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तंग नजरिये से छोटा न हो भारतीयता का आंगन

देश के हर विवेकशील नागरिक के मन में यह सवाल उठना चाहिए। भारतीयता के आंगन में धर्म की दीवारें खड़ी करने वालों को यह बात क्यों समझ नहीं आ रही कि ऐसी हर दीवार आंगन को छोटा ही करती है।...

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देश के हर विवेकशील नागरिक के मन में यह सवाल उठना चाहिए। भारतीयता के आंगन में धर्म की दीवारें खड़ी करने वालों को यह बात क्यों समझ नहीं आ रही कि ऐसी हर दीवार आंगन को छोटा ही करती है। आज अपने आंगन को बांटना नहीं है, पूरे आंगन में धूप की ऊष्मा और रोशनी पहुंचाना हमारी आवश्यकता है।

अखबार में उस दिन दो खबरें एक साथ दिखीं। पहली खबर उत्तराखंड के कोटद्वार की है। वहां एक दुकान है, स्कूली ड्रेस बिकती हैं वहां। नाम है ‘बाबा स्कूल ड्रेस और मैचिंग सेंटर’। पिछले 30 साल से चल रही इस दुकान के 75 वर्षीय मुस्लिम मालिक को कुछ लोग धमका रहे हैं कि वह दुकान का नाम बदले बाबा शब्द को हटा दें। भले ही आप अपने पिता को बाबा कहते हैं पर इस दुकान का नाम बदलवाने की मांग करने वालों का कहना है कि कोटद्वार में बाबा सिद्धबली का मंदिर है। उन्हें लगता है कि इस ‘बाबा’ नाम पर हिंदुओं का एकाधिकार है और किसी मुसलमान को अपनी दुकान का नाम हिंदुओं के देवता के नाम पर रखने का अधिकार नहीं है। अपने आप को हिंदू धर्म का रक्षक मानने वालों की उस भीड़ ने कुछ दिन पहले भी इस नाम को बदलने की मांग की थी, और अब फिर इस बात का जवाब मांग रहे थे कि ‘अब तक नाम बदला क्यों नहीं गया’। यह जानना ज़रूरी है कि उस भीड़ के लोग आग्रह नहीं कर रहे थे, धमका रहे थे।

उनकी धमकियों का शोर सुनकर पास के जिम का युवा मालिक वहां पहुंचा। जब उसने शोर मचाने वालों को रोकने की कोशिश की और बाबा स्कूल ड्रेस के उम्रदराज मुसलमान मालिक का पक्ष लिया तो उन उपद्रवियों ने उसे युवक का नाम पूछा। युवक ने बुलंद आवाज़ में अपना नाम बताया मोहम्मद दीपक। उसका नाम दीपक कुमार ही था, पर उपद्रवियों के सामने तनकर खड़ा होते हुए उसने स्वयं को मोहम्मद कहा था। एक मुसलमान पड़ोसी के हितों की रक्षा के लिए किसी हिंदू का सामने आना इस देश के लिए नई बात नहीं है, पर दीपक कुमार का स्वयं को मोहम्मद बताना और वह भी सांप्रदायिकता का ज़हर फैलाने वालों के सामने, साहस की मांग करता है। दीपक कुमार ने यह साहस दिखाया और इस साहस के लिए देश के विवेकशील नागरिक उसकी प्रशंसा कर रहे हैं। विवेकशील लोगों की कमी नहीं है देश में, पर अन्याय के खिलाफ खड़े होकर न्याय के लिए खतरा मोल लेना भी कोई आसान काम नहीं है। दीपक कुमार ने यह साहस दिखाया है। ऐसे हर दीपक का हौसला बढ़ाने की आवश्यकता है।

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जिस दिन अखबार में ‘मोहम्मद दीपक कुमार’ की यह खबर छपी थी, उसी दिन एक खबर देश की पूर्वी सीमा से भी आयी थी। असम की बात है यह। मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा का एक बयान छपा था अखबारों में। वह कह रहे थे कि मुसलमान रिक्शा चालक को हिंदुओं से कम मेहनताना देना चाहिए। कोई भी यदि इस तरह के भेदभाव वाली बात कहे तो उसे ग़लत ही कहा जायेगा। पर यदि कोई मुख्यमंत्री ऐसी बात करता है तो उसकी सोच पर गुस्सा ही नहीं आता, तरस भी आता है। मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर बैठा कोई व्यक्ति यदि इस तरह की घटिया सोच का प्रदर्शन करता है तो बात और भी गंभीर हो जाती है। यह दुर्भाग्य ही है कि आज़ादी अर्जित करने के इतने साल बाद इस तरह की सोच के उदाहरण सामने आ रहे हैं।

