असहमति का सम्मान लोकतंत्र का सौंदर्य

असहमति का सम्मान लोकतंत्र का सौंदर्य

विश्वनाथ सचदेव

विश्वनाथ सचदेव

आज की पीढ़ी को शायद न पता हो कि शंकर नाम के एक कार्टूनिस्ट थे, जिन्हें भारत में राजनीतिक व्यंग्य चित्रों का पिता कहा जाता है। देश आजाद हुआ तो उसके एक साल बाद ही, 1948 में, उन्होंने ‘शंकर वीकली’ नाम की एक कार्टून पत्रिका प्रारंभ की थी, जिसका उद्घाटन भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था। देश के सबसे बड़े राजनेता होने के कारण, स्वाभाविक रूप से, नेहरू जी शंकर के कार्टूनों का अक्सर विषय बना करते थे।

सतसैया के दोहों की तरह बहुत पैनी मार करने वाले होते थे शंकर के कार्टून। संबंधित व्यक्ति का तिलमिला जाना स्वाभाविक था, पर नेहरू ने हमेशा शंकर के कार्टूनों का मजा लिया, उन्हें स्वस्थ आलोचना के रूप में स्वीकारा। यही नहीं, एक बार तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था, ‘शंकर डोंट स्पेयर मी’ अर्थात ‘शंकर मुझे बख्शना मत’। राजनेताओं को नागरिकों के अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा कैसे करनी चाहिए, इसका एक उदाहरण प्रस्तुत किया था जवाहरलाल नेहरू ने यह कह कर। सरकार की आलोचना करना, सवाल उठाना, मीडिया का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है। सच पूछा जाये तो यह एक आईना होता है, जिसमें सत्ता अपना चेहरा देखकर यदि कोई दाग है तो उसे मिटा सकती है। पंडित नेहरू ने जब यह कहा था कि ‘शंकर मुझे बख्शना मत’ तो वे नागरिक के जनतांत्रिक अधिकार के प्रति सम्मान ही प्रकट कर रहे थे। वे यह भी बता रहे थे कि इस तरह की आलोचना को जनतांत्रिक व्यवस्था में कैसे समझा-स्वीकारा जाना चाहिए।

आज राजनीतिक कार्टून को लेकर नेहरू और शंकर की याद इसी अधिकार और कर्तव्य के संदर्भ में आ रही है। हाल ही में फेसबुक पर पोस्ट किए गये एक कार्टून को लेकर महाराष्ट्र में अप्रिय और अनावश्यक विवाद छिड़ गया था। कार्टून में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को जिस रूप में दिखाया गया, वह मुख्यमंत्री के राजनीतिक दल शिवसेना को पसंद नहीं आया और उसके कुछ कार्यकर्ताओं ने उस कार्टून को फेसबुक पर फॉरवर्ड करने वाले व्यक्ति की पिटाई कर दी। पहली बात तो यह कि उस कार्टून में कुछ ऐसा था नहीं कि मुख्यमंत्री के समर्थक इतने नाराज हो जाते, पर यदि ऐसा कुछ है भी जो अनुचित लग रहा है तो उसे इस तरह तूल देना भी उचित नहीं कहा जा सकता।

स्वयं मुख्यमंत्री इस बारे में अभी तक कुछ नहीं बोले हैं, पर यदि वह बोलते भी हैं तो निश्चित रूप से कुछ उस तरह की बात ही कहते जो उनके पिता स्वर्गीय बालासाहब ठाकरे ने कही थी। ज्ञातव्य है कि बालासाहेब स्वयं एक उच्च दर्जे के व्यंग्यकार थे। उनके बनाए कार्टून तत्कालीन सत्ताधारियों को तिलमिला देने वाले हुआ करते थे। यह बात तब की है जब महाराष्ट्र में भाजपा- शिवसेना की मिलीजुली सरकार थी। पुणे में हुई एक हत्या के संदर्भ में एक युवा व्यंग्यकार ने शिवसेना के चुनाव-चिन्ह तीर-कमान का सहारा लेकर टूटे हुए तीर को दर्शाते हुए कार्टून बनाया था। संयोग से यह चर्चित कार्टून प्रकाशित होने के लगभग एक माह बाद युवा कार्टूनिस्ट प्रशांत कुलकर्णी को बालासाहेब से मिलने का अवसर मिला। उन्हें प्रशांत का वह कार्टून याद था और उन्होंने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा था-तुम्हारा वह ‘ब्रोकन एरो’ वाला कार्टून बहुत अच्छा था!

