Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

मनुष्यता की मौत है संवेदना धारा का सूखना

मनुष्यता की इस मौत को हम तमाशबीन बनकर नहीं देख सकते। जब कोई पूछता है कि ‘ऐ भाई, कोई है...’ तो हमारे भीतर कहीं यह आवाज़ उठनी ही चाहिए कि, हां मैं हूं। आज अपने भीतर के इस मैं को...

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
featured-img featured-img
चित्रांकन संदीप जोशी
Advertisement

मनुष्यता की इस मौत को हम तमाशबीन बनकर नहीं देख सकते। जब कोई पूछता है कि ‘ऐ भाई, कोई है...’ तो हमारे भीतर कहीं यह आवाज़ उठनी ही चाहिए कि, हां मैं हूं। आज अपने भीतर के इस मैं को जगाने की आवश्यकता है। इसे नहीं जगायेंगे तो मर जाएंगे हम।

‘ऐ भाई, कोई है...’ अंधेरी रात में एक सुनसान सड़क पर यह चार शब्द कुछ ऐसे गूंज रहे थे कि भीतर तक आदमी हिल जाये। दशकों पहले आयी थी यह फिल्म। फिल्म के उस दृश्य में यह गुहार लगाने वाला कलाकार था दिलीप कुमार। सड़क पर आने वाली हर कार को रोकने की कोशिश में लगा था—‘ऐ भाई, गाड़ी रोको, मेरी बीवी को अस्पताल पहुंचा दो, मर जायेगी वह’। पर कोई कार नहीं रुकी, आस-पास के किसी मकान की कोई खिड़की नहीं खुली…। फिल्म का नाम शायद ‘मशाल’ था। फिल्म में और क्या था, कुछ भी याद नहीं मुझे, पर ‘ऐ भाई’ वाले दिलीप कुमार की वह गुहार भूले नहीं भूलती।

ऐसा भी नहीं है कि मैं इस दृश्य की जुगाली करता रहा हूं। पर जैसे दिमाग के किसी कोने में बस गया है यह दृश्य। यह दृश्य व्यक्ति की बेबसी और हृदयहीनता दोनों का उदाहरण लगता है मुझे। कभी कुछ देखकर और कभी कुछ सुनकर अक्सर याद आ जाता है मुझे। उस दिन टीवी पर समाचार देखते सुनते हुए अचानक उछल कर मेरे सामने आ गया था यह दृश्य। नहीं, यह फिल्म का दृश्य नहीं था। बेंगलुरु में घटी एक घटना का समाचार था। स्कूटी पर जाते एक पुरुष और महिला के साथ घटी थी वह घटना। स्कूटी फिसलने से दोनों सड़क पर जा गिरे। समाचार में बताया जा रहा था कि उस व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ा था और वह अपनी पत्नी के साथ अस्पताल जा रहा था। बड़े अस्पताल। छोटे अस्पताल वालों ने भर्ती नहीं किया था। और एंबुलेंस की व्यवस्था भी नहीं की थी। स्कूटी फिसलने से गिरे तो दोनों थे पर महिला जल्दी उठ गयी। अब वह सड़क पर आती जाती कारों को रोकने के लिए गुहार लगा रही थी। बिल्कुल ‘मशाल’ वाले दिलीप कुमार के दृश्य की तरह, और कोई गाड़ी नहीं रुकी। समाचार वाचक बता रहा था, सीसीटीवी कैमरों से पता चला कि कुल 17 गाड़ियां उस दौरान वहां से गुजरी थीं। और एक भी नहीं रुकी! स्कूटी चालक की मृत्यु हो गयी। वह महिला गुहार लगाती रह गयी...

Advertisement

तभी मेरी आंखों के सामने फिल्म ‘मशाल’ वाला वह दृश्य पसर गया। जैसे दिलीप कुमार हर आती-जाती कार को रोकने की कोशिश में ‘ऐ भाई, कोई है’ की आवाज़ लगा रहा था, ठीक वैसे ही वह महिला अपने पति को अस्पताल पहुंचाने की गुहार लगा रही थी! 17 वाहन गुजर गये वहां से, पर एक भी नहीं रुका। महिला चीख-चीख कर अपने पति के प्राणों की भीख मांग रही थी, पर किसी का दिल नहीं पसीजा... उस महिला के पति ने दम तोड़ दिया... कोई कार वाला रुक जाता, कोई उस महिला की मदद कर देता... शायद उसका पति बच जाता...

Advertisement

‘मशाल’ वाला वह दृश्य व्यक्ति की बेबसी और निर्ममता दोनों का उदाहरण था, और बेंगलुरु की सड़क का वह दृश्य भी वह कहानी कह रहा था। बेबसी वाली बात तो फिर भी समझ आती है, पर व्यक्ति के इतना निर्मम होने की बात को समझना मुश्किल है। आखिर कैसे कोई इतना निर्मम हो सकता है?

नहीं, ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं है कि व्यक्ति के भीतर की मनुष्यता और संवेदनशीलता मिट गयी है। अनेक उदाहरण मिल जायेंगे आदमी की आदमीयत के। पर इस हकीकत से भी आंख नहीं चुरायी जा सकती कि कहीं न कहीं हृदय-हीनता हम पर हावी होती जा रही है। लेकिन क्यों? पचास साल पहले उस फिल्मकार ने हृदय-हीनता का एक उदाहरण दिखाया था, उस रात बेंगलुरु में घटी घटना भी ऐसा ही एक उदाहरण प्रस्तुत करती है। आधी सदी का फासला है इन दोनों घटनाओं में, पर दोनों सवाल एक-सा उठाती हैं– हमारी संवेदनहीनता का सवाल! करुणा, दया, ममता, मैत्री, भाईचारा जैसे शब्द आखिर क्यों अपना महत्व खोते जा रहे हैं? क्यों मनुष्य आत्मकेंद्रित और स्वार्थी बनता जा रहा है? कहीं कुछ है जो हमारे भीतर की संवेदनशीलता, भीतर की मनुष्यता को कुंद बनाता जा रहा है–और हम जानकर भी इससे अनजान बने रहना चाहते हैं!

