बुद्ध अंगुलिमाल से मिले, तो उसकी हिंसा रुक गई। बिना हथियार उठाए, केवल शांति और अहिंसा के संदेश से। वह भिक्षु बनकर निर्वाण की ओर अग्रसर हुआ। करुणा व हृदय परिवर्तन की मिसाल है यह कहानी। आज जरूरत है कि केवल अंगुलिमाल जन्म न लें, बुद्ध भी जन्म लें।
अंगुलिमाल श्रावस्ती के जंगलों में राहगीरों को लूटकर उनकी उंगलियां काटता और माला बनाकर गले में पहनता था। बुद्ध मिले, तो उसकी हिंसा रुक गई। बिना हथियार उठाए, केवल शांति और अहिंसा के संदेश से। वह भिक्षु बनकर निर्वाण की ओर अग्रसर हुआ। करुणा और हृदय परिवर्तन की मिसाल है यह कहानी। वर्तमान में जब धरती पर हर दिन लगभग साढ़े तीन लाख मानव शिशु जन्म ले रहे हैं, तो मानवता पुकार करती है कि केवल अंगुलिमाल जन्म न लें, बुद्ध भी जन्म लें।
आज हम अंधे युग में जी रहे हैं, जहां मानवीय श्रद्धा भी विकलांग है और विश्वास भी। एनसीआरबी डेटा के अनुसार, 2025 में पारिवारिक अपराध 20 फीसदी बढ़ गए हैं और बुद्ध जैसा आध्यात्मिक हस्तक्षेप आज पारिवारिक-सामाजिक स्तर पर गुमशुदा सा हो गया है। एक बच्चा जिसकी आंखों में हर रिश्ते पर विश्वास है, मासूमियत है, ललक है दुनिया को जानने की, उसे ईर्ष्या का शिकार बनाया जाता है। पानीपत की साइको किलर, निठारी कांड सरीखी हज़ारों घटनाएं बताती हैं कि अपनों पर विश्वास का भाव भूलभुलैया में दम तोड़ रहा है।
लेकिन जीवन रूपी सीढि़यों पर अंधेरी साजिशें इतनी हैं कि रोशनी के चेहरे पर हरकत ही नहीं होती। युवाओं का जोश कहीं बेरोजगारी की त्रासदी शिथिल कर देती है तो कहीं व्यक्तिगत मनोभाव। पढ़ाई, परीक्षा, परिवार और प्रेम के बीच हिलोरे लेती जीवन की दशा और दिशा को रिझाने के लिए जब वह केवल और केवल पैसा कमाना ही समाधान पाता है तो अतिशीघ्र मालामाल होने के रास्ते खोजता है। वह उन रास्तों पर स्वयं को संलिप्त पाता है जहां अंगुलिमाल तैयार होते हैं। इस्राइल-गाज़ा का संघर्ष, रूस-यूक्रेन युद्ध, सूडान सिविल वॉर, इथियोपिया में जानलेवा झड़पें, अलकायदा, आईएसआईएस आदि संगठनों की क्रूरता से उपजी मानवीय आपदाएं, दुनिया की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं से अधिक विध्वंसक हैं।
अस्तित्व की लड़ाई है या अहम की, यह समझने का समय, जब किसी भी पक्ष के पास न हो तो परिस्थितियों से निर्मित विषमताओं का हिमालय बनता है। मानवता रक्तरंजित नदियों की साक्षी बनती है। सतयुग, द्वापर या त्रेतायुग में, युद्ध, अस्तित्व की लड़ाई के लिए होते थे, धर्म-अधर्म, अच्छाई-बुराई या पाप-पुण्य के पृथक्करण और कुरीतियों को मिटाने के लिए होते थे। शायद इसीलिए अंगुलिमाल और बुद्ध की मुलाकात संभव थी किंतु किंतु आज युद्ध शक्ति का प्रतीक बन चुके हैं, कलुषित सोच से उपजी रणनीतियों के हैं जो निरंतर गीली लकड़ियों की तरह सुलगते रहते हैं और धुआं बनकर केवल एक क्षेत्र विशेष को नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर युद्धों की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों में गांधी या बुद्ध जैसे नेता हर मुहाने पर चाहिए अन्यथा अंतर्राष्ट्रीय नियामक संस्थाएं व संधियों के प्रयास भी नरसंहार को रोक नहीं पाएंगे। आज ओरिजिनल ह्यूमन इंटेलिजेंस से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के मॉडल प्रशिक्षित होकर जिस प्रकार प्रतिस्थापित हो रहे हैं, ऐसा न हो कि पृथ्वी पर चौरासी लाख योनियों में एक योनि आर्टिफिशियल ह्यूमन की जुड़ जाए व मानव हाशिये पर आ जाए।
आज के युग में अंगुलिमाल यूं ही नहीं जन्म लेते, कमज़ोर मन:स्थिति, दुर्बल परवरिश, उलझे हुए इतिहास, जातीय बंटवारे, कमज़ोर या नाकाम सरकारें, विदेशी दखल और दम तोड़ती शांति प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप जन्म लेते हैं। ब्रह्मांड में सूर्य विघटन से प्रकाश पैदा करता है तो पृथ्वी पर दिन होता है। रात हुई तो मानव ने ऊर्जा खोजी व रात्रि में करोड़ों घर रोशन हुए किंतु हिरोशिमा-नागासाकी, गाज़ा आदि में उसी सूत्र से करोड़ों रोशनियां बुझ गईं।
दुनिया को बुद्ध तो मिले किंतु युद्ध निरंतर होते रहे। आज साहस और दुस्साहस के बीच का महीन अंतर जो समझ जाएगा, वही युद्ध से बच पाएगा। अंगुलिमाल सिद्ध करता है कि कोई भी अपराधी परिवर्तनीय है, यदि सच्चा बुद्ध-तुल्य मार्गदर्शक मिले। आज जब विश्व के अनेक कोनों में बारूद की गंध मानवता की सांसों पर भारी पड़ रही है—तो ऐसे समय में प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं, आध्यात्मिक भी है। ‘सहस्र अंगुलिमाल, अब इतने बुद्ध कहां से लाऊं?’ यह पुकार समूची मानवता की है। इतिहास साक्षी है कि जब हिंसा अपनी पराकाष्ठा पर पहुंची, तब करुणा का एक स्वर भी दिशा बदल सकता था। गौतम बुद्ध ने अंगुलिमाल के भीतर छिपे मनुष्य को जगाया था; उन्होंने शस्त्र नहीं उठाया, दृष्टि बदली। आज आवश्यकता है कि विश्व-नेतृत्व ‘विजय’ की भाषा छोड़ ‘विवेक’ की भाषा सीखे।
‘बुद्धम् शरणं गच्छामि’ का अर्थ केवल धार्मिक उद्घोष नहीं, बल्कि एक नैतिक प्रतिज्ञा है कि मैं बुद्धत्व यानी विवेक, करुणा व संयम की शरण में जाता हूं। आज हमें हजारों बुद्ध के पुनर्जन्म की प्रतीक्षा करनी चाहिए किंतु हमें अपने भीतर के एक बुद्ध को जागृत करना है। यदि विश्व समुदाय सच में ‘बुद्धम् शरणं गच्छामि’ को आचरण में उतार ले, तो सहस्र अंगुलिमाल भी शस्त्र त्याग सकते हैं।

