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प्रकृति रक्षा के लिए कड़े कानूनी बदलावों की जरूरत

ईकोसाइड की अवधारणा

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औद्योगिक घराने पर्यावरण का नुकसान करके भारी मुनाफा कमाते हैं और कानून उल्लंघन पर जुर्माने की मामूली राशि चुका देते हैं। इस व्यवस्था ने पैसे को संरक्षण के बजाय विनाश का ‘लाइसेंस’ बना दिया है। ईकोसाइड अवधारणा इस दायित्व को ‘कठोर आपराधिक उत्तरदायित्व’ में बदलने की वकालत करती है।

मानवता ने अपनी प्रगति की गाथा अक्सर प्रकृति की कीमत पर लिखी है। औद्योगिक क्रांति से लेकर आधुनिक डिजिटल युग तक, हमने विकास की अंधी दौड़ में कंक्रीट के ढेर तो खड़े कर लिए, लेकिन इसकी वजह से नदियों को विषाक्त नालों और हरे-भरे जंगलों को रेगिस्तान में तब्दील कर दिया। आज जब हिमालय की नींव धंस रही है और हवा सांसों में जहर घोल रही है, तब एक तीखा सवाल सामने है - क्या अपराध इंसानों के खिलाफ ही ‘संगीन’ होते हैं?

इसी सवाल से एक क्रांतिकारी शब्द ने जन्म लिया - ‘ईकोसाइड’ यानी ‘प्रकृति का नरसंहार’। जिस प्रकार विश्व ने ‘जेनोसाइड’ को मानवता के विरुद्ध वीभत्स अपराध मानकर दंडित किया, अब प्रकृति के विरुद्ध किए जा रहे इस व्यवस्थित विनाश को भी उसी अंतरराष्ट्रीय कानूनी श्रेणी में रखा जाए। अब न्याय केवल इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि जंगलों और नदियों के लिए भी होना चाहिए, जिनका अस्तित्व हमारी लालसा की भेंट चढ़ गया।

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वर्तमान परिदृश्य में ‘प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे’ का सिद्धांत अपनी सार्थकता खोकर केवल ‘वैध व्यापारिक लागत’ बनकर रह गया है। बड़ी कंपनियां और औद्योगिक घराने पर्यावरण विनाश से भारी मुनाफा कमाते हैं और कानूनों का उल्लंघन करने पर लगने वाले जुर्माने को अपनी बैलेंस शीट में मामूली खर्च मानकर चुका देते हैं। इस व्यवस्था ने पैसे को संरक्षण के बजाय विनाश का ‘लाइसेंस’ बना दिया है। ईकोसाइड की अवधारणा इसी खामी पर प्रहार करते हुए नागरिक दायित्व को ‘कठोर आपराधिक उत्तरदायित्व’ में बदलने की वकालत करती है। संदेश देती है कि प्रकृति कोई ‘कमोडिटी’ नहीं जिसे नष्ट करके उसकी कीमत चंद रुपयों में चुकाई जा सके; बल्कि जीवंत इकाई है।

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जब भोपाल गैस त्रासदी और श्रीराम फर्टिलाइजर्स जैसी भयावह घटनाएं हुईं, तो न्यायपालिका ने कानून की सीमाओं को विस्तार दिया। न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने एम.सी. मेहता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1987) के मामले में ‘एब्सोल्यूट लायबिलिटी’ (पूर्ण दायित्व) का सिद्धांत प्रतिपादित किया। स्पष्ट किया कि यदि कोई उद्योग किसी खतरनाक गतिविधि में लगा है और उससे पर्यावरण को कोई नुकसान होता है, तो वह उद्योग बिना अपवाद उत्तरदायी होगा। ईकोसाइड कानून इसी ‘पूर्ण दायित्व’ के विचार को अगले स्तर पर ले जाता है। यह केवल क्षतिपूर्ति की बात नहीं करता, बल्कि व्यक्तिगत जवाबदेही और जेल की सजा का प्रावधान करता है ताकि जिम्मेदार अधिकारियों में कानून का भय और प्रकृति के प्रति सम्मान पैदा हो। कानूनी रूपांतरण का वह चरण जहां पर्यावरण का विनाश मानवता के खिलाफ संगीन जुर्म माना जाएगा।

