ओजोन परत सूर्य की हानिकारक यूवी किरणों से पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की सफलता के बावजूद, नए उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन गंभीर चुनौतियां बने हुए हैं।
पृथ्वी के समतापमंडल में मौजूद ओजोन परत सूर्य से आने वाले हानिकारक पराबैंगनी (यूवी) विकिरण का बड़ा हिस्सा सोखकर मनुष्य, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र को सुरक्षा प्रदान करती है। यह पृथ्वी का एक ऐसा अदृश्य सुरक्षा कवच है जिसकी मौजूदगी का अहसास हमें सामान्य दिनों में नहीं होता, लेकिन इसके कमजोर पड़ने का असर पूरी जैविक दुनिया के अस्तित्व पर पड़ सकता है। आसमान की ओर देखने पर नीला विस्तार दिखाई देता है, लेकिन उस नीले आकाश के ऊपर मौजूद यह ढाल जीवन की कल्पना को संभव बनाती है।
इसीलिए 16 सितंबर केवल पर्यावरण से जुड़ी एक औपचारिक तारीख नहीं है। यह उस अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक और राजनीतिक प्रयास की याद दिलाता है, जिसने दुनिया को यह सिखाया कि यदि विज्ञान समय रहते खतरे की पहचान करे और सभी देश मिलकर कार्रवाई करें, तो वैश्विक पर्यावरणीय संकट को पलटा भी जा सकता है। वर्ष 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल अस्तित्व में आया और उसके बाद ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन तथा उपभोग को चरणबद्ध तरीके से कम किया गया। इस वर्ष विश्व ओजोन दिवस की थीम ‘ग्लोबल एक्शन फॉर कूलर प्लेनेट’ यानी ठंडी और अधिक टिकाऊ पृथ्वी के लिए वैश्विक कार्रवाई रखी गई है। यह थीम मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के किगाली संशोधन के दस वर्ष पूरे होने से भी जुड़ी है, जिसने हाइड्रोफ्लोरोकार्बन यानी एचसीएफसी और एचएफसी को चरणबद्ध रूप से कम करने और अधिक ऊर्जा-कुशल शीतलन व्यवस्था की दिशा में दुनिया को आगे बढ़ाया है।
यहां एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर समझना जरूरी है कि हर ओजोन परत समान नहीं होती। समतापमंडल का ओजोन हमारा रक्षक है, जबकि धरातल के पास बनने वाला ट्रोपोस्फेरिक ओजोन वायु प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण घटक है और मानव स्वास्थ्य तथा वनस्पतियों के लिए हानिकारक हो सकता है। जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ती गर्मी, जंगलों की आग और वायुमंडलीय रसायन इन दोनों स्तरों की जटिलताओं को और अधिक महत्वपूर्ण बना रहे हैं।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कारण लगभग 99 प्रतिशत नियंत्रित ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को चरणबद्ध किया जा चुका है और वैज्ञानिक आकलन लंबे समय से ओजोन परत के पुनरुद्धार की दिशा में प्रगति की पुष्टि करते रहे हैं। हालांकि, ‘नेचर कम्यूनिकेशन’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं में ओजोन-क्षयकारी पदार्थों का फीडस्टॉक के रूप में उपयोग अपेक्षा से कहीं अधिक उत्सर्जन पैदा कर सकता है। यदि ये उत्सर्जन वर्तमान स्तरों पर जारी रहे, तो मध्य-अक्षांशों में ओजोन परत की रिकवरी लगभग 7 वर्ष तक पीछे खिसक सकती है।
