वर्ष 1925 से 1928 के बीच, भगत सिंह ने बहुत ज्यादा पढ़ा; उन्होंने रूसी क्रांति व सोवियत संघ पर लिखी किताबें पढ़ीं। 1920 के दशक में, क्रांतिकारी आंदोलनों पर सबसे अधिक जानकारी रखने वालों में भगत सिंह का नाम भी शामिल था।
‘भगत सिंह न केवल भारत के महानतम स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारी समाजवादियों में से एक थे, बल्कि वे शुरुआती मार्क्सवादी विचारकों-सिद्धांतकारों में से भी एक थे। उनका बाद वाला पहलू अपेक्षाकृत कम ज्ञात है, फलत: प्रतिक्रियावादी, रूढ़िवादी और सांप्रदायिक लोग अपनी राजनीतिक विचारधारा हेतु भगत सिंह और साथियों—जिनमें चंद्रशेखर आज़ाद भी शामिल हैं—के नाम-यश का इस्तेमाल करने की कोशिश करतेे हैं।’
उपरोक्त शब्द मेरे मार्गदर्शक, प्रो. बिपन चंद्र ने भगत सिंह के बीस-पृष्ठों वाले लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ की प्रस्तावना में लिखे थे; लेख पंजाबी कवि अमरजीत चंदन ने 1979 में खोजा था। पिछले 40 वर्षों में, भगत सिंह का यह ऐतिहासिक मूल्यांकन निर्विवाद तथ्य की ताकत पा चुका है। पाठकों के मानस में बैठाने को उनकी ‘जेल नोटबुक’ के कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं कि यह किताब प्रतिष्ठित विचारकों और दार्शनिकों के विचारों की भगत सिंह द्वारा की गई पड़ताल एक नई खिड़की खोलती है।
गदर आंदोलन के इतिहासकार हरीश पुरी लिखते हैं—‘हालांकि जहां कहीं से उन्होंने ये नोट्स या उद्धरण उठाए, उन स्रोतों या किताबों के बारे में दी गई अधूरी जानकारियों ने एक उलझन भरा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। यानी, ये उद्धरण किन लेखकों विशेष से, किन किताबों के किस संस्करण से लिए गए थे? फलत: भगत सिंह जेल में जिन महान विचारकों की किताबों-रचनाओं का अध्ययन कर पाए थे, उसको लेकर उनके प्रशंसक विद्वानों ने कई मनगढ़ंत दावे-बेबुनियाद अटकलें लगा लीं।’
1925 से 1928 के बीच, भगत सिंह ने बहुत ज्यादा पढ़ा; उन्होंने रूसी क्रांति व सोवियत संघ पर लिखी किताबें पढ़ीं। 1920 के दशक में, क्रांतिकारी आंदोलनों पर सबसे अधिक जानकारी रखने वालों में भगत सिंह का नाम भी शामिल था। वर्ष 1928 के अंत में उन्होंने व साथियों ने समाजवाद को अपनी गतिविधियों का अंतिम लक्ष्य मान अपने संगठन का नाम ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ से बदलकर ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ कर दिया था।
सवाल है कि क्या भगत सिंह को मार्क्सवाद से भारतीय राष्ट्रवाद की समकालिक राजनीति, मज़दूर वर्ग के आंदोलनों और ऐतिहासिक-सामाजिक यथार्थ को समझने में मदद मिली? मार्क्सवाद पर ऐसी महारत, जो सिर्फ़ किताबों में लिखी बातों को समझने का एक अभ्यास भर हो, वह ‘ब्राह्मणवादी मार्क्सवाद’ बनकर ही रह जाएगा; जब तक कि वह पार्टी के बुद्धिजीवियों को ‘व्यावहारिक सिद्धांत’ का एक ढांचा पेश कर, समय की सामाजिक सच्चाई से निष्पक्ष होकर जुड़ने में मदद न करे।
तो फिर, किसे मार्क्सवादी विचारक कहा जा सकता है? यह सवाल इटली के बुद्धिजीवी एंटोनियो ग्राम्शी की याद दिलाता है, जो ठीक भगत सिंह की तरह ही, और ठीक उसी समय, फ़ासीवादी मुसोलिनी की जेल में, 1937 में अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले तक कैद में रहे। इन कठिन परिस्थितियों में भी, उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलन की ठोस समस्याओं, उसकी असफलताओं और सफलताओं को समझने-सुलझाने के लिए अपना पढ़ने-लिखने का काम जारी रखा।
