Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

मशाल बन सत्ता को संभालने का साहित्यिक दायित्व

एक दिन नेहरू और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर संसद भवन में साथ-साथ चल रहे थे। अचानक नेहरू कुछ लड़खड़ाये। दिनकर ने उन्हें सहारा दिया। तब नेहरू ने दिनकर को धन्यवाद देते हुए कहा था आपने मुझे गिरने से बचा लिया।...

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
featured-img featured-img
चित्रांकन संदीप जोशी
Advertisement

एक दिन नेहरू और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर संसद भवन में साथ-साथ चल रहे थे। अचानक नेहरू कुछ लड़खड़ाये। दिनकर ने उन्हें सहारा दिया। तब नेहरू ने दिनकर को धन्यवाद देते हुए कहा था आपने मुझे गिरने से बचा लिया। इस पर दिनकर ने मुस्कुराते हुए कहा था, ‘साहित्य का काम है सत्ता को संभालना’। यह बात हमारे साहित्यकार कब समझेंगे?

आप किसी को अपने घर बुलायें, और फिर उससे पूछें कि वह आपकी बातों से बोर तो नहीं हो रहा तो आप उससे क्या अपेक्षा करेंगे? यही न कि या तो वह आपसे कहेगा, अरे नहीं, आप तो बहुत अच्छी बातें बता रहे हैं, या फिर बोर हो रहा होगा तो कह देगा अपने मन की बात। ऐसे में आपसे अपेक्षा यह होती है कि आप शालीनता के साथ अपनी बात कहने का ढंग बदल देंगे। लेकिन यदि आप ऐसा न करके अपने अतिथि को अपने घर से निकल जाने और फिर कभी न बुलाने की बात कहने लगें तो आपको असभ्य और बदतमीज ही तो कहा जायेगा। उस दिन छत्तीसगढ़ के संत घासीदास विश्वविद्यालय में ऐसा ही हुआ। विश्वविद्यालय ने केंद्रीय साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग से हिंदी कहानी की दशा-दिशा पर एक कार्यक्रम आयोजित किया था। देश के बड़े-बड़े साहित्यकार वहां उपस्थित थे। इनमें से एक मनोज रूपड़ा भी थे, जिनकी गणना हिंदी के श्रेष्ठ कहानीकारों में होती है। मेजबान कुलपति शायद स्वागत भाषण दे रहे थे। अचानक उन्होंने सामने बैठे अपने एक अतिथि, मनोज रूपड़ा से पूछ लिया वे उनकी बातों से ऊब तो नहीं रहे और मनोज रूपड़ा ने ईमानदारी से कह दिया, आप मुद्दे पर बोलें तो ज़्यादा अच्छा रहेगा।

कुलपति महोदय ने इसे अपना अपमान समझा और यह कहते हुए कि वरिष्ठ कहानीकार में वॉइस चांसलर से बात करने का विवेक नहीं है, उन्हें फटकारते हुए हाल से बाहर निकलने का आदेश दे दिया। रूपड़ा उठकर बाहर चले गये, पर यह प्रकरण देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। सब तरफ कुलपति के ‘असभ्य’ व्यवहार की आलोचना हो रही है।

Advertisement

जिसने भी वायरल वीडियो पर यह प्रकरण देखा-सुना है, वह हैरान ही हो सकता है कि कुलपति जैसे ऊंचे आसन पर बैठा व्यक्ति इतना अनुचित व्यवहार कैसे कर सकता है! उम्मीद यह की जा रही थी कि कार्यक्रम के मेजबान कुलपति अपनी ग़लती का अहसास करते हुए क्षमा मांग लेंगे, या कम से कम अपने व्यवहार पर खेद तो व्यक्त करेंगे ही। पर घटना के पांच-छह दिन गुजर जाने और देशभर में उनके व्यवहार की हो रही भर्त्सना के बावजूद उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है!

Advertisement

इस दौरान साहित्य अकादमी ने एक अच्छा काम अवश्य किया है– अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने इस घटना पर खेद व्यक्त करते हुए घोषणा की है कि संत घासीदास विश्वविद्यालय को आगे से अकादमी किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं देगी और न ही विश्वविद्यालय के साथ मिलकर कोई कार्यक्रम करेगी। यह एक स्वागत-योग्य निर्णय है। खासकर ऐसी स्थिति में जबकि कुछ ही दिन पहले केंद्र सरकार द्वारा अकादमी के पुरस्कारों की घोषणा रोकने पर अकादमी की चुप्पी की आलोचना हो रही थी, साहित्य अकादमी का यह निर्णय कुछ दिलासा देने वाला है।

