने लगता है। बुद्धिजीवी, बेरोज़गार, बाबू से माननीय तक हिंदी के प्रति आभार प्रकट करते हुए साल में एक दिन सोशल मीडिया पर हिंदी-सेवी स्टेटस लगाने का जोखिम उठाते हैं।
सितंबर महीने के आगमन के साथ ही हर कोई हिंदीभाषी बनने को आतुर दिखाई देता है। इस माह हिंदी में बोलने, हंसने और मुस्कुराने की परंपरा का भरपूर निर्वाह किया जाता है। दरअसल, भारत में एकमात्र भाषा हिंदी ही है, जिसे सितंबर माह में गौरवान्वित होने का सौभाग्य प्राप्त होता है। जहां अन्य भाषाओं के लिए कोई एक विशेष दिवस तक मयस्सर नहीं है, वहीं हिंदी के लिए सितंबर माह में एक संपूर्ण पखवाड़े का प्रावधान किया गया है।
हिंदी कार्यशाला, काव्य गोष्ठी और साहित्यिक समारोह के लिए हिंदी के कर्णधारों को ‘इनभाइट’ किया जाता है, जिनके द्वारा हिंदी की गौरवगाथा को उपस्थित श्रोताओं के बीच ‘लाइट’ में लाने का पुनः प्रयास किया जाता है।
संयोगवश, सितंबर माह में ही पितृपक्ष के दौरान अस्तित्व-विहीन पुरखों को भी याद किया जाता है। अस्तित्व के लिए संघर्षरत हिंदी भाषा भी विदेशी भाषा, अंग्रेजी भाषा अथवा आज की ट्रेंडिंग ओटीटी भाषाओं के लिए पितरों की भाँति ही है।
हिंदी पखवाड़े के दौरान हर किसी की रक्त-नलिकाओं में हिंदी भाषा का प्रवाह होने लगता है। बुद्धिजीवी, बेरोज़गार, बाबू से माननीय तक हिंदी के प्रति आभार प्रकट करते हुए साल में एक दिन सोशल मीडिया पर हिंदी-सेवी स्टेटस लगाने का जोखिम उठाते हैं। यह और बात है कि अन्य दिनों में सोशल स्टेटस मेंटेन करने के लिए उन्हें गैर-हिंदी भाषा की मदद लेनी पड़ जाती है।
आधुनिकता के नाम पर हिंदी की गद्दी पर अंग्रेजी अथवा क्षेत्रीय भाषाएं चाहे जितना आधिपत्य जमा लें, लेकिन बहुआयामी भाषा हिंदी कई मायनों में आज भी प्रासंगिक है और हमेशा रहेगी। यथा, राजनीतिक पार्टियों की दुकान हिंदी एवं गैर-हिंदीभाषी कस्टमर के नाम पर खूब चल रही है और हमेशा चलती रहेगी। पूर्वोत्तर राज्यों एवं महाराष्ट्र के निवासियों और नेताओं को हिंदीभाषी प्रवासियों के साथ भेदभाव करने और जब-तब ‘सुताई’ कर क्षेत्रीय भाषा के प्रति प्रेम-प्रदर्शन करने एवं अपनी राजनीति को चमकाने का मौका मिल जाता है।
सरकारी कार्यालयों एवं रेलवे स्टेशनों की दीवारों पर स्लोगन लिखने के काम में आज भी हिंदी भाषा का व्यापक प्रयोग किया जाता है। वाह-वाह और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच आयोजित होने वाले कवि सम्मेलन हिंदी की बुनियाद पर ही सफल होते हैं। मज़े की बात यह है कि लड़ाई-झगड़े के दौरान सामने वाले को हिंदी भाषा में गरियाने में जो सुकून मिलता है, वह अंग्रेजी भाषा के ‘इडियट’, ‘नॉनसेंस’, ‘स्टुपिड’ आदि शब्दों का उच्चारण करने से कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता।
बहरहाल, सितंबर के महीने में हिंदीभाषियों एवं हिंद के निवासियों को पितरों के साथ-साथ मातृभाषा को भी याद करने एवं ‘सेलिब्रेट’ करने का दोहरा सौभाग्य प्राप्त होता है।

