हिंसा पीड़िताएं

शीर्ष अदालत से सख्त मानदंडों की उम्मीद

शीर्ष अदालत से सख्त मानदंडों की उम्मीद

अनूप भटनागर

अनूप भटनागर

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद भड़की हिंसा के दौरान असहाय महिलाओं से कथित सामूहिक बलात्कार की घटनाओं ने सहज ही गुजरात में 2002 में हुई सांप्रदायिक हिंसा में बेस्ट बेकरी कांड और बिलकिस बानो कांड की याद ताजा कर दी। देखना यह है कि इन पीड़ितों को जल्द न्याय मिलेगा या फिर इन्हें भी कानूनी दांव पेचों का सामना करना पड़ेगा।

पश्चिम बंगाल के पीड़ित चाहते हैं कि उच्चतम न्यायालय इनका संज्ञान लेने के बाद इन्हें विशेष जांच दल को सौंपे और मुकदमों की सुनवाई राज्य के बाहर किसी अदालत में कराये। अब सवाल यही है कि क्या पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिये गैर सरकारी संगठन आगे आएंगे और क्या राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग और न्यायपालिका इसी तरह का कड़ा रुख अपनायेगी? राज्य सरकार के रवैये से सवाल उठता है कि अगर रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ जाए तो जनता का क्या होगा? क्या वजह है कि राज्य में हिंसा के दौरान पुलिस मूक बनी रहती है। लोगों का बड़ी संख्या में पलायन होता है और राज्यपाल को इन विस्थापितों से मिलने के लिये दूसरे राज्य में जाना पड़ता है।

हिंसा की घटनाओं की जांच के लिये मामला कलकत्ता उच्च न्यायालय में लंबित था और इस दौरान राज्य सरकार इस तरह की किसी भी घटना को नकारती आ रही थी। लेकिन उच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की पीठ इससे संतुष्ट नहीं थी। पीठ ने अंतत: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को इसकी जांच का काम सौंपा। उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह मानव अधिकार आयोग के जांच दल के साथ हर तरह का सहयोग करे। उम्मीद है कि राज्य सरकार राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के साथ पूरा सहयोग करेगी।

आरोप है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव नतीजे आने के बाद फिर से सत्तासीन हुई तृणमूल कांग्रेस के कथित समर्थकों ने प्रदेश के कई इलाकों में भाजपा का समर्थन करने वाले लोगों के घरों और उनके परिवारों को निशाना बनाया। उनके घरों में लूटपाट की और महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया। पूर्वी मिदनापुर की 64 वर्षीय महिला का आरोप है कि चार मई की रात में टीएमसी के कार्यकर्ताओं ने उसके घर पर धावा बोलकर तोड़फोड़ की और फिर उससे सामूहिक बलात्कार किया। सामूहिक बलात्कार की मेडिकल जांच में पुष्टि भी हुई लेकिन इस मामले में नामित आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई।

इसी तरह, यह भी आरोप है कि नौ मई को टीएमसी के कार्यकर्ताओं ने अनुसूचित जाति की 17 वर्षीय युवती के साथ सामूहिक बलात्कार किया। कथित रूप से सामूहिक बलात्कार की शिकार इन महिलाओं ने उच्चतम न्यायालय से अनुरोध किया है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हुई हिंसा की विशेष जांच दल या केन्द्रीय जाच ब्यूरो से जांच करायी जाये और इन मामलों से संबंधित मुकदमों को राज्य के बाहर किसी अदालत को सौंपा जाये ताकि उनके साथ न्याय हो सके। ऐसी ही घटनाएं गुजरात में 2002 के गोधरा कांड के बाद भड़की हिंसा के दौरान हुई थी। गुजरात में सांप्रदायिक दंगे के करीब एक दर्जन मामलों की निष्पक्ष जांच के लिये उच्चतम न्यायालय ने विशेष जांच दल गठित किया था। शीर्ष अदालत ही लगातार इन दंगों की घटनाओं की जांच की प्रगति की निगरानी कर रही थी।

शीर्ष अदालत के सख्त रवैये का ही नतीजा था कि बेस्ट बेकरी कांड में पहले राउंड में निचली अदालत से जून, 2003 में बरी हो गये अभियुक्तों के खिलाफ फिर से आरोपों की जांच हुई। न्यायालय ने इस मुकदमे की सुनवाई गुजरात के बाहर महाराष्ट्र में कराई, जिसमें दोषियों को सजा मिल सकी। कमोबेश, यही हाल बिलकिस बानो कांड का भी था। इस प्रकरण में भी गुजरात की अदालत से न्याय नहीं मिलने पर उच्चतम न्यायालय ने मुकदमे की सुनवाई मुंबई की विशेष अदालत को सौंपी। इस विशेष अदालत ने 20 में से 12 अभियुक्तों को बलात्कार, हत्या और सबूत मिटाने का दोषी ठहराते हुए उन्हें सजा सुनाई थी। देश की शीर्ष अदालत ने सितंबर, 2019 में अपने आदेश में सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई बिलकिस बानो को 50 लाख रुपये मुआवजा देने और उसे सरकारी नौकरी तथा नियमों के अनुरूप आवास उपलब्ध कराने का निर्देश भी गुजरात सरकार को दिया था।

मानव अधिकारों की रक्षा के मामले में उच्चतम न्यायालय की संवेदनशीलता और सक्रियता के मद्देनजर ही पश्चिम बंगाल की ये पीड़ित महिलायें अब इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच के लिये विशेष जांच दल गठित करने और पीड़ितों के लिये उचित मुआवजे की खातिर सर्वोच्च न्यायालय की ओर नजर गढ़ाये हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि गुजरात की तरह ही पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा और सामूहिक बलात्कार जैसी बर्बरतापूर्ण घटनाओं की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिये न्यायपालिका सख्त मानदंड अपनायेगी।

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