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सार्वजनिक नैतिकता का संकट

हाल के दिनों में हम पर जिस तरह चुनाव आयोग को लेकर विवाद और पार्कों तथा सड़कों पर अकेली लड़कियों के साथ यौन हमलों की खबरों की बमबारी हुई है, उसे दोहराने का कोई मतलब नहीं है। मुझे इस बात...

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हाल के दिनों में हम पर जिस तरह चुनाव आयोग को लेकर विवाद और पार्कों तथा सड़कों पर अकेली लड़कियों के साथ यौन हमलों की खबरों की बमबारी हुई है, उसे दोहराने का कोई मतलब नहीं है। मुझे इस बात से गहरा आघात पहुंचता है कि इस तरह की खबरों से अक्सर क्या संदेश निकलता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस पक्ष में खड़े हैं। जो बात साफतौर पर सार्वजनिक नैतिकता के संकट की ओर इशारा करती है, उस पर बहस के लिए अंक जुटाने का कोई सवाल ही नहीं होना चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि हम सब पीछे हटकर बैठे हैं और शोर मचाने वाले इन्फ्लूएंशर्स, पक्षपाती मीडिया और राजनीतिक दलों को आपस में लड़ने दे रहे हैं। हमारा क्या? क्या हमारे पास अपनी कोई भूमिका ही नहीं है?

अपने सुरक्षित गेटेड कॉलोनियों में, बाहरी लोगों और बाहरी दुनिया से बचाने के लिए दरवाजे मजबूती से बंद करके, अब हमारी एकमात्र चिंता यह रह गई है कि हमारी निजी जगहें साफ-सुथरी और सुरक्षित रहें। यह एक भयावह बदलाव है और उस दुनिया से बिल्कुल अलग है जिसमें हम बड़े हुए। यह सोचकर मुझे डर लगता है कि अगर हमारे पोते-पोतियां खुद को उपकरणों, सीसीटीवी और मोबाइल फोन के पीछे बंद कर लेंगे, तो वे बड़े होकर कैसे इंसान बनेंगे?

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इसके विपरीत हमारा बचपन शोर-शराबे और दूसरों के जीवन में दखल देने वाला था। लोग पूरे मोहल्ले पर नजर रखते थे। बुजुर्ग दादियां कामकाजी मां को बता देती थीं कि जब वह काम पर थी, तब कोई लड़का उसकी बेटी से मिलने आया था या माता-पिता के बाहर होने पर कोई लड़का चोरी-छिपे सिगरेट पी रहा था। उनकी पैनी नजरों से कुछ नहीं बचता था। और भगवान जाने, उन्होंने कितनी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों को पनपने से रोक दिया होगा।

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हमारे समय में लड़कियों का पीछा करने वाले या उनके आसपास मंडराने वाले लड़कों को ‘ईव-टीजर’ कहा जाता था। उनके ‘हथियार’ सीटी बजाना या अश्लील टिप्पणियां करना भर थे। शारीरिक छेड़छाड़ या यौन हिंसा खासकर विश्वविद्यालय परिसरों में बहुत, बहुत दुर्लभ थी।

मैं 1968 से 1972 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग की छात्रा थी। दोपहर दो बजे के बाद हमारा अंग्रेजी विभाग ही कानून संकाय के रूप में भी इस्तेमाल होता था। उन दिनों हम कानून के सभी छात्रों को गुंडा और लफंगा समझते थे। हालांकि वे व्यक्तिगत और अक्सर मजाकिया टिप्पणियां करते थे, लेकिन मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी शारीरिक बदतमीजी की हो। बेशक, हम लड़कियां खुद को सुरक्षित रखने के लिए समूह में छात्रावास या विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी तक जाती थीं। उन लड़कों की कुछ टिप्पणियां आज भी मुझे मुस्कुराने पर मजबूर करती हैं, लेकिन जहां तक मुझे याद है, कोई अश्लील हरकत या शारीरिक छेड़छाड़ नहीं होती थी।

लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा अनकहा सच घरों के भीतर होने वाली यौन हिंसा थी। जिन बड़े संयुक्त परिवारों में हम रहते थे, उनमें अक्सर कोई विधवा बड़ी बुआ या अविवाहित महिला रिश्तेदार होती थी, जो परिवार के कामुक पुरुषों का निशाना बन जाती थी। जब मैंने ‘मॉनसून वेडिंग’ में अभिनय किया, तब मुझे अहसास हुआ कि यह घटना कितनी व्यापक थी और परिवार की इज्जत बचाने के नाम पर इसे किस तरह हमेशा दबा दिया जाता था।

