गाली अक्सर उस आक्रोश का विकृत रूप होती है जिसे सभ्य भाषा में अभिव्यक्ति का रास्ता नहीं मिलता। गाली का एक बड़ा पक्ष यह भी है कि इस शाब्दिक हिंसा के केंद्र में महिलाएं हैं। शायद यह हमारे पितृसत्तात्मक समाज की एक कुत्सित उपज है, जहां 90 प्रतिशत गालियां महिलाओं को निशाना बनाती हैं। यह हमारे परंपरागत ‘स्त्री-रक्षा’ और ‘गरिमा’ के सिद्धांत का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
शब्द केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि चेतना का विस्तार हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा में ‘वाक्’ को दिव्य शक्ति और ब्रह्म का स्वरूप माना गया है। ऋग्वेद से लेकर छांदोग्य उपनिषद तक, भाषा की पवित्रता को सृजन और सत्य के आधार के रूप में स्थापित किया गया है। लेकिन माैजूदा दौर में, जब हिंदी-पट्टी से लेकर सार्वजनिक मंचों तक अभद्र भाषा व अपशब्दों की बाढ़ आ गई है, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमने अपनी सांस्कृतिक जड़ों से नाता तोड़ लिया है? जब समाज का ‘शब्द-कोष’ भद्र से अधिक अभद्र की ओर झुकने लगे, तो वह केवल भाषाई गिरावट नहीं, बल्कि गहरे बौद्धिक और नैतिक पतन का संकेत है।
हाल ही में देश में पेपर लीक के विरोध में हुए बड़े छात्र प्रदर्शनों के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उन छात्रों को ‘माफ करने’ का बयान, जिसमें उन्होंने स्वयं को दी गई गालियों का संदर्भ दिया, इस बहस को एक नए मोड़ पर ले आता है। यह घटना सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि हमारे सार्वजनिक जीवन में गालियों के सामान्यीकरण को रेखांकित करती है। जब देश के शीर्ष पदों पर बैठे कुछ लोग और भविष्य की उम्मीद माने जाने वाले छात्र-दोनों एक ही भाषाई धरातल पर आ खड़े हों, तो चिंता स्वाभाविक है।
दरअसल, जब सार्वजनिक जीवन में नेता, राजनीतिक कार्यकर्ता, टीवी बहसें और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर लगातार आक्रामक भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो युवाओं से शिष्ट भाषा की अपेक्षा करना कुछ हद तक विरोधाभासी हो जाता है। यदि विरोधी को तर्क के बजाय शाब्दिक अपमान से हराना राजनीतिक सफलता का संकेत बना दिया जाए, तो वही संस्कृति धीरे-धीरे विश्वविद्यालय और सड़क तक पहुंचेगी। सोशल मीडिया ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया। वहां सबसे संयमित वाक्य अक्सर सबसे कम वायरल होता है और सबसे उत्तेजक वाक्य सबसे अधिक प्रसारित। परिणाम यह कि संवाद की जगह प्रदर्शन, तर्क की जगह ट्रोलिंग और असहमति की जगह अपमान लेता जा रहा है।
संकट राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से परे, हमारे संवाद की संस्कृति का है जो ‘शब्द ब्रह्म’ के बजाय ‘शब्द हिंसा’ को प्राथमिकता दे रही है। मनोवैज्ञानिक व सामाजिक दृष्टि से गाली देने का एक बड़ा कारण ‘दबदबा’ साबित करना और विपक्षी को नीचा दिखाना होता है। समाज के ऊंचे-नीचे पायदानों के बीच, हमारे देश में गाली एक तरह का औपनिवेशिक अवशेष है। जिस तरह अंग्रेज अपनी भाषा के जरिए रौब जमाते थे, आज के दौर में एक वर्ग अपनी बात में वजन लाने को गालियां जोड़ता है। एक वर्ग अंग्रेजी में गालियां देता है, तो दूसरा वर्ग स्थानीय अपशब्दों का सहारा लेता है। दुर्भाग्य से, यह गालीखोर की ताकत नहीं, बल्कि शब्दों की दरिद्रता है। वैसे तो गाली का यह प्रचलन देश में चौतरफा है, लेकिन खासतौर से हिंदी-पट्टी में यह अब निजी बातचीत से निकलकर सोशल मीडिया, फिल्मों, ओटीटी प्लेटफॉर्म व युवा आंदोलनों तक पहुंच गई है।
