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लाभकारी टिकाऊ बिजनेस मॉडल की ओर बढ़ता रुझान

स्टार्टअप का लेखा-जोखा

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साल 2025 स्टार्टअप की दुनिया में उत्साह से अधिक विवेक का वर्ष रहा। यह स्पष्ट हुआ कि स्टार्टअप्स का भविष्य केवल बड़ी वैल्यूएशन में नहीं, बल्कि टिकाऊ बिज़नेस और सामाजिक प्रभाव में है। वहीं भारत ने साबित किया कि उसका स्टार्टअप इकोसिस्टम अब परिपक्वता की ओर बढ़ रहा है।

साल 2025 स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए एक अहम मोड़ साबित हुआ, जहां केवल तेज़ ग्रोथ के बजाय टिकाऊ बिज़नेस मॉडल, मुनाफ़े और सामाजिक प्रभाव पर भी जोर दिया जाने लगा। अब स्टार्टअप्स को सफलता के लिए दीर्घकालिक स्थिरता और सामाजिक योगदान की कसौटी पर भी परखा जाने लगा है। पिछले एक दशक की तुलना में 2025 को ‘संयम और परिपक्वता’ का वर्ष कहा जा सकता है-जहां दुनिया भर में स्टार्टअप्स की संख्या भले ही तेज़ी से न बढ़ी हो, लेकिन जो स्टार्टअप टिके, वे अधिक मज़बूत और व्यावहारिक साबित हुए।

वर्ष 2025 में वैश्विक स्तर पर स्टार्टअप गतिविधियां अधिक यथार्थवादी रहीं। दुनियाभर में हजारों नए स्टार्टअप सामने आए, लेकिन निवेशकों और बाज़ार का रुख साफ़ था- अब केवल ‘आइडिया’ नहीं, बल्कि रेवेन्यू, कैश फ्लो और स्पष्ट बिज़नेस मॉडल मायने रखते हैं। कोरोना काल के बाद स्टार्टअप्स में निवेश एक तरह की दौड़ बन गया था, वहीं 2025 में फंडिंग अपेक्षाकृत चयनात्मक रही। अमेरिका, यूरोप और एशिया में बड़ी संख्या में स्टार्टअप्स ने खुद को पुनर्गठित किया, कई का विलय हुआ और कुछ बाज़ार से बाहर भी हो गए। वैश्विक स्तर पर अनुमान लगाया जाता है कि 2025 में लाखों नए स्टार्टअप पंजीकृत हुए, लेकिन उनमें से एक सीमित प्रतिशत ही वास्तव में ‘सफल’ कहलाने योग्य रहे-यानी जिन्होंने स्थिर राजस्व, विस्तार या लाभप्रदता की दिशा में ठोस कदम बढ़ाए।

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वर्ष 2025 में सफलता की परिभाषा बदल गई। पहले जहां यूनिकॉर्न बनना ही सफलता का प्रतीक माना जाता था, वहीं अब सस्टेनेबल ग्रोथ, मुनाफ़ा और दीर्घकालिक टिकाव को अधिक महत्व दिया जाने लगा। टेक्नोलॉजी, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, हेल्थटेक, क्लाइमेट टेक, फिनटेक और डीप-टेक जैसे क्षेत्रों में स्टार्टअप्स ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। इसके विपरीत, केवल उपभोक्ता छूट और तेज़ विस्तार पर आधारित कई मॉडल कसौटी पर खरे नहीं उतरे।

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भारत 2025 में भी दुनिया के सबसे सक्रिय स्टार्टअप देशों में शामिल रहा। देश में लगभग 22,000 से अधिक नए स्टार्टअप्स पंजीकृत हुए- जो एक महत्वपूर्ण वृद्धि दर्शाता है और उद्यमशीलता की गति स्पष्ट करता है। हालांकि, बीता वर्ष भारत के लिए भी ‘छंटाई’ का वर्ष रहा- स्टार्टअप्स की संख्या में वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी पड़ी, लेकिन गुणवत्ता व फोकस में सुधार दिखा। कई स्टार्टअप्स ने आक्रामक विस्तार के बजाय लागत नियंत्रण, स्थानीय बाज़ार और मुनाफ़े पर ध्यान दिया। साल 2025 में भारत के स्टार्टअप परिदृश्य में एक सीमित हिस्सा ही बड़े पैमाने पर सफल हुआ। कुछ स्टार्टअप्स ने मुनाफ़े की दिशा में कदम बढ़ाए , कई का विलय या अधिग्रहण हुआ और कुछ बाज़ार की वास्तविकताओं के सामने टिक नहीं पाए। यह स्थिति नकारात्मक नहीं, बल्कि स्वस्थ इकोसिस्टम का संकेत है, जहां अव्यावहारिक मॉडल खुद ही बाहर हो जाते हैं।

