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इक्कीसवीं शताब्दी में आतंकी सरकार!

इक्कीसवीं शताब्दी में आतंकी सरकार!

राजकुमार सिंह

अफगानिस्तान का घटनाक्रम किसी पीरियड फिल्म जैसा ज्यादा लगता है। जिस इक्कीसवीं शताब्दी को ज्ञान की शताब्दी बताया जा रहा था, उसमें बर्बरता के लिए बदनाम हथियारबंद आतंकी समूह किसी देश की सत्ता पर कब्जा कर लेंगे और विश्व समुदाय मूकदर्शक बना देखता रहेगा—इसकी कल्पना भी अगस्त, 2021 से पहले मुश्किल थी। यह संभवत: विश्व में किसी देश की पहली ऐसी सरकार होगी, जिसमें करोड़ों-अरबों के घोषित इनामी अंतर्राष्ट्रीय आतंकी सत्ता के केंद्र में विराजमान होंगे। सिद्धांतत: यह माना जा सकता है कि किसी भी देश के नागरिकों को अपनी सरकार और दशा-दिशा चुनने का अधिकार है। इसके बावजूद खुद को दुनिया का दारोगा समझने वाले कुछ स्वयंभू देश लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर दूसरे देशों में मनमानी घुसपैठ करते रहे हैं, लेकिन अब जबकि लगभग 80 हजार हथियारबंद आतंकियों ने अधिसंख्यक अफगानिस्तानी आबादी की इच्छाओं का गला घोंटते हुए देश की सत्ता पर ही कब्जा कर लिया है तो प्रतिक्रियाएं देने में भी बेहद सावधानी बरती जा रही है।

इक्कीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक की शुरुआत में ही जो अफगानिस्तान वापस मध्ययुगीन बर्बर सत्ता की कैद में जाता दिखायी पड़ रहा है, उसके लिए एकध्रुवीय विश्व का स्वयंभू दारोगा अमेरिका भी कम जिम्मेदार नहीं है। दो दशक पहले, विश्व जनमत को धता बता कर, आतंक के खात्मे के नाम पर अमेरिका और मित्र देशों ने अफगानिस्तान पर हमला बोला था, लेकिन वहां से उसकी बेआबरू विदाई के बाद जो तस्वीर उभरी है, वह पहले से कम भयावह तो हरगिज नहीं है। तब भी वहां तालिबान के बैनर तले आतंकवादियों की ही सरकार थी और अब जो अंतरिम सरकार बनी है, उसमें भी आतंकियों की ही भरमार है। विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेज़ेंटेटिव्ज़ की रिपब्लिकन स्टडी कमेटी के ही शब्दों में आज अफगानिस्तान में आतंकवादियों की, आतंकवादियों द्वारा, आतंकवादियों के लिए सरकार है, पर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? यह अब खुला रहस्य है कि सोवियत संघ के साथ लंबे चले शीत युद्ध के दौरान अफगानिस्तान में सोवियत समर्थित सरकार के विरुद्ध अमेरिका ने ही अल कायदा समेत अनेक आतंकी गुटों को जन्म दिया और उनका पालन-पोषण भी किया। पाकिस्तान इस काम में उसका मददगार रहा। यह अलग बात है कि अंतत: अफगानिस्तान से सोवियत संघ की विदाई और उसकी समर्थित सरकार के पतन के बाद वे ही आतंकी गुट अमेरिका के लिए भस्मासुर साबित हुए।

विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और असंदिग्ध धर्मनिरपेक्ष साख वाला भारत अस्सी के दशक से ही विश्व समुदाय को आतंकवाद, खासकर कुछ देशों द्वारा प्रायोजित मजहबी आतंकवाद के विरुद्ध आगाह करते हुए अंकुश लगाने के लिए ठोस कदम उठाने का आह्वान करता रहा, लेकिन दुनिया के दारोगा को आतंक की तपिश 11 सितंबर, 2001 को न्यूयार्क में ट्विन टावर्स पर आतंकी हमले के बाद ही महसूस हुई। तभी उसने खुद पर आतंकी हमला करने वाले हमलावरों और उनके मददगारों के खात्मे के लिए अफगानिस्तान पर हमला बोला, जहां तब उन्हीं तालिबान का राज था, जो अमेरिका-पाकिस्तान की साझा आतंकी नर्सरी की देन थे। उसके बावजूद पाकिस्तान कई वर्षों तक अमेरिका को भी डबल क्रॉस करता रहा। एक ओर वह आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में सहयोग की भारी-भरकम कीमत अमेरिका से वसूलता रहा तो दूसरी ओर लादेन समेत तमाम आतंकी सरगनाओं को पनाह भी देता रहा। पाकिस्तान के इस दोगलेपन का पर्दाफाश तब हुआ, जब अमेरिका ने वहां एबटाबाद में रह रहे लादेन को एक खुफिया ऑपरेशन में मार गिराया। उसके बाद ही अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्तों में खिंचाव आना शुरू हुआ। राजनीति की तरह राजनय में भी कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता। कभी अफगानिस्तान में सोवियत संघ की मौजूदगी के विरुद्ध अमेरिका ने पाकिस्तान का इस्तेमाल किया था तो बदलते परिदृश्य में विघटित सोवियत संघ का रूस तथा चीन, अमेरिका के विरुद्ध पाकिस्तान के नये दोस्त बन गये।

