शिक्षा की गुणवत्ता देश व समाज की उन्नति का आधार है। यह तभी हो पाएगा जब गुरु का दर्जा प्राप्त अध्यापकों को शिक्षण-कार्य करने के लिए सही वातावरण, समय व सुविधाएं मिलें। गैर-शैक्षणिक कार्यों से निजात मिले। ऐसे में अध्यापक बच्चों को समुचित मार्गदर्शन व परामर्श प्रदान कर सकेंगे और पेशेवराना ढंग से शिक्षण में नवाचारों पर ध्यान केन्द्रित कर सकेंगे।
नयी पीढ़ी को शिक्षा व मार्गदर्शन देकर राष्ट्र-निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला शिक्षक आज व्यवस्था का मोहरा बनकर रह गया है। उसे ऐसे कार्य सौंपे जा रहे हैं, जो उसके मूल दायित्वों और भूमिका से मेल नहीं खाते हैं। एक तरफ जहां बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में अध्यापक की भूमिका लगातार अधिक चुनौतीपूर्ण होती गई, दूसरी ओर अध्यापन संबंधी कार्याें से हटाकर उसे गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगा दिया गया। इससे शिक्षक की छवि को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कर पाना संभव नहीं।
भारतीय समाज में अध्यापक को गुरु का दर्जा दिया जाता है। लेकिन आज की वास्तविक परिस्थितियों के साथ यह सम्मान मेल नहीं खाता है। धरातल पर आकलन किया जाए तो अध्यापक का दायित्व केवल कोर्स पूरा करवाना नहीं है। वह बच्चों को परीक्षा की वैतरणी पार करवाने वाला एजेंट मात्र भी नहीं है। दरअसल, अपने विषय और उसकी विषय-वस्तु के जानकार से आगे बढ़कर वह बालमन के हर पहलू का विशेषज्ञ होता है। बच्चों के मन-मस्तिष्क में उठने वाली उथल-पुथल को समझने के लिए अपनी पेशेगत दक्षताओं का प्रयोग करता है। बच्चों के ज्ञानात्मक विकास के साथ-साथ भावनात्मक, नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व शारीरिक विकास के लिए मार्ग प्रशस्त करता है।
वह अपनी भूमिका पर खरा उतरे ऐसा वातावरण तैयार करने में सरकारी व्यवस्था का अहम रोल है। यानी इसमें सरकारी नीतियों, शिक्षा विभाग, स्कूल प्रबंधन और सुविधाओं की अहम भूमिका होती है।
सरकारी स्कूलों की बात करें तो भले ही अध्यापकों की भूमिका विद्यार्थियों में पढ़ाने की गतिविधियां संचालित करने वाले दक्षतम व्यक्ति की हो लेकिन इससे कहीं ज्यादा उसे शिक्षा के अलावा कई कार्यों को पूरा करवाने वाले सहज उपलब्ध पेशेवर की तरह देखा जा रहा है। मसलन, विभिन्न विभागों के सर्वेक्षण, वोट बनवाने, एसआईआर, जनगणना कार्यों, ऑनलाइन पोर्टलों पर विद्यार्थियों का डाटा अपलोड करने और विभिन्न सरकारी योजनाओं के लिए दस्तावेज तैयार करने और सत्यापन आदि कार्यों के लिए अध्यापकों को ही लगाया जाता है। वहीं स्कूल में मिड-डे-मील योजना के लिए सिलेंडर, सब्जियां व अन्य सामग्री खरीदने के साथ-साथ सप्लाई किए गए सामान का रखरखाव, उसके उपयोग का हिसाब-किताब रखना और विभिन्न प्रकार के रजिस्टर तैयार करना अध्यापकों की जिम्मेदारी है। अध्यापक ही हरेक बच्चे के विभिन्न मदों व फंडों के अनुसार शुल्क प्राप्त करते हैं और उन्हें जमा करवाते हैं।
गैर-शैक्षणिक कार्यों में अध्यापकों की ऊर्जा को लगाने के लिए हमारी सरकारी व्यवस्था ही जिम्मेदार है। इससे अध्यापक की पेशेवर दक्षताओं का तो ह्रास हो ही रहा है, साथ ही उसे विभिन्न प्रकार के तनावों से गुजरना पड़ रहा है। मसलन,एसआईआर की प्रक्रिया में लगे अध्यापकों को कई तरह के मानसिक तनावों से गुजरने की बातें सामने आयीं। जाहिर है, बच्चों की शिक्षा पर भी इसका प्रभाव पड़ा होगा। हालांकि इस पर विस्तृत अध्ययन की जरूरत है।
दरअसल, अध्यापक को जब उसके असल काम से हटाकर दूसरे कामों में लगा दिया जाता है, तो यह एक तरह से किसी अन्याय से कम नहीं है। बहुत से अध्यापकों का इस तरह के अहसास से गुजरना आम बात है। हमारी व्यवस्था अनेकानेक गैर-शैक्षणिक कार्यों के बोझ में दबाकर अध्यापकों से उनके अहसास को भी छीनने में लगी हुई है।
अतिथि अध्यापक, अनुबंध अध्यापक, एचकेआरएन के तहत लगे अध्यापकों और एनएसक्यूएफ के अध्यापकों के वेतन व सुविधाओं में जमीन-आसमान का अंतर है। हमारे नीति-नियंता अध्यापकों को गुरु जी कहते हुए तो मिल जाते हैं, लेकिन उन्हें उचित सम्मान प्रदान करने के मामले में उनके वास्तविक प्रयास दिखाई नहीं देते हैं। लेकिन उन्हीं गुरुजनों को पुरानी पेंशन से वंचित कर दिया है। जब भी अध्यापक इसकी मांग करते हैं तो कार्पोरेट घरानों के करोड़ों-अरबों रुपये के ऋण माफ करने वाली सरकारें इसे बोझ बताती हैं।
विभिन्न सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों वाले परिवेश में रहने वाले बच्चे आज अनेक प्रकार की समस्याओं से जूझ रहे हैं। अध्यापक बच्चों पर पूरा ध्यान दे पाएं, उन्हें समुचित मार्गदर्शन व परामर्श प्रदान कर सकें और पेशेवराना ढंग से शिक्षण में नवाचारों पर केन्द्रित हो सकें, इसके लिए उन्हें काम करने का माहौल प्रदान करना बहुत जरूरी है। गुरुजनों का सम्मान तभी सुनिश्चित होगा, जब उन्हें फिजूल के कार्यों से मुक्ति मिलेगी और अध्यापक के रूप में काम करने का अवसर मिलेगा।
जरूरी है कि चुनावी कार्यों और मिड-डे-मील आदि के लिए के लिए अलग से कर्मचारी नियुक्त किए जाएं। इससे रोजगार का सृजन होगा और अध्यापक अपने मूल काम पर फोकस कर सकेंगे। शिक्षा की गुणवत्ता हमारे देश व समाज की उन्नति का आधार है। यह तभी हो पाएगा जब अध्यापकों को शिक्षण का कार्य करने दिया जाएगा।

