नकली दवाओं का निर्माण और वितरण समाज के लिए गंभीर खतरा है, जिसे कड़े कानून और तकनीकी उपायों से रोका जा सकता है। क्यूआर कोड की अनिवार्यता, डिजिटल लेजर में एंट्री, नेशनल ड्रग डेटाबेस के अलावा उन्नत टेस्टिंग उपकरणों से बेहतर निगरानी व पारदर्शिता यकीनी बनेगी।
मानव जीवन की रक्षा में औषधियों की भूमिका किसी संजीवनी से कम नहीं है, परंतु जब मुनाफे की अंधी दौड़ में ये औषधियां ही जहर बन जाएं, तो समाज की नींव हिलने लगती है। जब बाजार में जीवन रक्षक दवाओं के नाम पर ‘चॉक पाउडर’ या ‘दूषित रसायनों’ का मिश्रण पहुंचता है, तो इसे केवल व्यापारिक धोखाधड़ी या बौद्धिक संपदा की चोरी मान लेना एक बड़ी भूल होगी। वास्तव में, नकली दवाओं का निर्माण और वितरण सीधे तौर पर ‘हत्या का प्रयास’ है, जो किसी व्यक्ति को उपचार से वंचित कर उसे मौत के मुंह में धकेल देता है।
भारत, जिसे अपनी गुणवत्ता और सामर्थ्य के कारण दुनिया की ‘फार्मेसी’ कहा जाता है, उसके लिए यह संकट दोहरा है। यह हमारी अंतरराष्ट्रीय साख को भी धूमिल करता है। समय की मांग है कि कानून की शक्ति और तकनीक की पारदर्शिता आपस में हाथ मिलाकर एक ऐसा अभेद्य तंत्र विकसित करें, जहां अपराधी के लिए कोई छिद्र शेष न रहे।
भारत में दवाओं के नियमन का ढांचा औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के साथ शुरू हुआ था, जो अपने समय के अनुसार एक ठोस दस्तावेज था। हालांकि, जैसे-जैसे समय बदला, अपराधियों के सिंडिकेट ने कानून की कमियों को पहचान लिया। साल 2008 में सरकार को यह आभास हुआ कि पुराने कानून में निहित मामूली जुर्माने और सजा इन बड़े गिरोहों के लिए कोई डर पैदा नहीं करते। इसी कारण अधिनियम में व्यापक संशोधन किए गए ताकि कानून के दांतों को पैना किया जा सके।
वर्तमान में, धारा 27(ए) के अंतर्गत कड़े प्रावधान किए गए हैं। यदि किसी नकली दवा के सेवन से व्यक्ति की मृत्यु होती है या उसे गंभीर शारीरिक क्षति पहुंचती है, तो दोषी को कम से कम 10 साल की कड़ी सजा का प्रावधान है, जिसे अपराध की गंभीरता के आधार पर आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। इसके साथ ही, 10 लाख रुपये या दवा की कुल कीमत का तीन गुना तक का भारी जुर्माना लगाया जाता है।
न्यायपालिका ने भी इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया है। ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम अशोक कुमार शर्मा’ (2020) जैसे ऐतिहासिक मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जन स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वाले अपराधियों को किसी भी प्रकार की न्यायिक रियायत या नरमी नहीं मिलनी चाहिए। अदालतों ने ड्रग इंस्पेक्टर्स की शक्तियों को स्पष्ट करते हुए उन्हें जांच, नमूना संग्रह और जब्ती की प्रक्रिया में अधिक स्वायत्तता प्रदान की है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तकनीकी खामियों के कारण कोई अपराधी कानून की पकड़ से बाहर न निकल सके। कानून का यह प्रहार तब और प्रभावी हो जाता है जब इसे डिजिटल नवाचारों का समर्थन मिलता है। आज का दौर डेटा और पारदर्शिता का है, जहां ‘ट्रैक एंड ट्रेस’ तकनीक इस पूरी व्यवस्था की रीढ़ बन चुकी है। कागजी दस्तावेजों के हेरफेर के दिन अब लद चुके हैं और सरकार द्वारा शीर्ष 300 ब्रांडों पर क्यूआर कोड अनिवार्य करना इस दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।
तकनीकी मोर्चे पर सबसे शक्तिशाली समाधान ‘ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी’ में निहित है। यदि दवा के कच्चे माल यानी ‘एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट’ की खरीद से लेकर कारखाने में उसके निर्माण, फिर डिस्ट्रीब्यूटर के गोदाम और अंततः मरीज के हाथ तक पहुंचने की हर कड़ी को एक सुरक्षित ‘डिजिटल लेजर’ में दर्ज करें, तो हेरफेर की संभावना शून्य हो जाती है। ब्लॉकचेन की खूबी यह है कि इसमें एक बार दर्ज जानकारी को कोई भी माफिया बदल या मिटा नहीं सकता। इसके साथ ही, एक ‘सेंट्रलाइज्ड नेशनल ड्रग डेटाबेस’ की स्थापना अनिवार्य है। अक्सर देखा गया है कि एक राज्य में प्रतिबंधित दवा दूसरे राज्य में बेची जाती रहती है। एक एकीकृत डेटाबेस होने से किसी भी कोने में पकड़ी गई नकली दवा की जानकारी रियल-टाइम में देशभर के ड्रग इंस्पेक्टर्स को मिल सकेगी, जिससे अपराधियों के भागने के रास्ते बंद हो जाएंगे।
ड्रग विभाग की भूमिका को भी अब पारंपरिक ‘इंस्पेक्टर राज’ से ऊपर उठकर ‘प्रौद्योगिकी मित्र’ के रूप में विकसित होना होगा। अब अधिकारियों को केवल छापेमारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें ‘डेटा एनालिटिक्स’ का विशेषज्ञ बनना होगा। यदि किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र में किसी ब्रांड की दवा की खपत अचानक और अस्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है, तो सिस्टम को स्वतः ही ‘रेड फ्लैग’ या चेतावनी जारी करनी चाहिए। इसके साथ ही, ड्रग इंस्पेक्टरों को अत्याधुनिक ‘हैंडहेल्ड रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी’ जैसे टेस्टिंग उपकरणों से लैस किया जाना चाहिए। ये उपकरण मौके पर ही, बिना पैकिंग खोले, दवा की शुद्धता की प्राथमिक जांच कर सकते हैं, जिससे लैब रिपोर्ट के लिए महीनों तक होने वाले इंतजार को खत्म किया जा सकता है।
नकली दवाओं के जाल को काटने के लिए हर नागरिक को यह समझना चाहिए कि पक्का बिल मात्र एक रसीद नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है, जो कानूनी लड़ाई और मुआवजे के लिए प्राथमिक सबूत बनता है। दवा खरीदते समय पैकेजिंग की बारीकियों जैसे धुंधली छपाई, गलत स्पेलिंग या टूटी सील पर पैनी नजर रखें। भारी छूट के लालच में न आएं। सतर्कता ही आपके स्वास्थ्य और कानूनी अधिकारों की रक्षा का एकमात्र मार्ग है।
‘टॉर्ट लॉ’ और उपभोक्ता कानूनों के तहत, नकली दवा से होने वाले शारीरिक और मानसिक नुकसान के लिए निर्माता और विक्रेता दोनों को जवाबदेह ठहराया जा सकता है। यह पीड़ित परिवारों को न केवल आर्थिक संबल देता है, बल्कि कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन के प्रति अधिक सतर्क रहने के लिए मजबूर भी करता है।
लेखक कुरुक्षेत्र विवि के विधि विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं।