2025 में वैश्विक स्टार्टअप परिदृश्य में भारत की स्थिति तीसरे या चौथे सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम के रूप में बनी रही। अमेरिका और चीन के बाद भारत को अक्सर यूरोप के साथ तुलना में रखा जाने लगा। भारत ने लगभग 125 यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स बनाए ( स्टार्टअप्स जिनकी वैल्यू $1 बिलियन से अधिक है)। इनमें से कई ने इस वर्ष यह मुकाम हासिल किया और ग्रोथ जारी रखी।

भारत की खासियत रही कि वह केवल उपभोक्ता बाज़ार नहीं, बल्कि नवाचार और स्केल- दोनों का केंद्र बन रहा है। भारतीय स्टार्टअप्स अब केवल घरेलू नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों को भी लक्ष्य बना रहे हैं। हालांकि, पूंजी की उपलब्धता, गहन तकनीकी अनुसंधान और वैश्विक ब्रांड निर्माण के मामले में भारत अभी विकसित देशों से पीछे है। 2025 में स्टार्टअप निवेशकों का व्यवहार बदला हुआ दिखा। ‘ग्रोथ एट ऑल कॉस्ट’ की जगह ‘सस्टेनेबल रिटर्न’ निवेश का मंत्र बना। भारत में शुरुआती चरण के स्टार्टअप्स को अपेक्षाकृत समर्थन मिला, लेकिन बड़े फंडिंग राउंड्स की संख्या सीमित रही। इससे स्टार्टअप्स को अपने खर्च और रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ा। भारत में तकनीकी स्टार्टअप्स के लिए फंडिंग माहौल चुनौतीपूर्ण रहा। कुल इक्विटी फंडिंग पिछले साल के मुकाबले लगभग $10.5 बिलियन तक गिर गई। यह संकेत है कि निवेशक अब और अधिक सावधानी से धन लगा रहे हैं और केवल ‘स्पष्ट प्रगति वाला मॉडल’ ही पूंजी आकर्षित कर पा रहा है।

2025 ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम के सामने कई संरचनात्मक चुनौतियां हैं। वैश्विक अनिश्चितता का सीधा असर भारतीय स्टार्टअप फंडिंग पर पड़ता है। मसलन भारत में अब भी उपभोक्ता-आधारित स्टार्टअप्स की संख्या अधिक है, जबकि गहरे तकनीकी नवाचार की कमी महसूस की जाती है। टैक्स, अनुपालन और राज्यों के बीच अलग-अलग नियम कई स्टार्टअप्स के लिए बाधा बनते हैं। उच्च स्तरीय तकनीकी और प्रबंधन प्रतिभा की मांग तेज़ी से बढ़ रही है, लेकिन उपलब्धता सीमित है।

साल 2025 स्टार्टअप की दुनिया में उत्साह से अधिक विवेक का वर्ष रहा। स्पष्ट हुआ कि स्टार्टअप्स का भविष्य केवल बड़ी वैल्यूएशन में नहीं, बल्कि समस्या समाधान, टिकाऊ बिज़नेस और सामाजिक प्रभाव में निहित है।

भारत ने 2025 में साबित किया कि उसका स्टार्टअप इकोसिस्टम अब किशोरावस्था से निकलकर परिपक्वता की ओर बढ़ रहा है। चुनौतियां मौजूद हैं, लेकिन दिशा स्पष्ट है। यदि भारत पूंजी, नीति और कौशल के मोर्चे पर संतुलन बना पाया, तो कुछेक वर्षों में वह वैश्विक स्टार्टअप दुनिया में बड़ा खिलाड़ी बनने के साथ ही दिशा देने वाला देश भी बन सकता है।

लेखक विज्ञान विषयों के जानकार हैं।

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