जब एल्गोरिद्म यह तय करने लगें कि किसे निशाना बनाया जाए, तो मानव नैतिकता और जिम्मेदारी का स्थान क्या होगा? युद्ध का निर्णय केवल तकनीकी गणना का विषय नहीं हो सकता। हर लक्ष्य के पीछे मनुष्य का जीवन और समाज की संरचना जुड़ी होती है।
हाल ही में ईरान पर हुए हमलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध अब केवल हथियारों की ताकत से नहीं, बल्कि डेटा, एल्गोरिद्म और मशीनों की गति से भी लड़े जा रहे हैं। पिछले दिनों अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा ईरान पर किए गए हमलों में एआई की निर्णायक भूमिका सामने आई। रिपोर्टों के अनुसार, एआई आधारित ‘मेवन स्मार्ट सिस्टम’ ने रियल-टाइम में लाखों डेटा और निगरानी सूचनाओं का विश्लेषण कर संभावित लक्ष्यों की पहचान की। इस तकनीक की मदद से कुछ ही घंटों में सैकड़ों हमले किए गए और बड़ी संख्या में लोग मारे गए।
न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार, मेवन सिस्टम के विकास की शुरुआत 2017 में हुई थी। अमेरिकी रक्षा विभाग ने महसूस किया कि उनके पास ड्रोन फुटेज का इतना विशाल भंडार है कि उसे देखने के लिए पर्याप्त इंसान ही नहीं हैं। शुरुआत में, अमेरिकी सेना ने गूगल के साथ साझेदारी की। इसके विरोध में 3,000 से अधिक कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया। वर्ष 2018 में गूगल ने इस प्रोजेक्ट से हाथ खींच लिए। बाद में पेंटागन ने एंडुइल इंडस्ट्रीज और पालंटिर जैसी छोटी टेक कंपनियों पर दांव लगाया।
पालंटिर टेक्नोलाजीज द्वारा तैयार किया गया मेवन स्मार्ट सिस्टम बेहद शक्तिशाली एआई एल्गोरिदम है, जिसने आधुनिक युद्ध के तौर-तरीकों को पूरी तरह से बदल दिया है। इसका मुख्य काम कंप्यूटर विजन का उपयोग करके युद्ध के मैदान की लाखों तस्वीरों और वीडियो फुटेज को स्कैन करना है। ड्रोन और सेटेलाइट से मिलने वाले अंतहीन वीडियो फुटेज को इंसान के लिए देख पाना और उसमें से खतरे को पहचानना नामुमकिन है। मेवन इसे सेकंडों में कर लेता है। यह सिस्टम भीड़ में से दुश्मन की गाड़ियों, हथियारों के डिपो और छिपे हुए ठिकानों को पहचान सकता है। यह शोर और सिग्नल के बीच अंतर कर सकता है, जिससे नागरिकों की मौत की संख्या कम करने और सटीक हमले करने में मदद मिलती है।
पहले किसी लक्ष्य की पहचान करने, उसकी पुष्टि करने और उस पर हमला करने में कई घंटे या कभी-कभी कई दिन लग जाते थे। अब यही प्रक्रिया कुछ ही मिनटों या सेकंडों में पूरी हो सकती है। उपग्रह चित्र, ड्रोन कैमरे, संचार संकेत और खुफिया जानकारी—इन सबका विश्लेषण करने के लिए एआई एल्गोरिद्म का उपयोग किया जा रहा है। मशीनें विशाल डेटा का विश्लेषण कर संभावित लक्ष्यों की सूची तैयार करती हैं और सैन्य कमांडरों को तुरंत निर्णय लेने में मदद करती हैं। मेवन प्रणाली उपग्रह चित्रों, ड्रोन फुटेज, संचार अवरोधन और अन्य खुफिया स्रोतों से आने वाले विशाल डेटा का विश्लेषण करती है। इसके बाद यह संभावित लक्ष्यों की सूची तैयार कर उन्हें प्राथमिकता के आधार पर क्रमबद्ध करती है, जिससे सैन्य कमांडर तेजी से निर्णय ले सकते हैं। यही कारण है कि आधुनिक युद्धों में हमलों की गति और तीव्रता दोनों बढ़ गई हैं। ऐसी तकनीक ने युद्ध संचालन की गति को लगभग दोगुना कर दिया है।
सवाल यह है कि जब एल्गोरिद्म यह तय करने लगें कि किसे निशाना बनाया जाए, तो मानव नैतिकता और जिम्मेदारी का स्थान क्या होगा? युद्ध का निर्णय केवल तकनीकी गणना का विषय नहीं हो सकता। हर लक्ष्य के पीछे मनुष्य का जीवन और समाज की संरचना जुड़ी होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि एआई आधारित युद्ध प्रणाली में गलती की संभावना भी उतनी ही खतरनाक हो सकती है जितनी उसकी क्षमता। यदि किसी नागरिक क्षेत्र को गलती से सैन्य लक्ष्य मान लिया जाए, तो उसके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। कई अंतर्राष्ट्रीय संगठन और नीति विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि एआई आधारित हथियारों में अंतिम निर्णय मनुष्य के हाथ में ही रहना चाहिए। इसे ‘ह्यूमन-इन-द-लूप’ सिद्धांत कहा जाता है।
एआई, ड्रोन स्वार्म, स्वचालित हथियार और साइबर युद्ध—ये सब मिलकर भविष्य के युद्धों की नई तस्वीर बना रहे हैं। आने वाले वर्षों में युद्ध केवल जमीन, समुद्र और आकाश तक सीमित नहीं रहेगा; यह डेटा सेंटर, उपग्रह नेटवर्क और एल्गोरिद्म के स्तर पर भी लड़ा जाएगा।
भारत ने हाल के वर्षों में रक्षा तकनीक, ड्रोन और एआई अनुसंधान में तेजी दिखाई है, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा को देखते हुए इस क्षेत्र में और अधिक निवेश और रणनीतिक सोच की आवश्यकता है। आत्मनिर्भर रक्षा तकनीक केवल सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि भविष्य की वैश्विक शक्ति संरचना में अपनी भूमिका तय करने का भी माध्यम है।
प्रश्न केवल तकनीक का नहीं, बल्कि मानवता का है। यदि युद्ध की गति मशीनों के हाथों में चली गई, तो क्या मानवीय विवेक पीछे छूट जाएगा? एआई युद्ध को तेज, सटीक और व्यापक बना सकता है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि हर बटन के पीछे अंततः एक मानव निर्णय होना चाहिए। युद्ध की सबसे बड़ी कीमत हमेशा इंसान ही चुकाता है—मशीनें नहीं।
लेखक विज्ञान विषयों के जानकार हैं।

