अरावली पहाड़ियों के लिए कोई एक परिभाषा अपनाने और कानून बनाने से पहले सरकार और सुप्रीम कोर्ट को सभी कोणों से इसकी जांच करनी चाहिए। ऐसी परिभाषा न हो जो इन पर्वत शृंखलाओं को सीधे या अप्रत्यक्ष नुकसान पहुंचा सकती है। लक्ष्य संरक्षण हो न कि बाजारी ताकतों द्वारा अंधाधुंध दोहन।
अरावली पहाड़ियां कभी अरबों साल पहले टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने से बनी ऊंचे वलित पहाड़ों की शृंखला थी जो लाखों साल की टूट-फूट और कटाव से घिसकर ऊंची-नीची पहाड़ियों, चोटियों व चट्टानी उभारों की शृंखला बन गई हैं। ये पहाड़ियां 300 से 900 मीटर तक हैं, कई कम ऊंची भी हैं जबकि राजस्थान के माउंट आबू पठार पर गुरु शिखर की सबसे ऊंची चोटी समुद्र तल से 1,722 मीटर ऊंचाई तक है।
हाल ही में अरावली ने पर्यावरण विशेषज्ञों, समाज और मीडिया का ध्यान खींचा जब किसी पहाड़ी को अरावली का हिस्सा मानने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एमओइएफसीसी समिति द्वारा प्रस्तावित स्थानीय तल से 100 मीटर ऊंचाई वाली शर्त मंजूर करते हुए एक फैसला सुनाया जिससे सड़कों पर विरोध और बयानबाज़ी होने लगी।
2024 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अरावली पहाड़ों की एक समान परिभाषा बनाने के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत तकनीकी समिति का गठन किया गया, जिसमें समुद्र तल के बजाय स्थानीय तल आधारित राजस्थान की मौजूदा परिभाषा को शामिल किया जा सके। राजस्थान की परिभाषा पर भरोसा करते हुए, समिति ने मानदंड तैयार किए कि पहाड़ी को अरावली रेंज का हिस्सा मानने के लिए इसकी ऊंचाई आसपास के स्तर से 100 मीटर होनी चाहिए या इसे अरावली शृंखला में दो योग्य पहाड़ियों के बीच 500 मीटर दायरे में होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर, 2025 को इस परिभाषा को मंजूर कर लिया, जिसका व्यापक विरोध हुआ।
सरकार ने इस परिभाषा का बचाव करते हुए इसे मात्र ‘तकनीकी’ स्पष्टीकरण बताया और कहा कि राजस्थान में यह 2006 से लागू है व इससे अरावली की हर जगह एक जैसी सुरक्षा करने में मदद मिलेगी, जबकि आलोचना के भी यही बिंदु हैं। गत 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक असंतोष का हवाला देकर 20 नवंबर के अपने आदेश पर रोक लगा दी।
अरावली के लिए टेक्निकल कमेटी द्वारा सुझाई समुद्र तल के बजाय लोकल-एरिया तल से 100 मीटर ऊंचाई वाली व्याख्या अपने आप में त्रुटिपूर्ण, अवैज्ञानिक और मनमानी आधारित है, न कि पहाड़ी की ऊंचाई मापने के यूनिवर्सल स्टैंडर्ड के मुताबिक। यह क्षेत्र ऐसे भी समुद्र तल से 100 मीटर से ज़्यादा ऊंचा है, यानी यहां के स्थानीय स्थल से 99 मीटर ऊंचा पहाड़ समुद्र तल से 199 मीटर ऊंचा होगा परन्तु टेक्निकल समिति की व्याख्या अनुसार यह पहाड़ अरावली का हिस्सा नहीं माना जायेगा जब तक 100 मीटर ऊंचे दो पहाड़ों के 500 मीटर दायरे में नहीं आएगा। इससे राजस्थान के 90 फीसदी पहाड़ अरावली रेंज से बाहर हो जाएंगे। भारतीय वन सर्वेक्षण मुताबिक, राजस्थान में 12081 अरावली पहाड़ियों में से सिर्फ 1048 (8.7 फीसदी) ही 100 मीटर ऊंचाई का मापदंड पूरा करेंगी।
समुद्र तल एक यूनिवर्सल स्टैंडर्डाइज़्ड रेफरेंस पॉइंट है, जबकि लोकल रिलीफ मनमाना है। दूसरा, राजस्थान में एक परिभाषा है और उसी के अनुसार माइनिंग की अनुमति है, जबकि दिल्ली और हरियाणा में अरावली पहाड़ियों के लिए ऐसी कोई परिभाषा नहीं और माइनिंग पर रोक है। कमेटी ने राजस्थान लीगल कोड में अरावली को परिभाषित कर ‘एक समानता’ जोड़ी व इसे हरियाणा और अरावली रेंज साझा करने वाले सभी राज्यों में लागू किया, जिससे कानूनन हरियाणा में भी माइनिंग और अन्य गतिविधियों की अनुमति की राह खुलती है।
परिभाषा का घोषित लक्ष्य अरावली में माइनिंग को ‘रेगुलेट’ करना है, न कि रोकना। दिल्ली और हरियाणा में अरावली में ज़्यादा अलग-थलग छोटी पहाड़ियां और चोटियां हैं। यही वह मुख्य बात है जिस पर रियल एस्टेट कारोबारियों की नज़र है, जो गुड़गांव व फरीदाबाद जिलों में अपने कार्य को कानूनी रूप देना चाहते हैं, जहां वे किसी न किसी तरह से पहले ही काम कर रहे हैं, जिससे वहां जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं। साल 2023 के एक सर्वे में, इस इलाके में 786 एकड़ ज़मीन पर मंज़ूरशुदा इमारतों के अलावा, लग्ज़री फार्म हाउस, रिसॉर्ट, बैंक्वेट हॉल, घर, धार्मिक स्थल और शैक्षणिक संस्थान वगैरह के रूप में 6793 गैर-कानूनी स्ट्रक्चर पाए गए।
यह बाज़ार-संचालित खनन, वनों की कटाई और रियल एस्टेट विकास है जिससे अरावली पहाड़ियों को खतरा है। एक बार जब अरावली के कुछ हिस्सों को उसके दायरे से बाहर रखने के लिए परिभाषित किया जाएगा, तो खनन और रियल एस्टेट कंपनियों को न उस क्षेत्र पर कानूनन कब्ज़ा करने की अनुमति मिल जाएगी; इसके बाद उन्हें अरावली के दिल में प्रवेश करने से नहीं रोका जा सकेगा। बाज़ार-संचालित ताकतें इसी तरह काम करती हैं। ‘मुनाफ़ा ज़्यादा से ज़्यादा करने’ के मकसद से काम करने वाली बाज़ार-संचालित ताकतें मानवीय, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और प्राकृतिक चिंताओं के ‘बाहरी प्रभावों’ पर ध्यान नहीं देतीं, जिसके चलते प्रदूषण, संसाधनों की कमी और सांस्कृतिक विरासत का नुकसान होता है।
यहीं पर सरकारों को हस्तक्षेप करना होगा और बाज़ार की ताकतों को अपने पक्ष में सब कुछ तय करने देने के बजाय मानव कल्याण, पर्यावरण और पारिस्थितिक संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी। इसलिए, अरावली पहाड़ियों के लिए एक ऐसी परिभाषा, जो दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत शृंखलाओं में से एक को सीधे या अप्रत्यक्ष नुकसान पहुंचा सकती है, अपनाने और कानून बनाने से पहले सरकार और सुप्रीम कोर्ट को सभी कोणों से इसकी जांच करनी चाहिए।