शुरू में पाकिस्तान के दोगलेपन और फिर खुलकर सामने आ जाने के बाद अमेरिका के लिए अफगानिस्तान ऐसा चक्रव्यूह बन गया था, जिससे साख बचा कर निकल पाना भी आसान नहीं था। आतंकियों की संरक्षक तालिबानी अफगानिस्तान सरकार को सबक सिखाने का जॉर्ज बुश का दंभ पिछले दो दशक में राष्ट्रपतियों और खुद अमेरिका को कितना महंगा पड़ा—इसका आकलन करने में भी लंबा समय लगेगा। व्यापारी बुद्धि के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को समझ आ गया था कि अफगानिस्तान से सेना समेत निकल आने में ही भलाई है। एेतिहासिक नाटकीय चुनाव में ट्रंप के सत्ता से बेदखल हो जाने के बाद नये राष्ट्रपति बाइडेन को भी यही बेहतर विकल्प लगा कि जितनी जल्दी हो, अपना दामन बचा कर अफगानिस्तान से निकल आया जाये। बेशक देर-सवेर अमेरिका को तो निकलना ही था, लेकिन इसके लिए जिस तरह आतंकी तालिबान में ही अच्छे-बुरे के भेद का छलावा अफगानिस्तान समेत विश्व समुदाय से किया गया, उसकी कीमत आज बदनसीब अफगान चुका रहे हैं तो कल पड़ोसी देशों समेत विश्व समुदाय को भी शांति-सभ्यता-मानवता को दरपेश खतरे के रूप में चुकानी ही पड़ेगी। अफगानिस्तान अपनी बहुलता और विविधता वाली कबीलाई संस्कृति के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई की सरपरस्ती में आतंकी गुटों में सत्ता की बंदरबांट के बाद अब अंतरिम सरकार के नाम पर जो 33 बदनाम चेहरे काबुल में सत्ता पर काबिज हुए हैं, उनमें न तो सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व है और न ही आधी आबादी यानी महिलाओं का।

सरकार के गठन की कवायद के बीच तालिबान आश्वस्त कर रहे थे कि महिलाओं समेत किसी भी वर्ग को आशंकित होने की जरूरत नहीं है, सभी की सत्ता में भागीदारी होगी, लेकिन अब नकाब उतर गया है। पिछले कुछ दशकों से अफगानिस्तान जिन अनिश्चितताओं और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से गुजरा है, उसमें खासकर महिलाओं का जीवन के हर क्षेत्र में हासिल मुकाम काबिले तारीफ ही कहा जायेगा, लेकिन अब उन उजालों को फिर अंधेरों में कैद करने का फरमान जारी हो गया है। बात सिर्फ स्कूल-कॉलेज में लड़के-लड़कियों की अलग-अलग कक्षाओं या उनके बीच परदे तक सीमित नहीं रहने वाली। नौकरियों से लेकर खेल के मैदान तक महिलाओं के लिए बंद होने का खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि अफगानिस्तान के स्वयंभू शासकों ने महिलाओं का काम सिर्फ बच्चे पैदा करना बताकर अपनी मध्ययुगीन मानसिकता उजागर कर दी है। ध्यान रहे कि अब हम जिस वैश्विक गांव वाली अवधारणा में रह रहे हैं, उसमें यह मध्ययुगीन बर्बरता सिर्फ अफगानिस्तान की सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगी। इसलिए भी कि अंतरिम सरकार के गठन में ही नापाक पाकिस्तान की दखल से साफ हो गया है कि तालिबान का एजेंडा कौन तय करने वाला है। पाकिस्तान के तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ ने तो आतंकवाद को अपने देश की सरकारी नीति ही बताया था, पर अफगानिस्तान में तो बाकायदा आतंकवादियों की सरकार ही बन गयी है। कश्मीर समेत कहीं भी मुस्लिम हितों के नये स्वयंभू प्रवक्ताओं ने अपने दोस्त और सबसे भरोसेमंद साझीदार का संकेत भी दे ही दिया है। तब जाहिर है कि शांति-सभ्यता-मानवता में विश्वास रखने वालों से देर-सवेर टकराव होगा ही। इसलिए किसी गलतफहमी-खुशफहमी में समय बर्बाद करने के बजाय सही सोच वालों को इस आसन्न खतरे से निपटने के लिए समन्वित रणनीति बनानी चाहिए तथा अफगानिस्तान में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए और दमन के विरुद्ध सामूहिक आवाज भी उठानी चाहिए।

journalistrksingh@gmail.com

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