इन दिनों, पश्चिम एशियाई संकट की बहसों में, ट्रंप और नेतन्याहू के रणनीतिक लक्ष्यों को समझाने के लिए ‘आधीनता की अवधारणा’ का खूब ज़िक्र किया जाता है। तथ्य यह है कि वहां सत्ता परिवर्तन के लिए अमेरिका और इस्राइल को सबसे पहले ईरानी समाज पर हावी होकर उसे पूरी तरह से झुका डालना होगा। जब कोई राष्ट्र या समाज, किसी दूसरे सामाजिक समूह द्वारा शासित होने के लिए ज़बरदस्ती से मजबूर किया जाता है, तभी ‘आधीनता’ स्थापित हो पाती है। पराजित लोगों के लिए यह बहुत ही कठिन क्षण होता है।
उदाहरणार्थ, 1857 के नाराज़ भारतीय विद्रोहियों को, ब्रिटिश सेना और सिख सैनिकों द्वारा हराए जाने के बाद, ब्रिटिश राज की आधीनता स्वीकार करने के लिए तब राज़ी हो पाए, जब उन्होंने देखा कि उनके कुलीन वर्ग को राज का हिस्सा बना लिया गया है। सर सैयद अहमद खान, जिन्हें 1888 में ब्रिटिश सरकार द्वारा ‘नाइट कमांडर ऑफ़ द ऑर्डर ऑफ़ द स्टार ऑफ़ इंडिया’ के सम्मान से नवाज़ा गया था– उन्हें अपने साथ जोड़कर नए शासकों की आधीनता स्वीकार करने के लिए राजी किया गया। उन्होंने भारतीय मुसलमानों के बीच विमर्श रखा कि समुदाय की तरक्की के लिए सहयोग, अथवा ब्रिटिश आधीनता को स्वीकार्य करना जरूरत है। भाव यह कि सत्ता परिवर्तन के बिना आधीनता कायम नहीं की जा सकती। भगत सिंह का मानना था कि गांधी का अहिंसा का मार्ग, भारत को अर्ध-अधीनस्थ राष्ट्र बनाने में सहयोग करने जैसा है।
इसीलिए साइमन विरोधी प्रदर्शनों के दौरान, भगत सिंह और उनके साथियों ने लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज का दोष ब्रिटिश अधिकारी जेम्स स्कॉट पर मढ़ा, लेकिन वे इस बात से अनजान रहे कि असल में यह पंजाब पुलिस के सिपाही थे, जिन्होंने उन्हें पीटा था।
भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का मानना था कि ब्रिटिश वर्चस्व की ताकत इतनी भर है कि अगर गांधी आड़े न आएं, तो वे ब्रिटिश शासन को पूरी तरह से उखाड़ फेंकने में कामयाब हो जाएंगे। परंतु वे यह नहीं देख पाए कि वही ब्रिटिश राज उन्हें मीडिया के ज़रिए अपने विचारों का प्रचार करने की अनुमति कैसे और क्यों कर दे रहा है, उन्हें अदालत तक में क्रांतिकारी गीत गाने की छूट क्यों मिली, अथवा जेल अधिकारी उन्हें किताबें पढ़ने की इजाज़त क्यों देते हैं।
यह संक्षिप्त चर्चा इस तथ्य को रेखांकित करती है कि भगत सिंह को मार्क्सवाद की केवल बुनियादी समझ ही थी। वे आधुनिक, केंद्रीकृत और नौकरशाही-आधारित राज्य की अत्यंत जटिल वास्तविकता के साथ रचनात्मक रूप से जुड़कर कोई नया वैचारिक ढांचा गढ़ने या अपनाने में असमर्थ रहे; जबकि इस राज-व्यवस्था को करोड़ों भारतीयों की सहमति से ही वैधता प्राप्त थी। वास्तव में, वे अकाली आंदोलन (1925) के अनुभवों को भी आत्मसात नहीं कर पाए—जो कि इस उपमहाद्वीप का पहला महान और शांतिपूर्ण जन-आंदोलन था, जिसे ब्रिटिश अधिकारियों ने कुचलने का प्रयास किया था। दरअसल, भगत सिंह केवल असफल ‘ग़दर आंदोलन’ को ही समझ पाए। लेकिन उसकी असफलता से कोई सबक सीखने के बजाय, उन्होंने आंख मूंदकर ग़दरपंथियों का मार्ग चुना।
लेखक जेएनयू में इतिहास के प्रोफेसर हैं।

