महिला अपराध रोकने को हो फौलादी इच्छाशक्ति : The Dainik Tribune

महिला अपराध रोकने को हो फौलादी इच्छाशक्ति

महिला अपराध रोकने को हो फौलादी इच्छाशक्ति

प्रेम चौधरी

प्रेम चौधरी

नयी दिल्ली में श्रद्धा वालकर के लिव-इन-पार्टनर आफताब पूनावाला द्वारा की गई वीभत्स हत्या, जिसमें कथित तौर पर लाश के 35 टुकड़े किए गए हैं, प्रसंग ने महिलाओं के विरुद्ध हिंसा पर पुनः ध्यान खींचा है। यह हिंसा शारीरिक, भावनात्मक, यौन या मानसिक हो सकती है। यह करतूत किसी निकट सहयोगी या जान-पहचान वाले या फिर पूर्व पति, लिव-इन-पार्टनर या पुरुष-मित्र इत्यादि की हो सकती है।

औरत के खिलाफ हिंसा का खतरा जीवनपर्यंत बना रहता है, बल्कि उसके पैदा से पूर्व भी– भ्रूण लिंग पहचान एवं गर्भपात से लेकर बाल-विवाह, जबरन शादी, दहेज-संबंधी हिंसा, वेश्यावृत्ति में धकेलना, सार्वजनिक स्थानों एवं कार्यस्थल पर यौन प्रताड़ना, प्रतिष्ठा-वध, तेजाबी हमला और बलात्कार इत्यादि रूपों में।

सामाजिक रीत में कन्या की पैदाइश से बचना और पुत्र प्राप्ति के प्रति आसक्ति सदा रही है। अध्ययन हमें निरंतर बढ़ते जा रहे लिंग-अनुपात का अंतर दर्शाते हैं। वर्ष 1981 में प्रति 1000 पुरुषों के बरक्स 962 महिलाएं थीं, जो 1991 में 945, 2001 में 927 तो 2011 में और घटकर 914 रह गईं। पितृसत्तात्मक व्यवस्था और सामाजिक-आर्थिक कारकों ने इस अधोगति को बढ़ाया है। पुत्र-चाहना ने पति-परिवार द्वारा जन्मपूर्व लिंग जांच के जरिए गर्भ की तालेबंदी कर दी है। लिंग पहचान में यदि लड़की हुई तो गर्भपात करवाने की सोची जाती है, अधिकतर यह गर्भवती की मर्जी के बिना होता है और यह उसके यौन एवं प्रजनन अधिकारों का हनन है। इस काली करतूत पर नकेल डालने के लिए बेशक विशिष्ट कानून हैं, जिनमें इरादन गर्भपात के लिए सख्त सजा का प्रावधान है, फिर भी अनेक राज्यों में जन्म पूर्व लिंग-जांच का गैरकानूनी खेल चला हुआ है।

हालांकि बाल-विवाह रोधी कानून-2006 बनने से छुटपन के विवाहों की कुल संख्या में कमी आई है, फिर भी जहां कहीं आज भी जारी है। वहां यह लड़कियों के जीवन को खतरा है, फिर इसका रूप चाहे घरेलू हिंसा, वैवाहिक-बलात्कार या कच्ची उम्र के गर्भाधान के रूप में क्यों न हो।

जगह निजी हो या सार्वजनिक, महिला विवाहित हो या नहीं, उस पर बलात्कार और शारीरिक-मौखिक छेड़छाड़ सहित यौन हिंसा का खतरा सदा मंडराता रहता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2021 में भारत में औसतन रोजाना 86 बलात्कार हुए। महिलाओं के विरुद्ध आपराधिक मामलों की प्रति घंटा संख्या लगभग 49 थी। यौन हिंसा की शिकार बनी बहुत सी महिलाएं समाज खासकर परिवार और जाति में बेजा फजीहत और हिकारत भरे अनुभवों की आशंका से गहरी शर्मिंदगी ढोने को मजबूर हो जाती हैं। यह मनोस्थिति आत्महत्या या खुद को चोटिल करने वाली हिंसा की ओर प्रेरित कर सकती है।

पुरुष की यौन पहल का विरोध करना या ठुकराने पर कुछ महिलाओं को तेजाब हमला तक झेलना पड़ा है। तेजाब हमलों के ज्यादातर मामले उन महिलाओं के हैं जिन्होंने पितृसत्तात्मक नियमों को चुनौती दी, बाल-विवाह का विरोध किया या किसी का इकतरफा प्रणय ठुकराया।

