पेयजल लाइनों का पुराना होना, मरम्मत और देखभाल का अभाव, खराब योजना और डिजाइन, जल संचय का अपर्याप्त प्रबंधन, शुद्धीकरण के लिए व्यवस्था और निगरानी की कमी, और घरों से पानी के सैंपल लेकर जांच की व्यवस्था न होना, साथ ही भ्रष्टाचार - इन सभी कारणों से जलापूर्ति व्यवस्था प्रभावित होती है।
बीते दिनों इंदौर शहर के भगीरथपुरा क्षेत्र में सीवर अवशेष प्रदूषित पानी के सेवन के कारण 16 से अधिक लोगों की मौतें हो चुकी हैं। अस्पतालों में लगभग 200 लोग भर्ती हैं, जिनमें से कुछ की हालत गंभीर है और 32 मरीज आईसीयू में भर्ती हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि इंदौर में बोरिंग के पानी में भी मल-मूत्र का बैक्टीरिया पाया गया है। लोग अब एक सप्ताह से अधिक समय बाद भी साफ पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर हैं।
जब बात सबसे स्वच्छ शहर की हो, तो इस स्थिति में देश के अन्य शहरों की हालत क्या होगी? यह समस्या केवल इंदौर तक सीमित नहीं है, बल्कि गुजरात के गांधीनगर को भी इंदौर जैसे हालात का सामना करना पड़ रहा है। यहां दूषित पानी पीने से 100 से अधिक लोग बीमार होकर अस्पतालों में भर्ती हो चुके हैं। दिल्ली के लोग भी हर साल दूषित पेय जलापूर्ति की समस्या से जूझते हैं। कई बस्तियों में गंदे पानी की आपूर्ति का मामला अभी भी एनजीटी में विचाराधीन है। एनजीटी की सख्ती के बाद अब दिल्ली जल बोर्ड ने इस इलाके की दशकों पुरानी और क्षतिग्रस्त पाइप लाइनों को बदलने का काम शुरू किया है। यह बात भी गौर करने लायक है कि दिल्ली के जल शोधन संयंत्रों में लिए गए 33 सैंपल फेल पाए गए हैं।
इंदौर का मामला पूरी तरह से सरकारी लापरवाही का जीता-जागता सबूत है। काफी दिनों से इंदौर के भगीरथपुरा के लोग दूषित पानी की आपूर्ति की शिकायत कर रहे थे। लेकिन जिला प्रशासन और अधिकारियों पर उनकी शिकायतों का कोई असर ही नहीं हुआ। उनकी नींद तब खुली जब दूषित पानी पीने से दस्त और उलटी से लोगों की मौत होने लगी और पीड़ित लोगों की तादाद 3000 के पार पहुंच गयी। उस समय हाई कोर्ट ने तत्काल लोगों को साफ पीने का पानी मुहैया कराने और पीड़ितों का हरसंभव नि:शुल्क इलाज कराने का आदेश दिया।
इसके साथ ही, नगर निगम के अपर आयुक्त, जल कार्य निगम के अधीक्षण अभियंता को निलंबित और आयुक्त को हटाने के साथ तीन नगर आयुक्तों की नियुक्ति कर दी। इलाके में सप्लाई किये जाने वाले नर्मदा के पानी के सैंपल लेने का काम शुरू किया। जांच में मल-मूत्र मिश्रित होने की पुष्टि हुई तब नगर निगम ने वहां के बोरिंग के पानी के सैंपल लिए। बोरिंग के 69 सैंपलों में से 35 जांच में फेल पाये गये। नर्मदा जल जांच के बाद अब बोरिंग के पानी में भी फीकल कोलीफार्म बैक्टीरिया की मौजूदगी सामने आयी है, जिससे हैजा फैला। इंदौर मेडिकल कालेज की रिपोर्ट भी पुष्टि करती है कि भगीरथपुरा में एक पाइपलाइन में लीकेज के कारण पीने का पानी दूषित हुआ और यह बीमारी फैली।
अस्पतालों में भर्ती पीड़ित रोगियों में टायफायड के लक्षण भी पाये गये हैं। डाक्टरों का तो इन पीडि़तों में हैपेटाइटिस-ए जैसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त होने का अंदेशा है। वहीं उलटी-दस्त के संक्रमण के कारण कुछ मरीजों की किडनी भी प्रभावित हुई है। ऐसे रोगियों की स्थिति सुधरने में दूसरे रोगियों की तुलना में काफी समय लगेगा।
सरकार हाईकोर्ट में दावा कर रही है कि हालात काबू में हैं जबकि अस्पतालों में पीड़ितों के पहुंचने का सिलसिला अभी भी जारी है। दुखद यह है कि अभी भी प्रभावित क्षेत्र भगीरथपुरा में पेयजल संकट बरकरार है। एनएचआरसी ने भी इंदौर के भगीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों के मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर उनसे दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
देश में नीति आयोग की मानें तो हर साल दूषित पानी पीने से दो लाख लोगों की मौत होती है, विशेषज्ञ इनकी तादाद कहीं ज्यादा बताते हैं। नीति आयोग की मानें तो देश में तकरीबन 60 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है। इससे 6 फीसदी जीडीपी का नुकसान होता है। पेयजल की गुणवत्ता के मामले में हमारे देश का दुनिया के 122 देशों में 120वां स्थान है। असलियत में दूषित पानी पीने से होने वाली मौतें विकास के दावों को मुंह चिड़ाती प्रतीत होती हैं। इससे जल जीवन मिशन की नाकामी साबित होती है।
शुद्ध पेयजल की व्यवस्था में नाकामी में सरकारी अनियमितताओं की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। उसका जीता-जागता सबूत हैं शुद्ध पेयजल की आपूर्ति और सीवर लाइन के लिए स्वीकृत 1.93 लाख करोड़ की परियोजनाओं में अभी तक केवल 44 हजार करोड़ के काम पूरे हो पाना। जबकि इनकी अवधि इसी मार्च में पूरी हो रही है।
पीने के पानी की लाइनों का पुराना होना, मरम्मत और देखभाल का अभाव, खराब योजना और डिजाइन, जल संचय का अपर्याप्त प्रबंधन, शुद्धीकरण के लिए व्यवस्था और निगरानी की कमी, और उपभोक्ता स्तर पर घरों से पानी के सैंपल लेकर जांच की व्यवस्था न होना, साथ ही भ्रष्टाचार, इन सभी कारणों से जल आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होती है। जनता मजबूरी में प्रदूषित पानी पीने को मजबूर है। सबसे बड़ी बात यह कि जब पेय जलापूर्ति राज्य की प्राथमिकता में ही न हो, तब शुद्ध पानी सपना ही बना रहेगा।
लेखक पर्यावरणविद् हैं।

