तालिबानी शासन में मीडिया का मर्दन : The Dainik Tribune

तालिबानी शासन में मीडिया का मर्दन

तालिबानी शासन में मीडिया का मर्दन

पुष्परंजन

सोमवार को तालिबान ने अपने शासन के एक साल पूरे होने पर राजधानी काबुल में जुलूस का आयोजन किया था। विजय जुलूस में साइकिलों-मोटरसाइकिलों पर सवार दाढ़ीनुमा तालिबान लड़ाकों ने अमेरिकी दूतावास के चक्कर लगाये। वे शहादा उकेरे श्वेत अमीराती ध्वज और बंदूकें लहराते नारे बुलंद कर रहे थे, ‘इस्लाम ज़िंदाबाद-अमेरिका मुर्दाबाद!’ इस घटना को कवर करने वाले पत्रकारों की संख्या गिनी-चुनी थी। तालिबान की पूरी निर्भरता काबुल स्थित बख्तार न्यूज़ एजेंसी पर है। साल भर पहले ‘इस्लामिक अमीरात’ के सत्ता में आने के दौरान जिस तरह जान-माल की तबाही हुई, उसका ज़िक्र बख्तार न्यूज़ एजेंसी नहीं करती। बारह महीनों में भयावह बेरोज़गारी, महंगाई, औरतों के हुकूक छीने जाना उसका विषय नहीं है। मीडिया की तबाही पर भी एक शब्द नहीं। तालिबान को जिस तरह की ख़बरें चाहिए, बस उसे परोसनी हैं।

बख्तार न्यूज़ एजेंसी से ही आर्थिक मंत्रालय के हवाले से जानकारी मिली कि साल भर में तालिबान शासन ने कर वसूली में 66 फीसद का इज़ाफा किया है। नागरिक समय पर कर चुका रहे हैं, और करप्शन पर इस्लामिक अमीरात तेज़ी से काबू पा रहा है। साल भर में 3,255 लोग विभिन्न अपराधों में पकड़े गये हैं। सरकारी टीवी और रेडियो ने तालिबान शासन की उपलब्धियों को बघारते हुए बताया कि सुरक्षा प्रयास मज़बूत हो रहे हैं, अफीम की खेती नहीं हो पा रही है, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हो रहा है। अफग़ान समाज अपराध व भ्रष्टाचार से मुक्त हो रहा है। भूकंप में एक हज़ार लोग मर गये। अभी परवान में आई बाढ़ में पचास लोग मर चुके हैं, सौ लापता हैं, फिर भी सब कुछ अच्छा है।

अफग़ानिस्तान में जो लोग सत्ता में हैं, उन्हें इस बात का मुग़ालता है कि वहां की ज़मीनी सूचनाएं बाहर नहीं जा सकतीं। पेरिस में पत्रकारों की एक संस्था है, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर (आरएसएफ)। इसने अफग़ानिस्तान में पत्रकारों की बदहाली पर एक सर्वे रिपोर्ट जारी की है, जिससे ‘सबकुछ चंगा सी’ की चिंदी-चिंदी उड़ गई है। इस सर्वे में इस्लामिक अमीरात ऑफ अफ़ग़ानिस्तान के पूरे एक साल का हिसाब है, जब 15 अगस्त, 2021 को ये सत्ता में आये थे। अफग़ानिस्तान के 34 में से 11 प्रांतों में आपको महिला पत्रकार दिखेंगी ही नहीं। अफग़ानिस्तान में कराये सर्वे से पता चलता है कि साल भर में पूरे देश में 39.59 मीडिया संस्थानों को बंद किया जा चुका है, और 59.86 प्रतिशत पत्रकार पेशे से हटाये जा चुके हैं।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर के अनुसार, ‘15 अगस्त, 2021 से पहले अफग़ानिस्तान में 547 मीडिया संस्थान अस्तित्व में थे। एक साल में सरकार ने हालात ऐसे कर दिये कि इनमें से 219 को ताला लगा देना पड़ा। 15 अगस्त, 2021 से पहले अफग़ानिस्तान में 11,857 पत्रकार कार्यरत थे, आज की तारीख़ में केवल 4,759 रह गये हैं। जिनके साथ सबसे बुरा हुआ है, वो हैं महिला पत्रकार।’ सर्वे पर यक़ीन करें, तो 76.19 प्रतिशत महिलाएं पत्रकारिता छोड़कर घर बैठ गई हैं।

अफ़ग़ानिस्तान के बदग़िस, हेलमंड, दाइकुंदी, ग़ज़नी, वारदाक, निमरोज़, नूरिस्तान, पाकतिया, पाकतिका, समंगन और जाबुल, ये 11 प्रांत हैं, जहां से महिला पत्रकारों को उनके काम से बेदखल किया जा चुका है। जो 656 महिला सहाफी कार्यरत हैं, उनमें से 84.6 फीसदी काबुल वाले इलाके के गिर्द केंद्रित हैं। मतलब साढ़े 15 फीसदी महिला पत्रकार अफग़ानिस्तान के 23 प्रांतों में गिनी-चुनी संख्या में मिल जाएंगी।