बहरहाल, इसमें कोई संदेह नहीं कि विवादों में घिरे कुलपति ने सिर्फ एक साहित्यकार का नहीं, पूरे साहित्य-जगत का अपमान किया है। अपमान तो उन्होंने कुलपति के पद और अपने विश्वविद्यालय का भी किया है। जिन शब्दों में, और जिस लहजे में, कुलपति महोदय ने एक साहित्यकार की भर्त्सना की थी, होना तो यह चाहिए था कि उससे वहां उपस्थित सारे साहित्यकार और बाकी श्रोता भी, स्वयं को अपमानित महसूस करते। कुछ लोग अवश्य तब उठकर हाल से बाहर चले गये थे, पर सवाल यह उठता है कि जो साहित्यकार नहीं गये, वे क्यों बैठे रहे? उन्हें क्यों नहीं लगा कि कुलपति महोदय ने एक रचनाकार का ही नहीं, सारे साहित्यकारों का अपमान किया है। आश्चर्य तो इस बात पर भी होना चाहिए कि घटना के बाद लोगों ने उस कार्यक्रम में बैठे रहना उचित समझा। बताया जा रहा है कि आयोजन में कई वरिष्ठ साहित्यकार भी उपस्थित थे। न उन्हें वहां बैठे रहना ग़लत लगा और न ही असभ्य व्यवहार करने वाले कुलपति के हाथों ‘सम्मानित’ होना! यही नहीं, घटना के इतने दिनों बाद भी, वहां बैठे रहे साहित्यकारों का कोई बयान सामने न आना भी एक रहस्यमयी चुप्पी ही लगता है।

शायद रहस्यमयी नहीं है यह चुप्पी। वे चुप क्यों रहे, यह वही जानें, पर यह अपने आप में कोई रहस्य नहीं है कि सत्ता, चाहे वह राजनीतिक हो अथवा प्रशासनिक, अक्सर साहित्य को अपने अधीन रखना चाहती है। चाहती ही नहीं, अधीन मानती भी है। न वह इतिहास से कुछ सीखना चाहती है, न ही वर्तमान को समझना चाहती है। पता नहीं, कुर्सी पर बैठे लोगों को यह याद क्यों नहीं रहता कि कभी बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल ने कवि भूषण की पालकी को कंधा देकर उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट किया था। इस इतिहास को कोई चाहे तो कल्पना भी कह सकता है, पर समझने की बात यह है कि राजा छत्रसाल और कवि भूषण का यह प्रकरण सत्ता और साहित्य के रिश्तों को परिभाषित करने वाला है। यहीं यह भी समझना ज़रूरी है कि किसी छत्रसाल (सत्ता) द्वारा सम्मानित होने के लिए भूषण (साहित्य) को अपनी पात्रता भी सिद्ध करनी होती है। संत घासीदास विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में कुलपति के द्वारा अनुचित व्यवहार के दौरान वहां उपस्थित साहित्यकारों की चुप्पी यही संकेत देती है कि या तो उन्होंने घटना में निहितार्थ को नहीं समझा या उनमें सत्ता के अनुचित घमंड का प्रतिकार करने का साहस नहीं था। ऐसे साहित्यकारों को अपने आप से यह सवाल पूछना चाहिए कि अनुचित का प्रतिकार करना उन्होंने ज़रूरी क्यों नहीं समझा। वह यह क्यों भूल गये कि साहित्य का काम सत्ता को संभालना होता है, मशाल बनकर आगे चलना होता है।

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ घटी एक घटना याद आ रही है– एक दिन नेहरू और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर संसद भवन में साथ-साथ चल रहे थे। अचानक नेहरू कुछ लड़खड़ाये। दिनकर ने उन्हें सहारा दिया। तब नेहरू ने दिनकर को धन्यवाद देते हुए कहा था आपने मुझे गिरने से बचा लिया। इस पर दिनकर ने मुस्कुराते हुए कहा था, ‘साहित्य का काम है सत्ता को संभालना’। यह बात हमारे साहित्यकार कब समझेंगे? कब उन्हें लगेगा कि जब कोई सत्ता किसी प्रकार के गर्व का शिकार बनती है तो साहित्य का काम उसका हाथ पकड़कर उसे संभालना होता है? उस दिन एक कुलपति के अनुचित व्यवहार का विरोध करके हमारे साहित्यकार अपनी पात्रता सिद्ध कर सकते थे। कुलपति ने जो किया, वह शर्मनाक था, पर उस व्यवहार का विरोध न करके साहित्यकारों का वहां बैठे रहना भी कम शर्म की बात नहीं है।

बिलासपुर की उस घटना के वायरल हुए वीडियो से जितना कुछ पता चलता है वह यही है कि कुलपति ने जो किया वह अनुचित था और वहां उपस्थित कुछ साहित्यकारों ने जो नहीं किया (यानी प्रतिकार नहीं किया) वह भी कम अनुचित नहीं था। साहित्यकारों की यह चुप्पी सवाल उठाने वाली है। अनुचित के खिलाफ खड़े न होने की विवशता से हमारे कुछ साहित्यकार कब उबरेंगे?

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

Advertisement
×