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आज भी उपेक्षित राष्ट्रीयता के अग्रदूत की विरासत

गुप्त जी की पुण्यतिथि आज

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उनके सृजन का एक बड़ा हिस्सा इसी हवेली में आकार लेता रहा। यहां तक कि उनके सर्वाधिक चर्चित ‘शिवशंभू के चिट्ठे’ के कुछ अंश भी यहीं लिखे गए।

हिंदी गद्य के जनक के रूप में प्रतिष्ठित भारतेंदु युग के सेनापति, यशस्वी साहित्यकार एवं मूर्धन्य पत्रकार स्वर्गीय बाबू बालमुकुंद गुप्त की गुड़ियानी स्थित हवेली आज उपेक्षा और बदहाली का शिकार है। यह हवेली है बाबूजी के जीवन के स्वर्णिम काल, उनके बहुआयामी सृजन और हिंदी पत्रकारिता के उत्कर्ष की साक्षी रही है। इसके बावजूद आज भी यह ऐतिहासिक धरोहर राष्ट्रीय स्मारक नहीं बन पायी है।

रेवाड़ी जिले के कोसली उपमंडल तथा नाहड़ खंड के गांव गुड़ियानी के तिहाग पान्ने में स्थित यह हवेली जाटूसाना रेलवे स्टेशन से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर है। बाबू बालमुकुंद गुप्त की यह इकलौती महत्वपूर्ण विरासत अब भी संरक्षण की बाट जोह रही है।

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वैसे बाबूजी का जन्म इस हवेली से सटे बढ़ेरा पान्ने की एक अन्य हवेली में हुआ था, जो अब पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुकी है। गुड़ियानी की इस हवेली का निर्माण स्वयं बाबू बालमुकुंद गुप्त ने करवाया था। इसकी पहली मंजिल उनके द्वारा बनवाई गई, जबकि दूसरी मंजिल का निर्माण उनके पुत्र नवलकिशोर गुप्त ने करवाया। दुमंजिली हवेली का कलात्मक मुख्य द्वार, विशाल चौक, खुला जीना, ऊंचे-ऊंचे कक्ष और प्राचीन स्थापत्य कला के नमूने इसके गौरवशाली अतीत की कहानी कहते हैं। हवेली की वास्तुकला इतनी वैज्ञानिक-कलात्मक थी कि जेठ की दोपहरी में भी इसके कक्षों में प्राकृतिक ठंडक होती है।

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इस हवेली का स्वर्णिम काल वह दौर था, जब देशभर में बाबू बालमुकुंद गुप्त की लेखनी की तूती बोलती थी। उर्दू पत्रकारिता से शुरुआत करने के बाद हिंदी पत्रकारिता में उन्होंने अपनी लेखकीय प्रतिभा, निर्भीकता और वैचारिक दृढ़ता का लोहा मनवाया। हिंदी के उन्नायक और परिष्कारक के रूप में उन्हें सम्मान प्राप्त हुआ। निर्भीक पत्रकार, कुशल संपादक, सिद्धहस्त लेखक, तटस्थ समालोचक, सतर्क समीक्षक, भावपूर्ण अनुवादक, ओजस्वी कवि, चुटीले व्यंग्यकार और चिंतनशील निबंधकार के रूप में उनके बहुआयामी व्यक्तित्व ने साहित्य एवं पत्रकारिता जगत में विशिष्ट पहचान बनाई। उस समय साहित्यिक जगत की निगाहें महावीर प्रसाद द्विवेदी और बालमुकुंद गुप्त के बीच होने वाली साहित्यिक बहसों पर टिकी रहती थीं। ‘अनस्थिरता’ शब्द को लेकर हुई बहस इसका उल्लेखनीय उदाहरण है।

कभी इस हवेली के प्रत्येक कक्ष में देशभर की प्रमुख पत्र-पत्रिकाएं और तत्कालीन साहित्य की दुर्लभ कृतियां सजी रहती थीं। डाकिए प्रतिदिन ढेरों डाक लेकर यहां पहुंचते थे और उतनी ही डाक बाबूजी की ओर से देशभर में भेजी जाती थी। हिंदी और उर्दू के चर्चित रचनाकारों के पत्र, पांडुलिपियां तथा साहित्यिक सामग्री यहां अत्यंत व्यवस्थित ढंग से सुरक्षित रखी जाती थी।

परतंत्र भारत में हवेली से बाबूजी ने अपने क्रांतिकारी लेखन के माध्यम से देश में आजादी की चेतना जगाने का कार्य किया। उर्दू के अखबार ‘अखबारे-चुनार’, ‘कोहेनूर’, ‘जमाना’, ‘अवध-पंच’ तथा हिंदी के चर्चित समाचार-पत्र ‘हिंदी-बंगवासी’, ‘हिंदोस्थान’ और ‘भारतमित्र’ के अनेक अंक यहां अनमोल धरोहर के रूप में सुरक्षित रखे गए थे।

कालाकांकर, लाहौर, मथुरा, बनारस और कोलकाता जैसे तत्कालीन पत्रकारिता केंद्रों से जब बाबूजी गुड़ियानी लौटते थे, तो उनके पास ज्यादा दुर्लभ पत्र-पत्रिकाओं होती थी। उनके सृजन का एक बड़ा हिस्सा इसी हवेली में आकार लेता रहा। यहां तक कि उनके सर्वाधिक चर्चित ‘शिवशंभू के चिट्ठे’ के कुछ अंश भी यहीं लिखे गए। जब किसी समाचार-पत्र के मालिक से मतभेद हो जाते, संपादन से हटना पड़ता या बाबूजी त्यागपत्र देते, तो नए प्रतिष्ठान में कार्यभार संभालने से पहले वे कुछ समय इसी हवेली में बिताते थे। यह उनके जीवन का गहन आत्ममंथन और सृजन का महत्वपूर्ण काल होता था।

जीवन के अंतिम दिनों में अस्वस्थ रहने के बावजूद बाबूजी ने गुड़ियानी लौटने की इच्छा व्यक्त की थी, किंतु उनकी यह अंतिम इच्छा पूरी नहीं हो सकी। कोलकाता से लौटते समय 18 सितंबर, 1907 को दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने एक धर्मशाला में उन्होंने अंतिम सांस ली। बाबूजी के निधन के बाद हवेली के गुमनामी और बदहाली के लंबे दौर की शुरुआत हुई। करीब नौ दशकों तक इसके मुख्य द्वार पर ताला पड़ा रहा। शोध के नाम पर अनेक लोग यहां से अनमोल सामग्री ले गए, जिससे इस धरोहर को अपूरणीय क्षति पहुंची।

कालांतर एक साहित्यिक संस्था की पहल पर बाबूजी के पौत्र सेठ हरिकृष्ण गुप्त ने हवेली का जीर्णोद्धार करवाया। यहां पुनः साहित्यिक गतिविधियों की रौनक लौटने लगी। बाबूजी के प्रपौत्र बिमल गुप्त प्रतिवर्ष 18 सितंबर को यहां उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उन्होंने गत वर्ष हिंदी दिवस के अवसर पर हवेली की रजिस्ट्री हरियाणा सरकार के नाम कर दी है। आखिर कब यह ऐतिहासिक धरोहर राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा प्राप्त कर पाएगी?

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