अदालत ने आम लोगों की तरह यह नहीं कहा कि नेताओं की खाल तो बड़ी मोटी होती है, तुम इतने छुई-मुई क्यों बने हुए हो। नेतागिरी के कायदे सीखो, मोटी खाल रखो, चिकने घड़े हो जाओ।
नहीं, यह ‘आज गा लो, मुस्कुरा लो, महफिलें सजा लो’ टाइप का कोई गाना-वाना नहीं है। बल्कि इस तरह की टिप्स तो आजकल हमारी अदालतें दे रही हैं। वैसे तो कहा जा रहा है कि जेन ज़ी ने ही खौफ के माहौल को तोड़ दिया है, लेकिन निडर बनने की सीख तो हमें हमारे मां-बाप भी देते रहे हैं और शिक्षक भी। यह एक सनातन सीख है। लेकिन इधर अदालतें इससे थोड़ा आगे बढ़ गई हैं और वे खासतौर से नेताओं से कह रही हैं कि डरना-वरना छोड़ो यार! हुआ यह कि इधर ममता दीदी की एक सांसद अदालत पहुंच गईं और उन्होंने गुहार लगा दी कि हुजूर, माई-बाप हमें अंडों-वंडों की मार से बचाया जाए। चुनाव हारने के बाद से ही अंडों-वंडों की तो बात ही क्या, ममता दीदी के सांसदों और विधायकों पर तो लात-घूंसे तक चल रहे हैं। खुद ममता दीदी के भतीजे अभिषेक बनर्जी तक पिट गए।
ऐसे में उन सांसद जी का डरना समझ में भी आता है। वैसे उन्हें निडर माना जाता है, फिर भी उन्होंने अदालत से गुहार लगा दी कि उन्हें अंडों-वंडों की मार से बचाया जाए। एक जमाने में ऐसे लोगों पर अंडों के साथ टमाटर भी फेंके जाते थे। पर इधर टमाटर गायब हैं। यह कहीं महंगाई की स्वीकृति तो नहीं है? देखिए महंगाई की हालत यह हो गई है जनाब कि इधर इस तरह के लोगों को जूतों की माला तक नहीं पहनाई जा रही। खैर!
अदालत ने उन्हें हौसला दिया और कहा कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने तो लाठी-गोली खाई और वे फिर भी नहीं डरे और आप अंडों-वंडों से ही डर गए। आप नेता हैं, हिम्मत रखिए और निडर होकर ऐसे हालात का सामना कीजिए। नेताओं के साथ तो यह होता ही रहता है। इससे पहले अदालत ने भाजपा के एक सांसद को इसी तरह की सीख दी थी। असल में यह सांसद महोदय ‘आप’ पार्टी से भाजपा में गए थे और सोशल मीडिया में उनके दल-बदल पर मीम-वीम कुछ ज्यादा ही बन रहे थे, सो उन्होंने अदालत से गुहार लगा दी कि हुजूर, माई-बाप इन्हें हटवाइए। लेकिन तब अदालत ने उन्हें भी वही सीख दी कि भाई, आप राजनीति में हैं तो इस तरह की चीज़ों को सहन करने की थोड़ी आदत डाल लीजिए। इतने स्पर्श-कातर मत बनिए।
हालांकि, अदालत ने आम लोगों की तरह यह नहीं कहा कि नेताओं की खाल तो बड़ी मोटी होती है, तुम इतने छुई-मुई क्यों बने हुए हो। नेतागिरी के कायदे सीखो, मोटी खाल रखो, चिकने घड़े हो जाओ। फिर न जनता के दुख-दर्द से कोई वास्ता रहेगा और न ही कोई तुमसे संवेदनशील बनने की मांग करेगा। लेकिन अदालत ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा। उसने तो बस यही इशारा किया कि आदत डाल लो।

