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न्याय की भाषा और भाषा का न्याय

जन-मन की भाषा

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न्याय केवल एक आदेश पत्र नहीं है, बल्कि पीड़ित के मन में उपजी वह संतुष्टि है जो उसे यह विश्वास दिलाती है कि उसकी बात सुनी गई। जिस दिन एक आम भारतीय अपनी अदालत के फैसले को स्वयं पढ़कर गौरव महसूस करेगा, उसी दिन हम भारत के लोग का संवैधानिक वादा पूरा होगा।

किसी भी जीवंत लोकतंत्र की सफलता नागरिकों और संस्थाओं के बीच अटूट संवाद पर टिकी है, लेकिन भारतीय अदालतों में यह डोर अक्सर भाषाई बाधाओं के कारण टूट जाती है। कल्पना कीजिए उस मुवक्किल की, जिसके जीवन का फैसला उसकी अपनी भाषा में नहीं हो रहा। हाल ही में न्याय की देवी की आंखों से प्रतीकात्मक पट्टी तो हटा दी गई ताकि यह संदेश जाए कि न्याय सबको देखता है, लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं हुआ।

आज भी जब अदालत की कार्यवाही मुवक्किल के लिए ‘विदेशी’ भाषा में होती है तो लगता है कि आंखों की पट्टी अब ‘भाषाई पट्टी’ में बदल गई है। निष्पक्षता का नया प्रतीक आज भी आम नागरिक ‘बौद्धिक रूप से बहिष्कृत’ करने वाले औपनिवेशिक भाषाई औजार के सामने बेबस है। इस विडंबना का सबसे मार्मिक दृश्य तब उभरता है जब जीवन भर की कानूनी लड़ाई लड़ने वाला व्यक्ति फैसले के बाद अपने ही वकील से पूछता है–‘साहब, मैं जीता या हारा?’ यह सवाल उस व्यवस्था पर मूक प्रहार है जहां न्याय तो होता है, पर वह पीड़ित की समझ से कोसों दूर रहता है।

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लोकतंत्र की असली परिपक्वता तभी सिद्ध होगी जब न्याय की भाषा और पीड़ित की भाषा का यह फासला खत्म होगा और कानून वास्तव में ‘जनता की भाषा’ में संवाद करेगा। भारत में उच्च न्यायपालिका की भाषा मुख्य रूप से अंग्रेजी है, जो लॉर्ड मैकाले की उसी शिक्षा नीति की विरासत है, जिसका लक्ष्य भारतीयों को उनकी जड़ों से काटना था। आज ‘आजादी के अमृत काल’ में भी अनुच्छेद 348(1)(क) के कारण सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की कार्यवाही अंग्रेजी में ही होती है। यह विडंबना है कि जिस देश की 90 प्रतिशत आबादी अंग्रेजी नहीं जानती, वहां के सबसे बड़े अदालती फैसले उसी भाषा में दिए जाते हैं।

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अदालतों में मुवक्किल की स्थिति उस मूकदर्शक जैसी होती है जो अपनी ही कहानी को किसी और की जुबानी, एक अनजान भाषा में सुन रहा है। वह वकील की दलीलों पर केवल गर्दन हिलाता है, उन्हें समझता नहीं। ‘भाषा का न्याय’ तब खंडित होता है जब एक ग्रामीण किसान को यह समझने के लिए अनुवादक की आवश्यकता पड़ती है कि फैसला उसके हक में है या खिलाफ। यह अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सूक्ष्म उल्लंघन है, क्योंकि ‘न्याय तक पहुंच’ में उसे ‘समझना’ भी शामिल है।

न्याय की भाषा केवल अंग्रेजी होने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पुराने लैटिन शब्दों के भारी बोझ से भी दबी हुई है। उत्प्रेषण, पूर्व न्याय और दूसरे पक्ष को भी सुनो जैसी कानूनी शब्दावलियां एक आम नागरिक के लिए किसी अबूझ पहेली या जादू-टोने के मंत्र जैसी प्रतीत होती हैं। समय-समय पर न्यायपालिका में इस पर बहस हुई है। ‘मधु लिमये बनाम वेदानंद शर्मा (1970)’ के मामले में जब मधु लिमये ने हिंदी में बहस की अनुमति मांगी, तो उसे खारिज कर दिया गया। इसके विपरीत, यदि हम वैश्विक परिदृश्य देखें, तो फ्रांस में फ्रांसीसी, जर्मनी में जर्मन, जापान में जापानी और चीन में मंदारिन का प्रयोग होता है। वहां कानून को ‘आम आदमी की समझ’ से बाहर की चीज नहीं माना जाता। भारत में तर्क दिया जाता है कि अंग्रेजी हमें वैश्विक व्यवस्था से जोड़ती है, लेकिन क्या यह तर्क उस गरीब की संतुष्टि से बड़ा है जिसे अपनी हार या जीत का कारण ही समझ नहीं आता?

डिजिटल युग में ‘सुवास’ (सुप्रीम कोर्ट विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर) जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल का विकास भाषाई दीवार को गिराने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है, जो अदालती फैसलों को क्षेत्रीय भाषाओं में सुलभ बना रहा है। हालांकि, अनुवाद कभी भी अभिव्यक्ति का पूर्ण विकल्प नहीं हो सकता क्योंकि इसमें अक्सर कानूनी बारीकियां और संवेदनाएं खो जाती हैं। वास्तविक न्याय तब होगा जब हम ‘अनुवादित न्याय’ से आगे बढ़कर ‘मौलिक भाषाई न्याय’ की ओर बढ़ेंगे, जहां फैसले अनुवाद के भरोसे न रहकर सीधे पीड़ित की मातृभाषा में लिखे जाएं। आज भारत में भी एक सशक्त ‘सरल भाषा आंदोलन’ की नितांत आवश्यकता है, ताकि कानून की पेचीदगियों को 10वीं कक्षा का एक सामान्य छात्र भी आसानी से समझ सके। इस दिशा में कुछ ठोस और व्यावहारिक कदम उठाने होंगे, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद 348(2) का विस्तार करना है ताकि उच्च न्यायालयों में क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग को वास्तविक बढ़ावा मिल सके।

आधुनिक दौर में तकनीक का लाभ उठाते हुए एक ‘द्विभाषी व्यवस्था’ विकसित की जानी चाहिए, जहां अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग के दौरान स्थानीय भाषाओं में सबटाइटल उपलब्ध हों। इसके साथ ही, विधि शिक्षा के पाठ्यक्रम में सुधार करना अनिवार्य है ताकि भविष्य के वकील अपनी मिट्टी की बोली और संवेदनाओं से जुड़े रहें। प्रत्येक न्यायिक फैसले के अंत में एक ‘सरल सारांश’ जोड़ने की परंपरा शुरू होनी चाहिए, जो भारी-भरकम कानूनी शब्दावलियों से मुक्त हो और आम नागरिक को यह स्पष्ट कर सके कि वास्तव में फैसला क्या हुआ है।

न्याय केवल एक आदेश पत्र नहीं है, बल्कि पीड़ित के मन में उपजी वह संतुष्टि है जो उसे यह विश्वास दिलाती है कि उसकी बात सुनी गई। जिस दिन एक आम भारतीय अपनी अदालत के फैसले को स्वयं पढ़कर गौरव महसूस करेगा, उसी दिन हम भारत के लोग का संवैधानिक वादा पूरा होगा।

लेखक कुरुक्षेत्र विवि के विधि विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं।

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