हर साल नेताजी इसी तरह होली मनाते। कोई रंग लगाने की कोशिश करता उसके मुंह पर काला रंग लगा देते। काले को सफेद करने का गुर वे ही जानते थे। होली मनाने की कला कोई नेताओं से सीखे।
वे बड़े ही होलियाना जोश में नेताजी पर रंग लगाने के लिए आगे बढ़े थे, लेकिन ठिठक गए। अब वे उन पर क्या रंग लगाते। नेताजी तो पहले से काले रंग से सने थे। भ्रष्टाचार की कालिख उन पर इतनी पुती थी कि उस पर काला, पीला, हरा, लाल... कोई भी रंग क्या चढ़ता? चलिए, चेहरा न सही, उनके झक सफेद कुर्ते पर कीचड़ क्यों न उड़ेल दिया जाए। कलफ लगे दमकते सफेद कुर्ते पर कीचड़ क्या खूब जमेगा! पर नेताजी उसके लिए भी सहर्ष तैयार थे। उन्होंने जीवनभर ‘दाग अच्छे हैं’ की फिलोसॉफी को अपनाया था। यानी कालिख के साथ दागों से भी लिपे-पुते थे। वैसे भी कीचड़ उछालने और कीचड़ में घसीटने का काम पूरे साल चलता रहता है। नेताजी इसके अभ्यस्त थे।
उनकी हालत देखकर मन में आया कि काले रंग को छोड़ सफेद रंग उन पर डाला जाए। कोशिश की तो कालिख इतनी जगह निकली कि उस पर व्हाइट वॉश करते-करते सफेद रंग भी नहीं बचा। जब काले पर सफेद नहीं चढ़ रहा तो कौन-सा रंग लगाया जाए। नेताजी पर रंग लगाना चैलेंज सरीखा हो गया। लेकिन होली पर किसी नेता का मुंह काला नहीं किया तो क्या खाक मनी होली! यही तो अवसर होता है, जब नेताजी बुरा नहीं मानते। कहते, ‘भई, मल दो... कैसा भी रंग मल दो... बुरा क्या मानना। होली जो है...।’ यहां तो कमबख्त ऐसा मुंह मिलना मुश्किल हो गया है, जिस पर रंग मला जा सके।
‘क्या हुआ महाशय... किस सोच में पड़ गए... रंग नहीं लगाओगे...।’ नेताजी ने चेहरे पर व्यंग्यभरी मुस्कान लाते हुए कहा। वे अचकचा गए। नेताजी के साथ होली मनाने का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया। किसी के रंग और कीचड़ तो जबर्दस्ती लगाएं, तभी मजा आता है। यहां तो नेताजी स्वयं आगे होकर आमंत्रण दे रहे हैं कि रंग लगाओ...। वे तो बिल्कुल भी प्रतिरोध नहीं कर रहे। भांग की लस्सी नेताजी ने पी हुई थी। चक्कर उस भले मानुष को आ रहे थे, जो उन पर रंग लगाने आया था।
‘तुम्हारी बारी खत्म हुई। अब रंग लगाने की बारी मेरी है,’ नेताजी गुजिया की प्लेट आगे कर ठठाकर हंसते हुए बोले।
‘बुरा न मानो होली है...’ कहते हुए नेताजी ने वो रंग फेंका कि महाशय ऊपर से नीचे तक कालिख में नहा गए। गए थे नेताजी को रंगने, खुद रंगे गए। हर साल नेताजी इसी तरह होली मनाते। कोई रंग लगाने की कोशिश करता उसके मुंह पर काला रंग लगा देते। काले को सफेद करने का गुर वे ही जानते थे। होली मनाने की कला कोई नेताओं से सीखे।