इस कानूनी विमर्श का मुख्य केंद्र ‘मानव-केंद्रित’ दृष्टिकोण से हटकर ‘प्रकृति-केंद्रित’ न्यायशास्त्र को अपनाना है। भारतीय संविधान (अनुच्छेद 51ए(जी) और 21) पहले से ही पर्यावरण संरक्षण को कर्तव्य और अधिकार मानता है। लेकिन अब समय है प्रकृति के ‘स्वतंत्र अधिकारों’ को मान्यता देने का। ए. नागराजा (2014) और सलीम बनाम उत्तराखंड राज्य (2017) जैसे मामलों ने जानवरों और नदियों (गंगा-यमुना) को ‘विधिक व्यक्ति’ का दर्जा देकर नई राह दिखाई है। यदि एक नदी कानून की नजर में ‘व्यक्ति’ है, तो उसे प्रदूषित करना ‘हत्या के प्रयास’ जैसा गंभीर अपराध माना जाना चाहिए।

वैश्विक स्तर पर ईकोसाइड को अपराध घोषित करने की मुहिम तेज हो रही है, जहां बेल्जियम और फ्रांस जैसे देशों ने अपने घरेलू कानूनों में इसे शामिल कर मिसाल पेश की है। वर्तमान में ‘स्टॉप ईकोसाइड इंटरनेशनल’ जैसे संगठन यह प्रयास कर रहे हैं कि अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय की ‘रोम संविधि’ में संशोधन कर ईकोसाइड को नरसंहार और युद्ध अपराधों की श्रेणी में ‘पांचवां अंतर्राष्ट्रीय अपराध’ घोषित किया जाए। ताकि कोई राष्ट्र या कॉर्पोरेट विकास की आड़ में पर्यावरण को अपूरणीय क्षति न पहुंचा सके।

भारत के लिए ईकोसाइड कानून अपनाना केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटना होगा। ‘वसुधैव कुटुंबकम‍्’ और ‘माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या:’ के दर्शन को मानने वाले देश के लिए प्रकृति के अधिकारों की रक्षा करना एक स्वाभाविक कदम है। यह कानून विकास का विरोधी नहीं, बल्कि ‘जिम्मेदार और सतत विकास’ का समर्थक है। यह संतुलित प्रगति की परिभाषा है जहां मानवता और प्रकृति सह-अस्तित्व में फलें-फूलें।

निश्चित रूप से, ईकोसाइड कानून के मार्ग में ‘गंभीर क्षति’ को परिभाषित करने और साक्ष्य जुटाने जैसी चुनौतियां हैं। इसके समाधान के लिए हमें अपने कानूनी शिक्षण में ‘अर्थ ज्यूरिसप्रुडेंस’ को शामिल करना होगा। अब हम जोशीमठ जैसे संकटों या दम तोड़ती नदियों को केवल ‘प्राकृतिक आपदा’ का लेबल न दें, बल्कि उन मानवीय निर्णयों की आपराधिक जांच करें जिन्होंने इन आपदाओं का मार्ग प्रशस्त किया। हमें एक ऐसी उत्तरदायी व्यवस्था चाहिए जो विकास की आड़ में किए गए संस्थागत अपराधों को पहचानकर उन्हें दंडित कर सके।

ईकोसाइड केवल एक कानूनी शब्द नहीं, बल्कि एक नैतिक चेतावनी है। प्रकृति को ‘वस्तु’ मानने की हमारी भूल हमें विनाश की ओर ले जा रही है। जब तक कानून की किताबों में ‘प्रकृति की हत्या’ को ‘मानव की हत्या’ के समकक्ष गंभीरता नहीं दी जाएगी, तब तक विनाश का यह सिलसिला नहीं थमेगा। ईकोसाइड कानून को मान्यता देना इस धरती के प्रति हमारी जवाबदेही का प्रमाण होगा।

लेखक कुरुक्षेत्र विवि के विधि विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं।

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