सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले के जरिए ‘पॉकेट वीटो’ पर रोक लगा दी है। अनुच्छेद 200 की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि विधेयकों को अनिश्चितकाल के लिए रोक लेना राज्यपाल का विशेषाधिकार नहीं है बल्कि समयबद्ध निर्णय लेना उनका पवित्र संवैधानिक दायित्व है।
भारत का संविधान केवल अनुच्छेदों और धाराओं का एक संग्रह मात्र नहीं, बल्कि एक जीवंत दस्तावेज है जो देश की लोकतांत्रिक आत्मा को दिशा देता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में, जनता द्वारा चुनी गई सरकार और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के बीच सामंजस्य होना बुनियादी शर्त है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, भारत के कई राज्यों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई - चुनी हुई राज्य विधानसभाओं और राजभवन के बीच निरंतर टकराव। यह तब अधिक मुखर हो जाता है जब विधानसभाओं द्वारा जनहित में पारित किए विधेयक राजभवन में जाकर महीनों, या कभी-कभी सालों तक, धूल फांकते रहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘पंजाब और तमिलनाडु राज्य बनाम राज्यपाल’ (2023) मामलों में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्यपालों के ‘पॉकेट वीटो’ पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने अनुच्छेद 200 की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि मनोनीत राज्यपाल द्वारा चुनी हुई विधानसभा के विधेयकों को अनिश्चित काल तक रोके रखना संवैधानिक मर्यादा के खिलाफ है। इस अहम फैसले ने न केवल संसदीय लोकतंत्र को मजबूत किया है बल्कि विधायिका और राजभवन के बीच शक्तियों का संतुलन भी फिर से स्थापित किया।
विवाद की जड़ अनुच्छेद 200 और ‘पॉकेट वीटो’ के भ्रम में छिपी है। संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत, जब विधानसभा कोई विधेयक पारित कर राज्यपाल की सहमति के लिए भेजती है, तो उनके पास मुख्यतया चार विकल्प होते हैं : सहमति देना, सहमति रोकना, सुझावों के साथ विधानसभा को पुनर्विचार के लिए वापस भेजना, या कुछ विशिष्ट मामलों में इसे राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखना। संविधान में प्रावधान है कि यदि राज्यपाल विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटाना चाहते हैं, तो यह कार्य ‘यथाशीघ्र’ होना चाहिए, लेकिन इसके लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की गई है।
इसी भाषाई लचीलेपन का फायदा उठाते हुए कई राज्यपाल विधेयकों पर न तो सहमति देते हैं और न ही उन्हें लौटाते हैं, बल्कि अनिश्चितकाल के लिए अपने पास रख लेते हैं, जिसे राजनीति की भाषा में ‘पॉकेट वीटो’ कहा जाता है। इस समस्या पर सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की भावना स्पष्ट करते हुए कहा है कि ‘यथाशीघ्र’ का अर्थ अनंत काल नहीं हो सकता।
संविधान निर्माताओं की मंशा के अनुसार राज्यपाल का पद एक मार्गदर्शक और संवैधानिक प्रमुख का है, न कि समानांतर सरकार चलाने वाले का। किसी विधेयक पर निर्णय लेने में जानबूझकर की गई देरी न केवल जनादेश का अनादर है, बल्कि इससे राज्य का विकास और लोक-कल्याण भी बाधित होता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी यह बात रेखांकित की है कि एक गैर-निर्वाचित व्यक्ति (राज्यपाल) जनता द्वारा चुनी गई विधायिका की कानून बनाने की संवैधानिक शक्ति पर हावी नहीं हो सकता।
इस मामले का एक और कानूनी पहलू है— शक्तियों का पृथक्करण। लोकतंत्र में कार्यपालिका (सरकार), विधायिका (संसद/विधानसभा) और न्यायपालिका (अदालतें) के अपने-अपने अधिकार क्षेत्र हैं। अदालतें आम तौर पर राज्यपालों या राष्ट्रपति को यह निर्देश नहीं देतीं कि उन्हें क्या करना चाहिए, क्योंकि अनुच्छेद 361 उन्हें उनके पद के कर्तव्यों के निर्वहन में अदालतों के प्रति जवाबदेही से छूट देता है। तो फिर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल क्यों दिया? यहां न्यायालय ने एक बहुत ही संतुलित और परिपक्व कानूनी सिद्धांत का उपयोग किया, जिसे ‘सीमित परमादेश’ कहा जा सकता है। परमादेश एक रिट है जिसके जरिए अदालत किसी भी सरकारी अधिकारी को अपना काम करने का आदेश देती है।
अदालत ने यह नहीं कहा कि राज्यपाल किसी विधेयक पर ‘क्या’ फैसला लें। यह भी नहीं कि वे बिल पर हस्ताक्षर करें ही। बल्कि, अदालत ने केवल इतना कहा कि राज्यपाल को ‘कुछ न कुछ’ फैसला तो लेना ही होगा। वह फाइल दबाकर नहीं बैठ सकते। यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का बेहतरीन सम्मान है। न्यायपालिका ने राज्यपाल के ‘निर्णय न लेने की जिद’ को असंवैधानिक ठहराया।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सहकारी संघवाद और राज्य विधायिका की स्वायत्तता पर इसके दूरगामी प्रभाव को रेखांकित करता है। ‘पॉकेट वीटो’ के जरिए राज्यों के कामकाज में अड़चनें डालना सहकारी संघवाद की भावना पर प्रहार था। अनुच्छेद 200 के तहत, यदि विधानसभा किसी विधेयक को पुनर्विचार के बाद दोबारा पारित करके भेजती है, तो राज्यपाल उस पर सहमति देने के लिए बाध्य हैं। सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक निर्णय ने ‘पॉकेट वीटो’ रूपी पिछले दरवाजे को बंद कर दिया।
यह ऐतिहासिक फैसला भारतीय लोकतंत्र, संवैधानिक मर्यादा और ‘संवैधानिक नैतिकता’ को पुनर्स्थापित करने वाला सशक्त संदेश है। यानी कोई भी पद संविधान से ऊपर नहीं और राजभवन की भूमिका प्रतिपक्षी की नहीं, बल्कि एक अभिभावक और संवैधानिक रक्षक की हो; वहीं सरकार से भी राजभवन के पद की गरिमा बनाए रखने की अपेक्षा की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने तय कर दिया है कि विधेयकों पर अनिश्चितकाल के लिए बैठकर ‘पॉकेट वीटो’ का प्रयोग करना राज्यपाल का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि समयबद्ध निर्णय लेना उनका पवित्र संवैधानिक दायित्व है।
लेखक कुरुक्षेत्र वि.वि. के विधि विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं।