वर्ग विशेष की महिलाओं के विरुद्ध हिंसा भी होती रहती है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित महिलाएं अनेक प्रकार के भेदभाव और हिंसा का बारम्बार शिकार बनती हैं। जातिगत भेदभाव में एक ही जाति से होने के बावजूद ‘ऊंच-नीच’ का फर्क अभी भी गहरा और व्याप्त है।

महिला शिकायतों के निदान के लिए कानूनी उपाय हेतु कई संस्थान बनाए गए हैं। कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिबंध एवं निदान) कानून 2013 के अंतर्गत 10 से अधिक महिलाकर्मी वाले सभी कार्यस्थलों पर एक शिकायत कमेटी का गठन करने का प्रावधान है। हालांकि इसमें झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायत के लिए जुर्माना वाली धारा है, तथापि इस कानून में ख्याल रखा गया है कि यथेष्ट सुबूत या टिकाऊ शिकायत के अभाव के नाम पर पीड़ित महिला को दुबारा यह उत्पीड़न न भुगतना पड़े।

वर्ष 2012 के कुख्यात और नृशंस निर्भया कांड के बाद महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के मामलों पर कार्रवाई करने को राष्ट्रीय स्तर पर तरजीह दी गई। भारतभर में इस कांड के बाद जिस कदर रोष प्रदर्शन हुए थे, उससे आपराधिक कानून संशोधन–2013 बना। इसमें तेजाब हमले को ‘अपराध विशेष’ माना गया और यौन उत्पीड़न, महिला को निर्वस्त्र करने के उद्देश्य से आपराधिक बल प्रयोग, बेजा आशिकी या पीछा करने जैसे कृत्यों के लिए भी सजा का प्रावधान है। आपराधिक कृत्यों की नई परिभाषाओं और कड़ी सजा से युक्त यह कानून विधेयक ढांचे में सुधार लेकर आया है।

अलबत्ता इस कानून के पूरी तरह क्रियान्वयन में बहुत कुछ करने की जरूरत है। घरेलू हिंसा पीड़ित स्त्री को यदि नए सुरक्षा कानून के अंतर्गत अपनी शिकायत दर्ज करवाने में मुश्किल हो तो सुरक्षा अधिकारी का संरक्षण दिए जाने का प्रावधान है। पर देशभर में ऐसे सुरक्षा अधिकारियों की भर्ती और नियुक्ति नाकाफी है, ज्यादा संख्या अतिरिक्त-समय में काम करने वालों की है, तिस पर शिकायत दर्ज करवाने में पीड़िता की सहायता हेतु यथेष्ट संसाधन नहीं है। उदाहरणार्थ, 3.2 करोड़ की महिला आबादी वाले राजस्थान में केवल 600 के आसपास महिला सुरक्षा अधिकारी हैं और लगभग 120 संगठन बतौर सेवा-प्रदाता पंजीकृत हैं।

महिलाओं के विरुद्ध किए गए अपराधों की जांच, मुकदमा चलाने और सजा दिलवाने के संबंध में चिंताएं उठती रहती हैं। फिर भी पुलिस बल और न्यायपालिका में महिला उपस्थिति का अनुपात बहुत कम है। यह महिला संबंधी मामलों पर ध्यान में कमी का एक कारक है। खुद दीगर पुलिस-न्यायिक-अन्य अधिकारियों के अंदर पितृसत्तात्मक रवैया गहरा धंसे होने की वजह से भी महिला विरोधी हिंसा की पीड़िता या तो शिकायत नहीं करवा पाती या वापस लेने को मजबूर की जाती है या फिर अदालती चक्कर में पड़ने से कतराती है। मददविहीन पीड़िता की शिकायत पर कार्रवाई सुनिश्चित करने की अक्षमता के चलते स्त्री विरोधी हिंसा और भेदभावपूर्ण बर्ताव के मामले बढ़े हैं।

हानिकारक रीति-रिवाज, लिंग आधारित भेदभाव और पितृसत्तात्मक मानसिकता बने रहना गंभीर चिंता है। ‘महिला से पुरुष श्रेष्ठ है’, यह भाव महिला-दासता को बदतर करने के अलावा प्रासंगिक कानून एवं नीति उपायों के क्रियान्वयन में भी रुकावट हैं। इन विषयों पर बृहद प्रयास किए बगैर शैक्षणिक संस्थान, कार्यस्थल, परिवार, समुदाय और मीडिया में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का खात्मा एक बहुत बड़ी चुनौती बनी रहेगी। जरूरी है कि महिलाओं के विरुद्ध तमाम किस्म की हिंसा के उन्मूलन प्रयासों में प्रशासन इस चुनौती को कमतर न आंके।

लेखिका स्तंभकार एवं शिक्षाविद् हैं।

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