बीबी खातेरा नेजत उत्तर-पश्चिम स्थित तख़ार प्रांत की राजधानी तालोख़ान में विगत सात वर्षों से रेडियो हमसदा में कार्यरत थीं। 8 अगस्त, 2021 को तालिबान लड़ाकों ने उस शहर पर कब्ज़ा किया, और सबसे पहले संचार साधनों पर हमला बोला। उन्होंने रेडियो हमसदा में तोड़फोड़ की, दरवाज़े पर ताला लगा दिया। खातेरा नेजत बताती हैं कि हम तालोख़ान छोड़कर काबुल आ गये, इस उम्मीद में कि कोई जॉब मिल जाए। मगर, तालिबान का दबाव इतना बढ़ा कि हम पाकिस्तान भाग आये। यहां आबोदाना और आशियाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं।

फिर भी, कुछ महिला पत्रकारों में संघर्ष का माद्दा है, और वो काबुल में टिकी रहीं। इनमें से एक, ‘रूइदाद न्यूज’ की डायरेक्टर मीना हबीब बताती हैं कि 15 अगस्त, 2021 को हमने इस संस्था की बुनियाद रखी। कठिन परिस्थितियों में हम काम कर रहे हैं। जिस चेहरे को स्क्रीन पर दिखना है, उसे पूरा कवर होना चाहिए। मीना हबीब की शिकायत है कि नये निजाम में बनाये नियम-कायदे केवल पुरुषों को पत्रकारिता करने के अवसर दे रहे हैं। मगर, जब 54.52 प्रतिशत पुरुष भी पत्रकारिता पेशे से बाहर किये जा चुके हैं, फिर कैसे कहें कि मीना हबीब का बयान दुरुस्त है? साल भर पहले 9,101 अफग़ान पुरुष पत्रकारिता कर रहे थे। इनमें से 4,962 इस पेशे को छोड़ चुके हैं।

अफग़ान इंडिपिंडेंट जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष होजातुल्ला मोजादिदी कहते हैं, ‘इस्लामिक अमीरात को एक कमेटी बनानी चाहिए, जो नियम-कायदे बनाये, और यह सुनिश्चित करे कि पत्रकारों को ख़बरों तक पहुंचने में किसी परेशानी का सामना न करना पड़े।’ अफसोस, इस तरह की अपील का असर अमीरात सरकार पर नहीं है। अफग़ानिस्तान में इस्लामिक अमीरात के आने से पूर्व एकमात्र खेल चैनल हुआ करता था, ‘थ्री स्पोर्ट्स’। इस खेल चैनल के मालिक शफीकुल्ला सलीम पोया बताते हैं कि सबसे पहले हमारे रेवेन्यू पर चोट किया गया। फिर कई पाबंदियां हम पर आयद की गईं, कि खेल टीवी पर दिखाना और उस पर बहस गै़र इस्लामिक है। अंततः हमें चैनल बंद करना पड़ा।

अफ़ग़ानिस्तान नेशनल जर्नलिस्ट यूनियन के सदस्य मसरूर लुत्फी इस बात की उम्मीद करते हैं कि शासन के दूसरे साल में शायद इस्लामिक अमीरात मीडिया नीति बनाये और स्थिति सुधारने पर सोचे। नेशनल जर्नलिस्ट यूनियन के मुख्य कार्यकारी अहमद शोएब फ़ना प्रिंट मीडिया सूरतेहाल पर बताते हैं कि देश में आज की तारीख़ में एक भी अखबार मुद्रित नहीं हो रहा। करीब पांच साल पहले काबुल समेत दूसरे प्रांतों में पन्द्रह हज़ार अखबार प्रकाशित होते थे, और शहरों-क़स्बों में बंटते थे। 2021 से पहले घटकर डेढ़ सौ अखबार रह गये थे।

काबुल से एक राष्ट्रीय अख़बार प्रकाशित होता था, ‘अरमान मिली’। इसके मालिक सैयद शोएब परसा बताते हैं कि हमारे अंतिम 22 कर्मचारी अख़बार बंद होने के बाद सड़क पर आ गये। पेरिस में एक और संस्था है, फेडरेशन इंटरनेशनाले जर्नलिस्ट (एफआईजे)। दुनियाभर में इसके कोई छह लाख सदस्य हैं। ‘एफआईजे’ से संबद्ध ‘साउथ एशिया मीडिया सॉलिडरिटी नेटवर्क’ ने पूरी दुनिया में अपील की है कि अफग़ानिस्तान में पत्रकारों के हालात सुधारने में मदद करें। लेकिन क्या वाकई दुनिया इस अपील पर संज़ीदा है?

लेखक ईयू-एशिया न्यूज़ के नयी दिल्ली संपादक हैं।

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