बात किसी मरीज को अस्पताल पहुंचाने की नहीं है, बात हमारे भीतर के मनुष्यता के मरते जाने की है। कटु लग सकती है यह बात, पर है सच। जब हम मनुष्यता के मरते जाने की बात करते हैं तो इसका सीधा-सा मतलब है आदमीयत झटके से समाप्त नहीं हो रही, धीरे-धीरे जैसे कोई मीठी सी धारा सूखती जा रही है।

लेकिन सड़क पर किसी को दम तोड़ते हुए देखने को अनदेखा करना अपने भीतर की मनुष्यता को मरतेे हुए देखना है। हैरानी की बात यह है कि अब यह देखना हमें न हैरान करता है, न परेशान। ऐसा बहुत कुछ देख चुके हैं हम, अब तो जैसे आदत-सी हो चुकी है यह देखने की। लगभग अस्सी साल हो चुके हैं दूसरे विश्वयुद्ध को समाप्त हुए। हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम बरसाने के बाद भी मनुष्य यह नहीं समझ पाया कि वह जो कुछ कर रहा है, वह मनुष्यता का नकार है। अब तक जापान इस नृशंसता के परिणाम भुगत रहा है। पर ऐसी किसी भी त्रासदी से कुछ सीखना नहीं चाहते हम। पिछले अस्सी सालों में, यानी एटम बम से युद्ध समाप्त करने की घोषणा से अब तक शायद ही कोई दिन ऐसा गया होगा जब दुनिया में कहीं न कहीं आदमी का खून नहीं बहा होगा। बरसों से चल रहे हैं युद्ध। लाखों की बलि देकर भी हम यह सीखने को तैयार नहीं कि युद्ध का मतलब व्यक्ति का नहीं, मनुष्यता का मरना भी होता है। यह मनुष्यता फलस्तीन और यूक्रेन में भी मर रही है और बेंगलुरु की किसी सड़क पर जब कोई घायल मदद के अभाव में दम तोड़ता है तब भी इसी मनुष्यता की मौत होती है। और हम जैसे शापित हैं मनुष्यता को मरते हुए देखने को, सो देख रहे हैं!

पर यह कथित असहायता हमारी नियति नहीं है। जब कोई दिलीप कुमार ‘ऐ भाई, कोई है, मेरी बीवी को अस्पताल पहुंचा दो’ की गुहार लगाता है या फिर कोई महिला सड़क पर दम तोड़ते अपने पति को अस्पताल तक पहुंचाने की भीख मांगती है तो यह हमारे भीतर की करुणा को जगाने की चुनौती होती है। यही चुनौती गाजा और यूक्रेन में भी हमारे सामने है। ऐसी हर घटना हमें यह बताती है कि हमारे भीतर की मनुष्यता की धारा सूख रही है। सूख नहीं रही, मर रही है। मनुष्यता की इस मौत को हम तमाशबीन बनकर नहीं देख सकते। जब कोई पूछता है कि ‘ऐ भाई, कोई है...’ तो हमारे भीतर कहीं यह आवाज़ उठनी ही चाहिए कि, हां मैं हूं। आज अपने भीतर के इस मैं को जगाने की आवश्यकता है। इसे नहीं जगायेंगे तो मर जाएंगे हम।

तीस-पैंतीस साल पहले की बात है। सूडान में भुखमरी की स्थिति देखने-दिखाने के लिए एक फोटोग्राफर ने एक ऐसा चित्र खींचा जिसमें भूख का मारा एक बच्चा रेंगता दिख रहा है और एक गिद्ध इस बात का जैसे इंतजार कर रहा है कि कब वह भूखा बच्चा मरे...। यह चित्र तब पुरस्कृत हुआ था। और हकीकत यह भी है कि वह फोटोग्राफर कुछ अर्सा बाद आत्महत्या करके मर गया–वह यह बात सहन नहीं कर पा रहा था कि उस दिन गिद्ध और बच्चे वाला वह चित्र खींचते समय उसने बच्चे को बचाने की कोशिश क्यों नहीं की! आप चाहें तो इसे प्रायश्चित कह सकते हैं, लेकिन आवश्यकता इस बात को समझने की है कि जिंदगी की दौड़ में आगे रहने या बने रहने के लिए हम अपने भीतर की करुणा और संवेदनशीलता को लगातार मारते जा रहे हैं। प्रायश्चित या पश्चाताप पर्याप्त नहीं है।

मनुष्यता का तकाज़ा है आदमी से आदमी के रिश्ते को पहचानना- समझना। और इसीलिए यह समझना ज़रूरी हो गया है कि आदमी इतना निर्मम क्यों होता जा रहा है। समझना यह भी होगा कि कैसे उबर सकते हैं हम निर्मम होते जाने की इस स्थिति से। उस रात जब बेंगलुरु की उस सुनसान सड़क पर एक महिला की चीख-पुकार को अनसुना किया जा रहा था, तो वस्तुतः अनसुना करने वाले आदमी के भीतर की संवेदनशीलता के कुंठित होते जाने की गवाही दे रहे थे। होते जाने वाली यह प्रक्रिया आदमीयत के लिए एक चुनौती है, यदि मनुष्यता को जीना है तो इस चुनौती को स्वीकारना ही होगा और स्वीकार का मतलब ‘कोई है’ वाली पुकार का उत्तर देना ही हो सकता है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

Advertisement
×