देश के लिए यह दौर विदेश नीति के मामले में चुनौतीपूर्ण है। विश्व स्तर पर यही स्थिति है। सबसे शक्तिशाली भागीदार अमेरिका के साथ भारत के कूटनीतिक संबंध सबसे खराब दौर में हैं। जाहिर वजह तो टैरिफ व रूसी तेल खरीद हैं। राष्ट्रपति ट्रंप को एक पुराने मित्र देश और उभरती क्षेत्रीय ताकत की भी परवाह नहीं।
वर्ष 1998 में भारत द्वारा किए परमाणु परीक्षणों के बाद -जब अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए थे और परस्पर संवाद लगभग बंद हो गया था- यह पहली बार है जब अपने सबसे शक्तिशाली इस भागीदार के साथ भारत के संबंध खतरनाक रूप से नए निचले स्तर पर हैं। पिछले कुछ दिनों में, व्हाइट हाउस के उच्चतम गलियारों से तंज कसे गए हैं, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी को एक निवेदन करने वाले के रूप में दिखाया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप से कहा : ‘सर, क्या मैं आपसे बात कर सकता हूं’। हां, माना जाता है कि अमेरिका की ‘महान श्वेत आशा’ ने उत्तर दे दिया।
पिछली बार जब एक प्रधानमंत्री -डॉ. मनमोहन सिंह- को एक अमेरिकी राष्ट्रपति के समक्ष विनीत जैसा पाया गया था (2008 में उन्होंने जॉर्ज डब्ल्यू बुश से कहा : ‘भारत आपसे प्यार करता है’), तो देश में गुस्से का विस्फोट होना वाजिब था। सिर्फ 24 घंटे पहले, विदेश मंत्रालय ने मोदी द्वारा कही कथित बात को खारिज कर दिया। लेकिन संबंधों का यूं रसातल में जाते देखना बहुत बुरा लगा।
एक चमकदार अतीत से जुड़ी अद्वितीय और महान सभ्यता के उत्तराधिकारी के रूप में भारतीय अभिजात वर्ग का अमेरिका द्वारा जिस प्रकार उपहास उड़ाया जा रहा है, महज इसलिए कि भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की हिम्मत दिखाई- इस मामले में, कुछ अमेरिकी कृषि वस्तुओं पर आयात शुल्क घटाने से इंकार करना और सस्ते रूसी तेल की खरीद बंद करने से मना करना -वह बहुत परेशान करने वाला है। जैसा कि अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक ने एक पत्रकार से कहा, अमेरिकी प्रशासन ने भारत को अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर सहमति देने के लिए तीन सप्ताह की मोहलत दी थी। इसके सिलसिले में मोदी को व्यक्तिगत रूप से ट्रंप को फोन कर समझौते पर हस्ताक्षर की रजामंदी जाहिर करनी थी। लेकिन प्रधानमंत्री ने फोन कॉल नहीं की। आखिरकार, जब भारतीय पक्ष ने संपर्क किया, तो लटनिक ने उनसे कहा : ‘बहुत देर हो चुकी है’।
निश्चित रूप से, इसमें कुछ भी नया नहीं। भारत तो विशेष रूप से पश्चिमी नेताओं के सम्राटों की तरह पेश आने और अपना दबदबा दिखाए जाने का आदी है। विदेश मंत्रालय के अंदर, और बाहर भी, हर कोई उस दोगलेपन को समझता है जो बड़ी शक्तियों द्वारा खासकर शीत युद्ध के दौरान बरता जाता रहा, मीडिया ने उन्हें बेनकाब करने में कमी नहीं छोड़ी।
समस्या यह है कि कम से कम पिछले 20 सालों से, भारत सोचता था कि वह अमेरिकियों के साथ खड़ा है। हमने उनका हास-परिहास अपनाया, हमारे बच्चे उनके कॉलेजों में गए -भारतीय माता-पिता ने अपना पेट काटकर उन्हें वहां भेजने के वास्ते डॉलर खरीदने के लिए बचतें की- और हमारी आईटी विशेषज्ञ पीढ़ी ने अमेरिका को बारंबार महान बनाने के लिए एचवन-बी वीजा लगवाया। हम बराबरी के थे। या कम से कम हम ऐसा सोचते रहे।
विदेश मंत्री एस जयशंकर, जोकि मोदी मंत्रिमंडल के सबसे समझदार लोगों में से एक हैं, पुराने भारत के नए भारत में रूपांतरित होने में भूमिका निभा चुके हैं। भारत के शीर्ष राजनयिकों में से एक होने के नाते उन्हें दोनों पक्षों के लोगों से दोस्ती करने का प्रशिक्षण प्राप्त है। जयशंकर के पिता के. सुब्रमण्यम ने तो 1971 में, बांग्लादेश युद्ध से पहले,पाकिस्तान के प्रति अमेरिका के ‘अत्यधिक झुकाव’ के लिए तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर को खरी-खरी सुनाई थी (सुब्रमण्यम ने किसिंजर से पूछा था, आप पाकिस्तान का समर्थन क्यों कर रहे हैं जबकि पाक सेना द्वारा नरसंहार से बचने के लिए लाखों पूर्वी पाकिस्तानी नागरिक भारत में शरण ले रहे हैं, करीब 1 करोड़, और क्या आपको यह भी याद नहीं कि आपके अपने समुदाय यानि यहूदियों ने हिटलर के हाथों क्या झेला था?)।
