एक फूफी ममता दीदी हैं, जिनका भतीजे से मोह ही नहीं छूट रहा और एक फूफी बहन मायावती हैं कि जो जब चाहती हैं कि भतीजे आकाश आनंद को गोद से उतार कर फेंक देती हैं।
नाराज फूफाओं के इस दौर में जब तक फूफियां हैं, तब तक इस बात की तसल्ली रहनी चाहिए कि भाई-भतीजावाद कायम है। वरना तो सचमुच यह माना जाने लगा था कि राजनीति में अब भाई-भतीजावाद के दिन लद ही गए हैं। इसकी वजह यह नहीं है कि परिवारवाद का बड़ा हल्ला मचने लगा है। हल्ला मचाने वाले ही कहां परिवारवाद से अछूते हैं। लेकिन यह बात सच है कि इधर नेता लोगों ने भाई-भतीजों को पूछना लगभग बंद ही कर दिया-भैया मैं क्या करूं बेटा नहीं मान रहा, आप अपना देख लो! लगता है जी, कि बेटों के आने से ही भाई-भतीजों को यह दिन देखने पड़ रहे हैं।
वैसे मनप्रीत बादल आजकल कहां हैं। और बेटों की क्या बात है जी एक वक्त तो दामाद तक आने लगे थे। नायडूजी को भूलिए मत न। लेकिन अच्छी बात यह है जी, जब तक फूफियां हैं, तब तक तसल्ली रखिए कि भाई-भतीजावाद कायम है। अब ममता दीदी को ही देख लो। पार्टी दे दी। बंगाल की जनता ने दीदी को कुर्सी से उतार दिया, पर दीदी ने भतीजे को गोद से नहीं उतारा। भतीजे के लाड़ लड़ाने के चक्कर में लोग उनकी पार्टी तक ले गए। पर उन्होंने भतीजे के सिर से हाथ नहीं हटाया। और उनकी पार्टी को ले कौन गया-एनसीपीआई। कोई नाम तक नहीं जानता।
खैर जी, इधर नाराज फूफाओं का बड़ा हल्ला मचा हुआ है। वैसे तो इसका श्रेय राजू श्रीवास्तव जैसे स्टैंडअप काॅमेडियनों को जाना चाहिए, जो नाराज फूफाओं को चर्चाओं में लेकर आए थे। लेकिन राजनीति में नाराज फूफाओं को चर्चा में लाने का श्रेय निश्चित रूप से प्रधानमंत्रीजी को जाता है। बस डर यही है कि हमारे हरियाणे की तरह अगर नाराज फूफा बिना नेग लिए नहीं टले, तो क्या होगा। लेकिन नाराज फूफाओं के इस हल्ले का नुकसान यह हो रहा है कि नाराज फूफियों का कोई जिक्र तक नहीं कर रहा। एक फूफी ममता दीदी हैं, जिनका भतीजे से मोह ही नहीं छूट रहा और एक फूफी बहन मायावती हैं कि जो जब चाहती हैं कि भतीजे आकाश आनंद को गोद से उतार कर फेंक देती हैं। पिछले साल छह महीने से यही चल रहा है कि दो महीने वे फूफी की गोद में होते हैं और दो महीने जमीन पर पड़े बिसूरते रहते हैं।
इधर खबर यह भी है कि वे इस भतीजे को गोद से उतारकर दूसरे भतीजे यानी ईशान आनंद को गोद में बिठाने वाली हैं। फिर पता चला कि उनका प्यार तो भतीजी दीपिका के लिए उमड़ रहा है। चंद्रशेखर रावण से लेकर अखिलेश यादव तक सबने मायावती को फूफी बनाने की कोशिश की। लेकिन फूफी रहेंगी वे अपने भतीजों की ही। क्योंकि जब तक फूफी हैं तब तक इस बात की तसल्ली है कि भाई-भतीजावाद कायम है।