चाचा, चचेरे भाई, यहां तक कि पुरुष घरेलू नौकर भी छोटी लड़कियों और अविवाहित महिलाओं के साथ ऐसी यौन हिंसा करते थे, जिसके बारे में सोचना भी कठिन है। इसके बारे में बोल पाना बेहद मुश्किल था। और यदि कोई साहस जुटाकर कुछ कह भी देता, तो अक्सर उसकी मां, बड़ी बहन या चाची उसे सलाह देती कि इस बारे में किसी से एक शब्द भी न कहे।

इसका कितनी युवा लड़कियों पर क्या असर पड़ा, यह समाजशास्त्रियों के अध्ययन और शोध का विषय है। लेकिन मैं इतना जरूर कह सकती हूं कि इस मामले में कोई भी संयुक्त परिवार पूरी तरह निर्दोष नहीं था।

बाल शोषण, यौन हिंसा, यौन अभिविन्यास, पत्नी के साथ मानसिक क्रूरता—इन सभी विषयों को दबाकर रखा जाता था। मैं खुद 75 वर्ष की उम्र में आकर ही इनके बारे में खुले तौर पर बोलने का साहस जुटा पाई हूं।

पुरुषों को अपने किसी बड़े ‘उद्देश्य’ के नाम पर पत्नी और बच्चों को छोड़ देने की आजादी थी, जबकि महिलाओं को अपनी सारी महत्वाकांक्षाएं छोड़कर परिवार और खानदान की सेवा में अपनी प्रतिभा दफन करने के लिए मजबूर किया जाता था।

उस दौर के हमारे सभी महान राजनीतिक प्रतीक—गांधी और नेहरू सहित—अन्य महिलाओं के साथ संबंध रखने के मामले में दोषरहित नहीं थे, जबकि उनकी अपनी पत्नियां रसोई या महिलाओं के लिए निर्धारित हिस्सों से बाहर लगभग अदृश्य थीं।

हमारे पारंपरिक घर पुरुषों और महिलाओं के अलग-अलग हिस्सों में बंटे हुए थे। ‘गोल कमरा’ पुरुषों और उनके पुरुष मित्रों का स्थान था, जबकि महिलाओं के लिए आंगन, रसोई, पूजा का कमरा और घर का ‘पिछला हिस्सा’ था। इस तरह हमारे घरों की वास्तुकला भी पुरुषों और महिलाओं के अलग-अलग जीवन को रेखांकित करती थी और वास्तविक ‘काम करने वालों’ को—यानी पुरुषों को—उन महिलाओं से अलग रखती थी जो पर्दे के पीछे घर चलाती थीं।

कुछ हद तक यह व्यवस्था तब बदली, जब औपनिवेशिक वास्तुकला के तहत अंग्रेज अधिकारियों के लिए सिविल लाइंस इलाके बनाए गए और शहर को उनके सुव्यवस्थित, नगरपालिका द्वारा संजोए गए इलाकों से दूर रखा गया।

आज की नई दिल्ली को देखिए। लुटियंस दिल्ली के नाम से जाना जाने वाला इलाका खूबसूरती से संवारा हुआ है। लेकिन इसके आसपास की गलियां और फुटपाथ ऐसी बस्तियों की झलक दिखाते हैं, जिन्हें किसी महत्वपूर्ण विदेशी मेहमान के आने या किसी बड़े आयोजन के समय जल्दबाजी में ढक दिया जाता है।

यह पुरानी मानसिकता भारत और ‘भारत’ के बीच की दूरी को हमेशा बनाए रखेगी, क्योंकि आजादी और एक समानतावादी राज्य के वादे के बावजूद पुरानी सामंती और औपनिवेशिक व्यवस्था को उसी रूप में बनाए रखने की कोशिश जारी है।

लुटियंस दिल्ली पर चाहे जितनी आलोचना हो, आप मुझे किसी भी पार्टी का एक ऐसा राजनेता बताइए जो वहां रहने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार न हो।

अंत में, मैं हाल ही में प्रकाशित उस ट्रिब्यून लेख का समर्थन करना चाहती हूं, जिसमें डॉ. मनमोहन सिंह की जयंती पर उनकी प्रशंसा की गई थी।

मुझे उम्मीद है कि यह सरकार उन्हें वह भारत रत्न देगी, जिसके वे हकदार थे और जो उन्हें कभी नहीं मिला—न उनकी अपनी पार्टी की सरकार से और न ही इस सरकार से।

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि यह शांत, आत्मप्रचार से दूर रहने वाला कर्मठ व्यक्ति इस सम्मान की प्रतिष्ठा को और बढ़ा देता।

— लेखिका सामाजिक टिप्पणीकार हैं।

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