नई वैश्विक व्यवस्था में, ट्रंप से हिल चुकी दुनिया के सामने भारत की विलक्षण स्थिति को, बतौर एक प्राचीन राष्ट्र जिसका लंबा औपनिवेशिक अतीत है, की स्थिति समझाने को जयशंकर एकदम उपयुक्त हैं। तो गलती कहां रही? ट्रंप का अमेरिका, मोदी के भारत का उपहास क्यों कर रहा , जबकि हम दोनों को एक पाले में होना चाहिए था, खासकर जब दुनिया को चीन से बचाने की कोशिश में हमारी ओर देखा जा रहा था? हमारे नए बेहतरीन दोस्त हमारे खिलाफ क्यों हो रहे हैं? इसके कई जवाब हैं, कुछ खुशगवार, कुछ उतने नहीं।
पहला, ट्रंप का अहंकार- उन्हें लगता है दुनिया को स्थाई तौर पर उनकी पिछलग्गू बन जाना चाहिए। लेकिन जब मोदी ने व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए ट्रंप को कॉल करने से इंकार किया, तो अमेरिकियों ने अलग ढंग से दबाव बनाया– कहा कि अब ऐसा कोई समझौता नहीं हो सकता, और रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 500 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा।
नतीजतन, भारत इतना बेचैन गया कि बाकी चीज़ों के अलावा, वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की अमेरिका द्वारा धरपकड़ की निंदा करने से परहेज़ रखा। ‘क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता’, वे शब्द जो दशकों तक भारत के लिए नैतिकता का नारा रहे हैं, जिसका इस्तेमाल यूक्रेन पर रूस के हमले के लिए उसकी निंदा करने के लिए भी किया गया था, वे अमेरिका के मामले में त्याग दिए गए।
दूसरा, यह और भी स्पष्ट होता जा रहा कि ट्रंप की विश्व दृष्टि में भारत की प्रासंगिकता नहीं है। उन्हें इसमें कोई दिलचस्पी नहीं – जैसा कि पिछले कई दशकों में अमेरिकी सरकारें, जिसमें डेमोक्रेटिक पार्टी की वह सरकार भी शामिल है, जिसने 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर करके भारत को एक तरह से परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों के क्लब में शामिल कर लिया था – कि भारत को मजबूत किया जाए ताकि वह चीन को रोकने वाली स्थानीय ताकत बन पाए। ट्रंप चीन के उद्भव से चिंतित हैं, लेकिन उन्होंने सरेआम कह दिया कि चीन से वे खुद सीधे निपटेंगे।
तीसरा, ट्रंप को इस बात की परवाह नहीं कि भारत, जो एक पुराना दोस्त, भागीदार और उभरती हुई क्षेत्रीय शक्ति है, वह नाराज़ हो जाएगा। उन्हें यह भी याद नहीं कि 2019 में मोदी ने ट्रंप के चुनाव अभियान में भारतीय प्रवासियों को ‘अबकी बार, ट्रंप सरकार’ के नारे के साथ उनका समर्थन करने के लिए कहकर मदद की थी। कहा जा रहा है कि ट्रंप यह नहीं भूल पा रहे कि जब मोदी 2024 में बाइडेन से मिलने अमेरिका आए थे तब उनसे मिलने से इंकार कर दिया था। उन्हें इस तथ्य से नफरत है कि भारत ने सार्वजनिक तौर पर कई बार इस बात से इनकार किया है कि ऑपरेशन सिंदूर गतिरोध को खत्म करने में ट्रंप ने कोई मध्यस्थता की थी।
आज विदेश नीति के मामले में भारत चिंताजनक स्थिति में है। अमेरिकी भारत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। चीन उत्तरी सीमा पर मौके की तलाश में ललचाई नजरें गड़ाए है। बांग्लादेश, वह मुल्क जिसे आजादी दिलाने में भारत ने मदद की, इससे नाराज़ है कि उसका पसंदीदा क्रिकेटर अवांछित बना दिया –बांग्लादेश ने आगामी टी-20 विश्व कप दौरान भारत में मैच न खेलने का फैसला किया है। भारत का दुश्मन, पाकिस्तान, अमेरिकियों के करीब आ रहा। यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान ने दिसंबर के आखिरी हफ्ते में पाकिस्तान का पहला आधिकारिक दौरा किया। दक्षिण अमेरिकी राष्ट्र शायद ही वेनेजुएला के मामले में भारत के रवैए को भूल पाएं। नेपाल भी संकट में है।
अब बचे रूस, पश्चिमी यूरोप, इस्राइल और ईरान। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची अगले हफ़्ते दिल्ली आ सकते हैं। शायद भारत राजनयिक खाई से बाहर निकलने की शुरुआत उनके साथ संबंध बढ़ाकर कर सकता है। लेकिन फिर यहां दूसरी समस्या है : अगर ऐसा होता है, तो ट्रंप और भी ज़्यादा खफ़ा हो सकते हैं।
भारत में नववर्ष पहले ही पुराना पड़ रहा है।
लेखिका ‘द ट्रिब्यून’ की प्रधान संपादक हैं।