यह सही है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी को भी उच्छृंखल होने का अधिकार नहीं दिया जा सकता, पर भावनाओं पर आघात के नाम पर प्रत्युत्तर में हिंसा करने का अधिकार भी किसी को नहीं है। मुख्यमंत्री वाले कार्टून को फेसबुक पर फॉरवर्ड करने वाले नौसेना के पूर्व अधिकारी के साथ हुई मारपीट को किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। यदि उस कार्टून से कोई आहत हुआ है तो उसे अधिकार है कानूनी कार्रवाई करने का। क्षोभ प्रकट करने के और भी तरीके होते हैं। ऐसे किसी भी संदर्भ में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

वैसे यह पहली बार नहीं है जब देश में ऐसी कोई घटना हुई है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस तरह की घटनाएं होती रही हैं। पर जब भी ऐसा कुछ होता है, सभ्य समाज की और जनतांत्रिक मूल्यों की मर्यादा भंग होती है। यह बात उन सबके लिए चिंता का विषय होनी चाहिए जो राजनीति में विवेक की वकालत करते हैं। विवेक का तकाजा है कि राजनीतिक नफे-नुकसान के तराजू पर मर्यादाओं को न तोला जाये। जनतंत्र में राजनीतिक मतभेद का मतलब दुश्मनी नहीं होता। सच बात तो यह है कि राजनीतिक मतभेद जनतंत्र की जरूरत हैं। इन्हीं मतभेदों के आधार पर राजनीतिक दल बनते हैं और फिर ये राजनीतिक दल अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार व्यक्ति को, समाज को, देश को आगे ले जाने की योजना बनाते हैं, कार्य करते हैं। वैचारिक मतभेद का हमेशा स्वागत होना चाहिए और विचार से लड़ने का हथियार विचार ही हो सकता है। किसी भी प्रकार की हिंसा वैचारिकता की दुश्मन है।

ऐसा नहीं है कि जीवन में भावुकता के लिए कोई जगह ही नहीं होती। पर भावुकता या भावावेश के आधार पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। राजनीति का रथ विवेक और तर्क के पहियों पर चलकर ही सही गति और सही दिशा पा सकता है।

दुर्भाग्य से, अक्सर हमारी राजनीति विवेक या विचार के बजाय राजनीतिक हानि-लाभ के गणित से चलती है, चलायी जाती है। स्वस्थ राजनीति का तकाजा है कि इस गणित के फार्मूलों से हम राजनीतिक आवश्यकताओं के सवाल हल न करें। और यही स्वस्थ राजनीति इस बात की मांग भी करती है कि भावावेश के नाम पर अपने गलत को सही समझने-समझाने का अतार्किक प्रयास भी न किया जाये। यदि कोई किसी गलत काम की ओर इशारा करता है तो इसे किसी के गलत मंतव्य के बजाय सकारात्मक दृष्टि से भी देखा जा सकता है।

कार्टूनिस्ट शंकर जब जवाहरलाल नेहरू की आलोचना करने वाले कार्टून बनाते थे तो इसका उद्देश्य नेहरू को नीचा दिखाना नहीं होता था। सच कहें तो कार्टून के माध्यम से कोई भी कार्टूनिस्ट अपने विचार ही प्रकट करता है। उन विचारों से सहमत-असहमत होने का अधिकार हमारा है। हम कह सकते हैं कि हमें कार्टूनिस्ट के विचार स्वीकार नहीं हैं, हम उसके विचार की खिल्ली भी उड़ा सकते हैं, अपना आक्रोश भी व्यक्त कर सकते हैं। पर इस आक्रोश को या असहमति को मारपीट का रूप देना किसी भी सभ्य समाज और विवेकशील व्यवस्था में स्वीकार नहीं किया जा सकता। जब कोई नेहरू यह कहता है कि ‘शंकर, डोंट स्पेयर मी’ तो वह यह संदेश भी दे रहा होता है कि मैं असहमति के आपके अधिकार का सम्मान करता हूं। यही है जनतंत्र का सौंदर्य।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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