इसके अलावा, वैज्ञानिकों ने पूर्वी एशिया में हैलॉन-2402 नामक शक्तिशाली ओजोन-क्षयकारी पदार्थ के उत्सर्जन में फिर से बढ़ोतरी के प्रमाण पाए हैं। अध्ययन के अनुसार 2008 से 2023 के बीच पूर्वी एशिया से इसके उत्सर्जन का संचयी अनुमान लगभग 52 गीगाग्राम सीएफसी-11 इक्विवेलेंट रहा और 2015 के बाद इस क्षेत्र के उत्सर्जन ने वैश्विक प्रवृत्ति को प्रभावित किया है।
अगस्त 2026 में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने बताया कि वैज्ञानिकों ने उत्तर बंगाल की खाड़ी के ऊपर लगभग 21 से 23 किलोमीटर की ऊंचाई पर असामान्य रूप से अधिक ओजोन की एक मोटी परत देखी। यह संरचना पूर्वी भारत के लिए सामान्य मात्रा से काफी अधिक थी और एक दिन से ज्यादा समय तक बनी रही। भारतीय वैज्ञानिकों ने देशभर के वायुमंडलीय रडार, मौसम गुब्बारों, उपग्रहों और वायुमंडलीय मॉडलों को एक साथ इस्तेमाल किया। नैनीताल स्थित आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज के स्वदेशी रडार सहित कई केंद्रों से मिले आंकड़ों ने वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद की कि वायुमंडल में ओजोन का परिवहन किस तरह होता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार इस घटना के पीछे ओजोन-समृद्ध वायु का परिवहन, उसके बाद नीचे की ओर वायुमंडलीय गति और वायु-द्रव्यमान का संपीड़न प्रमुख कारण थे। यह उदाहरण बताता है कि ओजोन परत कोई स्थिर, समान मोटाई वाली चादर नहीं है। वायुमंडलीय परिसंचरण, हवाएं, तापमान और रासायनिक प्रक्रियाएं लगातार इसकी संरचना और वितरण को प्रभावित करती हैं।
भारत और नेपाल का पर्यावरणीय भविष्य अलग-अलग खानों में नहीं बांटा जा सकता। नेपाल में ऊंचाई के कारण पराबैंगनी विकिरण का सवाल विशेष महत्व रखता है। नेपाल के भैरहवा, पोखरा और लुम्ले में किए गए एक अध्ययन में यूवी इंडेक्स में उल्लेखनीय मौसमी और स्थानिक अंतर दर्ज किए गए। विशेष रूप से अधिक ऊंचाई वाले लुम्ले और पोखरा में कुछ अवधियों के दौरान यूवी इंडेक्स काफी ऊंचा पाया गया। इसका मतलब यह नहीं कि नेपाल या हिमालय में ओजोन परत खत्म हो रही है, बल्कि संदेश यह है कि ऊंचाई, सूर्य की स्थिति, बादल, वायुमंडलीय संरचना और ओजोन की मात्रा मिलकर सतह तक पहुंचने वाले यूवी विकिरण को प्रभावित करते हैं। इसलिए हिमालयी देशों को स्थानीय यूवी निगरानी, मौसम विज्ञान और स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी प्रणालियों पर अधिक ध्यान देना चाहिए। भारत और नेपाल के लिए यह सहयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन तेजी से बदलती परिस्थितियां पैदा कर रहा है।
दक्षिण एशिया में गर्मी लगातार बढ़ रही है। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर और शीतलन प्रणालियों की मांग भी तेजी से बढ़ेगी। भारत और नेपाल जैसे तेजी से विकसित हो रहे देशों के सामने चुनौती दोहरी है—एक तरफ लोगों को सुरक्षित और सस्ता शीतलन उपलब्ध कराना और दूसरी तरफ ऐसी तकनीक अपनाना जो जलवायु तथा ओजोन दोनों के लिए सुरक्षित हो। यहीं किगाली संशोधन का महत्व सामने आता है। एचएफसी ओजोन परत को सीधे नष्ट नहीं करते, लेकिन उनमें से कई शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं। इसलिए अगली पीढ़ी की चुनौती केवल ओजोन-क्षयकारी गैसों को हटाना नहीं, बल्कि कम ग्लोबल-वॉर्मिंग क्षमता वाली और अधिक ऊर्जा-कुशल शीतलन तकनीक विकसित करना है।
लेखक विज्ञान और पर्यावरण मामलों के जानकार हैं।

