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राजस्व घाटे के बहाने तैयार रणनीति

द ग्रेट गेम

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वित्त आयोग ने केंद्र को प्राप्त कुल राजस्व में से राज्यों को दिए जाने वाले हिस्से का फार्मूला बदल दिया है। अब से किसी राज्य को केंद्र से मिलने वाले धन की मात्रा इस बात पर निर्भर करेगी कि राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में उसका योगदान कितना रहा।

गत सप्ताह की शुरुआत में ‘द ट्रिब्यून’ में मेरे सहयोगी सुभाष राजटा की लिखी एक खबर छपी थी, जो हिमाचल प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार द्वारा अपने इस्तेमाल के लिए 10 लग्ज़री कारें खरीदने के बारे में थी –जबकि ठीक इसी वक्त मुख्यमंत्री 16वें वित्त आयोग के कर्ता-धर्ताओं से राज्यों को दिए जाने वाला राजस्व घाटा अनुदान बंद करने और मितव्ययिता अपनाने वाले अपने उस फैसले पर पुनर्विचार के लिए गुहार लगाने दिल्ली गए थे– इस खबर से हंगामा मच गया।

लोगों का पूछना वैध है कि अगर स्कूलों, बसों, अस्पतालों वगैरह के बजट में कटौती की जा रही है तो ऐसे में मंत्रियों और नौकरशाहों को फैंसी, नई कारों का इस्तेमाल करने की ज़रूरत क्यों है —देखा जाए तो, ‘लाल बत्ती’ का खुमार नई गाड़ियों की खरीद करने से नहीं रोकता। फिर, हिमाचल सरकार अपनी ही पार्टी की बनाई उस ‘सुधार संहिता पुस्तिका’ से सबक क्यों नहीं ले रही, जिसे 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने लागू किया था, और जिसको बनाने में उस वक्त के वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और वित्त सचिव मोंटेक सिंह अाहलूवालिया ने अच्छी-खासी मदद की थी। इससे न केवल भारत को बदलने में मदद मिली बल्कि भारतीयों को दुनिया का सामना करने का आत्मविश्वास भी मिला। (लगता है कि सुक्खू ने कुछ नए उपाय सीखने के लिए पिछले दिनों पूर्व वित्त मंत्री पी‍. चिदंबरम से मुलाकात की है)।

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निश्चित तौर पर, 6,390 करोड़ रुपये के राजस्व घाटा, जो कि हिमाचल प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 फीसदी बनता है, सुक्खू के लिए एक समस्या है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि राजस्व घाटे में रहने वाला केवल उनका राज्य ही एकमात्र है। न ही ऐसा है कि पैसा खर्च करना कोई बुरी बात है— लेकिन हम सब जानते हैं कि जरूरत से अधिक खर्च (जब तक कि यह आपको ऐसे कर्ज़ में न डाल दे जिसे आप चुका न पाएं) अर्थव्यवस्था चलाए रखने में मददगार होता है। इसीलिए यह मापने करने के लिए कितना कर्जदार आपका सूबा है, मुख्य पैमाना निरोल आकंड़े न देखकर, राज्य के सकल घरेलू उत्पाद के परिप्रेक्ष्य में राजस्व घाटे का प्रतिशत कितना है, यह देखना चाहिए।

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तो पंजाब का अनुमानित राजस्व घाटा, जो 23,957 करोड़ रुपये है, जो कि सूबे के सकल घरेलू उत्पाद का 2.7 प्रतिशत बनता है, और यह काफी ज्यादा है। तमिलनाडु का राजस्व घाटा 41,635 करोड़ रुपये तो और भी ज़्यादा है, लेकिन यह राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का महज 1.17 प्रतिशत है। केरल की मार्क्सवादी सरकार– जो अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक भलाई योजनाओं में लगाती है और जिसकी आबादी पंजाब जितनी ही है– उसका राजस्व घाटा पंजाब के मुकाबले ज़्यादा है, 27,125 करोड़ रुपये, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद के परिप्रेक्ष्य में राजस्व घाटा उससे कम है, यानी 1.9 फीसदी। वहीं दूसरी ओर, भारत के सबसे समृद्ध राज्यों में से एक कर्नाटक का राजस्व घाटा 19,262 करोड़ रुपये है, जो कि उसके सकल घरेलू उत्पाद के परिप्रेक्ष्य में महज 0.6 फीसदी बनता है।

आप तस्वीर साफ़ रूप में देखिए। छोटे से हिमाचल प्रदेश ने शिक्षा जैसे कुछ पैमानों पर अच्छा कर दिखाया है, लेकिन वह अपना खर्च पूरी तरह से अपने तौर पर चलाने के लिए पर्याप्त राजस्व नहीं जुटा पाता। दूसरी ओर, तमिलनाडु जैसे कहीं ज्यादा बड़ा सूबे, भले ही वे मुफ़्त की रेवड़ियां बांटने में पैसा उड़ाते हों – यह सब करने का आरोप हिमाचल पर भी है – अपने बजट को काबू में रख पाते हैं क्योंकि बड़े पैमाने के निवेश इन्वेस्टमेंट बूते वे अपने खर्च को पूरा कर पाते हैं।

