राष्ट्रवाद के उभार के सामने महंगाई की चर्चा ने ऐसे घुटने टेके कि सिर नहीं उठा पाई। जनता की हालत सरकार के सामने ऐसी थी, जैसे जिल्लेइलाही के सामने अनारकली की कि महंगाई तुम्हें जीने नहीं देगी और हम तुम्हें मरने नहीं देंगे।
नहीं जी, नहीं। हम किसी दास्ताने-इश्क की बात नहीं कर रहे। हम तो महंगाई की उस दास्तान की बात कर रहे हैं, जिसकी याद हमें चीनी की ऊंची छलांग ने दिला दी है। वो शायर ने कहा है न कि हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है, तब कहीं होता है चमन में दीदावर पैदा। कुछ-कुछ वैसा ही हो गुजरा है जी। बरसों से महंगाई को कोई याद ही नहीं कर रहा था, साहब। महंगाई की ऐसी बेकद्री पहले कभी नहीं हुई। बहुत जोर लगाया कि गैस और तेल की बढ़ती कीमतों के हवाले से कोई महंगाई को याद कर ले। पर किसी ने याद नहीं किया। विपक्ष वाले भी इसे याद करने से ऐसे बचते रहे, जैसे कोई अतीत को याद करने से बचता रहा करता है।
हालांकि कहा यही जाता है कि अतीत की यादें, जिसे नॉस्टेल्जिया कहते हैं, बड़ा सुकून देती हैं। यह कुछ-कुछ स्वर्णिम अतीत की तरह से होता है। और साहब, जब गैस और तेल की बढ़ती कीमतें ही महंगाई की याद नहीं दिला पाईं, तो आटे-दाल की महंगाई, सब्जियों की बढ़ती कीमतों की तो हैसियत ही क्या थी, जो वो महंगाई की याद दिला देतीं। राष्ट्रवाद के उभार के सामने महंगाई की चर्चा ने ऐसे घुटने टेके कि सिर नहीं उठा पाई। जनता की हालत सरकार के सामने ऐसी थी, जैसे जिल्लेइलाही के सामने अनारकली की कि महंगाई तुम्हें जीने नहीं देगी और हम तुम्हें मरने नहीं देंगे। राष्ट्रवाद की खुराक देते रहेंगे।
लेकिन चीनी तो साहब एकदम ही जेन जी निकली। उसने एक शक्तिशाली सरकार के सामने सिर्फ सिर ही नहीं उठाया, बल्कि ऐसी ऊंची छलांग लगाई कि सारे पैमाने छोटे पड़ गए। कोई अतीत में सरकारें गिराने वाली प्याज की महंगाई को याद कर रहा है, तो कोई दिल्ली में सुषमाजी वाली सरकार के जमाने में सौ रुपए किलो तक पहुंची नमक की महंगाई को याद कर रहा है। ऐसे में बेचारे गन्ने की हालत एकदम जनता जैसी हो गई है। वैसे इसे अनारकली वाली हालत भी कह सकते हैं कि जिल्लेइलाही कह रहे हैं कि इथनोल तुम्हें जीने नहीं देगा और चीनी तुम्हें मरने नहीं देगी। हालांकि अनारकली की बजाय वह जनता होना ही पसंद करेगा कि हुजूर, चाहो तो मुझे इथनोल के लिए पेर लो और चाहो तो चीनी के लिए पेर लो। मेरी किस्मत में तो निचुड़ना ही लिखा है।
ऐसे में गुड़ के अलग ही नखरे हैं, ठीक वैसे ही जैसे किसी राजनीतिक परिवार में एक व्यक्ति को अहमियत मिलते ही दूसरा फौरन मीडिया के सामने पहुंच जाता है। आटा-दाल तो अपना भाव बताते ही रहते हैं, पर प्याज तो सचमुच अपना भाव दिखाने लगी हैं। ऐसे में डर यही है कि टमाटर और घिया-तुरई भी कब तक चुप रहेंगे। वैसे भी जेन जी के बाद जेन अल्फा उठ खड़ा हुआ है। रास्ता दिखा रहे हैं न!