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जब हमारे पूर्वजों ने देश के संविधान में पंथ-निरपेक्ष भारत की व्यवस्था की थी तो यह निर्णय बहुत सोच-विचार कर लिया गया था। यह सही है कि देश का बंटवारा धर्म के नाम पर हुआ था, पर हमारे तत्कालीन नेताओं ने कभी यह नहीं स्वीकारा कि हमारा भारत किसी एक धर्म को मानने वालों का देश बन जाये। दुनिया में शायद ही कोई और देश होगा जहां इतने धर्मों को मानने वाले लोग हों जितने हमारे देश में हैं। भारत ने हर धर्म का स्वागत किया है। हमारी बहुधर्मिता हमारी ताकत है। यह सही है कि भारत में लगभग अस्सी प्रतिशत आबादी हिंदू है, लेकिन यहां हर धर्म को मानने वालों को अपनी आस्था के अनुसार जीने का अधिकार हमारा संविधान देता है। ऐसे में जब धर्म के आधार पर भेदभाव करने का कोई उदाहरण सामने आता है, और यदि उदाहरण मुख्यमंत्री स्तर का कोई व्यक्ति प्रस्तुत करता है तो हैरानी भी होती है, और पीड़ा भी।

कुछ ऐसा ही एक उदाहरण पश्चिम बंगाल में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने प्रस्तुत किया है। ‘सबका साथ, सबका विकास’ हमारे प्रधानमंत्री जी का प्रिय नारा है। वे और उनकी पार्टी के अन्य नेता इस बात का दावा भी करते हैं कि भाजपा की सरकारें बिना किसी भेद-भाव के हर धर्म को मानने वाले के विकास की चिंता करती हैं। होना भी यही चाहिए। प्रधानमंत्री सिर्फ अपने दल का ही नेता नहीं होता, सारे देश का प्रधानमंत्री होता है वह। इसलिए, जब सबके साथ और सबके विकास की बात होती है तो उसका स्वागत ही होना चाहिए। पर पश्चिम बंगाल के भाजपा नेता शुभेंदु खुलेआम यह कह रहे हैं कि इस नीति को बदला जाना चाहिए। हाल ही में उन्होंने यह कहा है कि ‘अब’ यह नीति नहीं चलेगी। उन्होंने घोषणा की है कि ‘जो हमारे साथ हैं, हम उसके साथ हैं’। स्पष्ट है, वे अपने राजनीतिक विरोधियों की ही नहीं, गैर हिंदुओं की भी बात कर रहे हैं।

ज्ञातव्य है कि कुछ अर्सा बाद पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले हैं। उसके कुछ बाद असम में चुनाव की बारी है। ऐसी स्थिति में इन दोनों राज्यों में धर्म के आधार पर भेदभाव की आशंकाएं मंडरा रही हैं। सवाल सिर्फ चुनाव में हार-जीत का नहीं है, सवाल उस बीमार सोच का है जिसके चलते देश की जनता को धर्म के आधार पर बांटा जा रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भले ही किसी भी सोच के अंतर्गत ‘बटेंगे तो कटेंगे’ की चेतावनी दी हो, पर यह चेतावनी सारे देश के लिए है हमने अपने संविधान में हर भारतीय को समता, न्याय और बंधुता के आधार पर समान अधिकार देने की व्यवस्था की थी। ऐसे में जब कोई शुभेंदु अधिकारी चुनावी सभा में श्रोताओं को इस आशय की धमकी देता है कि ‘सड़क तब मिलेगी जब तुम धर्म बदलोगे’, तो हैरानी भी होती है और गुस्सा भी आता है।

ऐसा ही गुस्सा कोटद्वार के दीपक को आया होगा जब उसने यह देखा कि 75 साल के एक मुसलमान व्यापारी को इसलिए परेशान किया जा रहा है कि उसकी दुकान के नाम में ‘बाबा’ जुड़ा हुआ है। तीस साल से चल रही है यह दुकान। तीस साल तक किसी को इस पर कोई आपत्ति नहीं हुई। तो, आज यह विवाद किसलिए? यह सवाल सिर्फ ‘मोहम्मद दीपक’ नाम वाले युवक का नहीं है। देश के हर विवेकशील नागरिक के मन में यह सवाल उठना चाहिए। भारतीयता के आंगन में धर्म की दीवारें खड़ी करने वालों को यह बात क्यों समझ नहीं आ रही कि ऐसी हर दीवार आंगन को छोटा ही करती है। आज अपने आंगन को बांटना नहीं है, पूरे आंगन में धूप की ऊष्मा और रोशनी पहुंचाना हमारी आवश्यकता है। जिस साहस और समझदारी के साथ ‘मोहम्मद दीपक कुमार’ ने धर्म के नाम पर विद्वेष फैलाने वालों का सामना किया है, आज देश के हर युवा में उस साहस और समझदारी की आवश्यकता है।

कोटद्वार में जो कुछ हुआ उसका एक हिस्सा यह भी है कि यह घटना इसी 26 जनवरी को, अर्थात‍् जब सारा देश गणतंत्र दिवस मना रहा था, तब घटी थी। यह वह दिन है जब हमने धर्म-निरपेक्ष भारत के लिए एक संविधान को अंगीकृत किया था। हर 26 जनवरी को हम उस संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं। हमारे नेता समता और न्याय के पक्ष में खड़े होना क्यों ज़रूरी नहीं समझते? मोहम्मद दीपक ने यह बात समझी है। अब हर सच्चे भारतीय को यह बात समझनी है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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