असल में, तमिलनाडु, जहां एक साल के भीतर विधानसभा चुनाव होने हैं –2027 में, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के साथ– उसने अपने राजस्व घाटे को और भी नीचे लाने का वादा किया है। दूसरी ओर, पंजाब और हिमाचल, दोनों के सामने खाली पड़ा खजाना मुंह बाए खड़ा है – और उसे भरने के उपाय उनके पास कम ही हैं।

फिर भी, इसमें से कुछ अभी भी नया नहीं है। पिछले कुछ दिनों में जिस बात ने सच में सबको चौंका दिया है, वह जाने-माने अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया के नेतृत्व वाले 16वें वित्त द्वारा राजस्व घाटा अनुदान बंद करने की घोषणा न होकर बल्कि कुछ और ज़्यादा ज़रूरी बात है। वित्त आयोग ने एक बिल्कुल नया मापदंड जोड़कर केंद्र को प्राप्त कुल राजस्व में से राज्यों को दिए जाने वाले हिस्से का फार्मूला बदल डाला है —जो उनके बजट का 41 प्रतिशत तक हुआ करता था। अब से किसी राज्य को केंद्र से मिलने वाला धन की मात्रा इस बात पर निर्भर करेगी कि राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में उसका योगदान कितना रहा।

यहां पर दो संदेश हैं। पहला, तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे लचीले और निवेश-मित्र राज्यों को फायदा होगा; जबकि हिमाचल प्रदेश जैसे सूबे, जिनकी आय क्षमता सीमित है, उनको नुकसान होगा। इसलिए, पहला सवाल यह है कि इसका केंद्र-राज्य संबंधों पर क्या असर पड़ेगा, जिनका बही-खाता अब तक पारंपरिक रूप से बराबरी और कमजोर तबके के लिए ज़्यादा उदारता भरी सोच रखने पर आधारित रहा है। नए फॉर्मूले के तहत, कमजोर तबके को खुद को घाटे से बाहर निकालने के लिए ज़्यादा मेहनत करनी होगी।

यह देखना दिलचस्प है कि हिमाचल को असल में 15वें वित्त आयोग की अपेक्षा 16वें वित्त आयोग से ज़्यादा धन मिला है। यानी जब श्रीमान सुक्खू शोर मचा रहे हैं कि उनके राज्य को पर्याप्त धन नहीं दिया गया, ऐसे में वित्त मंत्रालय के बाबुओं का यह कहना सही होगा ‘नहीं, असल में हिमाचल के पास धन है’ और यह कि कांग्रेस सरकार को अपने वित्तीय खर्चों का प्रबंधन बेहतर ढंग से करना सीखना चाहिए। (सनद रहे, हिमाचल में 2027 के आखिर में चुनाव हैं।)

दूसरा संदेश भी उतना ही दिलचस्प है। अगले 12 महीनों में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जैसे कि तमिलनाडु, असम, पंजाब, केरल और पश्चिम बंगाल —उनमें बंगाल को छोड़कर— उन्हें 15वें वित्त आयोग से मिले धन की बनिस्बत वर्तमान में अधिक हिस्सा मिला है। इनमें असम को छोड़, बाकी सब राज्यों में विपक्षी सरकारें हंैं। चौंकाने वाली बात यह कि बड़े सूबे जैसे कि बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश, जहां भाजपा सरकारें हैं –उन्हें पिछली बार की अपेक्षा इस बार कम धन मिला है।

निरा संयोग या शुद्ध रणनीति? श्रीमान पनगढ़िया निस्संदेह, अधिक अर्थपूर्ण और कहीं कम फिजूलखर्च अर्थव्यवस्था के पक्ष में होंगे। उनका तर्क हो सकता है कि धन का कोई रंग नहीं होता, फिर क्या हुआ कि इनमें से कुछ राज्यों में विपक्षी दलों की सरकार है। लेकिन लगता है केंद्र से आया संदेश बहुत अलग है। हिंदी भाषी सूबों को कम धन आवंटित किया गया, क्योंकि वे तो पहले से ही भाजपा की झोली में हैं। दरियादिली कहीं और बेहतर इस्तेमाल हो सकती है। खासकर जहां विधानसभाई चुनाव होने जा रहे हैं।

निस्संदेह, हिमाचल की तरह पंजाब भी भाजपा के राडार पर है। भले ही केरल अलग किस्म की मछली हो, फिर भी मछली को चारा डालने में कोई नुकसान नहीं है – वास्तव मे, तिरुवरअनंतपुरम में यह कांटे में फंस भी चुकी है। तमिलनाडु कहीं बड़ा है और पार पाने में कहीं ज्यादा मुश्किल है (कर्नाटक के लिए 2028 तक इंतजार करना होगा)।

स्पष्ट है कि 16वें वित्त आयोग ने बीज बो दिया है। अब पौधे को पानी देना और यह देखना बाकी है कि पल्लवित किस प्रकार होता है।

लेखिका ‘द ट्रिब्यून’ की प्रधान संपादक हैं।

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