हालांकि, हमें यह भी देखना चाहिए कि गाली पैदा कैसे और कहां से हुई? क्या वह केवल किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत कुंठा थी या उसके पीछे व्यवस्था के प्रति जमा हुआ कोई गहरा असंतोष भी था? गाली को स्वीकार करना समाधान नहीं है। लेकिन गाली को सुनकर केवल गाली देने वाले को कठघरे में खड़ा कर देना भी पर्याप्त नहीं है। क्योंकि गाली अक्सर उस आक्रोश का विकृत रूप होती है जिसे सभ्य भाषा में अभिव्यक्ति का रास्ता नहीं मिलता। गाली का एक बड़ा पक्ष यह भी है कि इस शाब्दिक हिंसा के केंद्र में महिलाएं हैं। शायद यह हमारे पितृसत्तात्मक समाज की एक कुत्सित उपज है, जहां 90 प्रतिशत गालियां महिलाओं को निशाना बनाती हैं। यह हमारे परंपरागत ‘स्त्री-रक्षा’ और ‘गरिमा’ के सिद्धांत का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। इस पर भी जब महिलाएं भी समानता के नाम पर उन्हीं महिला-केंद्रित गालियों को अपनाती हैं, तो वे अपनी गरिमा को ऊंचा नहीं करतीं, बल्कि उसी पितृसत्तात्मक ढांचे को अनजाने में पोषित करती हैं।
यहां यह समझना आवश्यक है कि गाली के सभी रूप समान नहीं होते। हमारी लोक परंपराओं में होली के गीतों या शादी-ब्याह के ‘गाली गीतों’ में जो अपशब्द हैं, वह मर्यादाहीन नहीं, बल्कि ‘लीला’ और हास-परिहास का हिस्सा है। ब्रज की लठमार होली या मिथिला-बिहार के विवाह गीतों में प्रयुक्त शब्द ‘स्वागत’ और ‘अपनापन’ के प्रतीक हैं। वहां उद्देश्य अपमान करना नहीं, बल्कि सामाजिक बंधन हल्के करना है। इसके उलट, आज जो गालियां हम सुन रहे हैं, वे प्रताड़ना, अपमान और दबदबे के लिए हैं। यह संस्कृति के ‘लालित्य’ का नहीं, बल्कि ‘कलुष’ का विस्तार है।
भगवद्गीता (अध्याय 17, श्लोक 15) में वाणी की तपस्या का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि शब्द सत्य, प्रिय और हितकारी होने चाहिए। जो शब्द उद्वेग पैदा न करें, वही वास्तविक ‘वाक्’ है। भारतीय ज्ञान परंपरा में ‘वाक्’ को देवी के रूप में वर्णित किया गया है। ऋग्वेद और छांदोग्य उपनिषद के अनुसार, वाणी ही वह शक्ति है जो सृष्टि की रचना करती है और सत्य को प्रकट करती है। श्रीमद्भगवद्गीता (17.15) वाणी की तपस्या का सार बताती है : ‘अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।’ अर्थात्—ऐसे शब्द जो उद्वेग पैदा न करें, जो सत्य हों, प्रिय हों और हितकारी हों—यही वाणी का तप है। चाणक्य ने भी स्पष्ट किया था कि मधुर वाणी से ही लक्ष्मी प्रसन्न होती है और समाज का निर्माण होता है। हमारी विरासत हमें सिखाती है कि शब्द का प्रयोग शस्त्र की तरह नहीं, बल्कि प्रकाश की तरह होना चाहिए।
आज के जननायकों, मीडिया और युवाओं को यह समझने की जरूरत है कि भाषा आत्म-अभिव्यक्ति का साधन है, न कि विभेद का। यदि हम सेना या पुलिस की तरह यह तर्क देते हैं कि ‘अपराधियों से निपटने के लिए गाली जरूरी है’, तो यह केवल अपनी अक्षमता को छिपाने का बहाना है। क्या हम इतने कमजोर हो गए हैं कि भाषाई अभद्रता के बिना अपनी बात में दम पैदा नहीं कर सकते? असल में, गाली देने वाला व्यक्ति यह भूल जाता है कि ‘कर्म’ के सिद्धांत के अनुसार, वह नकारात्मक ऊर्जा का उत्सर्जन कर रहा है, जो अंततः समाज को खोखला करती है। महात्मा गांधी ने अहिंसा को वाचिक स्तर तक विस्तार दिया था; उनके लिए कठोर शब्द भी एक प्रकार की हिंसा थी।
इस भाषाई कलुष को दूर करना रातों-रात संभव नहीं है। इसके लिए शिक्षा प्रणाली में मानवीय मूल्यों को शामिल करना होगा, मीडिया को अपनी जवाबदेही तय करनी होगी और नई पीढ़ी को यह समझाना होगा कि सच्ची ‘कूलनेस’ अभद्र वाणी में नहीं, बल्कि शब्दों के संयम और स्पष्टता में है। हमें वापस उन मूल्यों की ओर लौटना होगा जहां ‘सत्यं शिवं सुंदरम्ा्’ का मंत्र हमारी वाणी में गूंजता था। अन्यथा, गालियों की यह बाढ़ हमारी सांस्कृतिक विरासत को उस मोड़ पर ले आएगी, जहां हम सभ्य समाज कहलाने के अधिकार को खो देंगे। याद रहे, भाषा समाज का आईना होती है। अगर हम आज शब्दों का सम्मान करना भूल गए, तो कल आने वाली पीढ़ी हमसे संवाद के शिष्टाचार की उम्मीद कैसे रखेगी? समय आ गया है कि हम ‘गाली’ की इस बुरी आदत को ठुकराकर ‘शब्द’ की पवित्रता को पुनर्स्थापित करें।
लेखक मीडिया यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

