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कट्टर दक्षिणपंथ की तरफ खिसकती धुरी

मानवता के लिए सदा से चुनौती रही है कि तकनीकी क्रांति को काबू में कैसे रखा जाए। चाहे वह संहारक अस्त्र-शस्त्र हों। इसमें लोकतांत्रिक संस्थानों की सकारात्मक भूमिका रही। अब ऐसे दौर में जब कट्टर दक्षिणपंथी विचारधारा की लहर है,...

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मानवता के लिए सदा से चुनौती रही है कि तकनीकी क्रांति को काबू में कैसे रखा जाए। चाहे वह संहारक अस्त्र-शस्त्र हों। इसमें लोकतांत्रिक संस्थानों की सकारात्मक भूमिका रही। अब ऐसे दौर में जब कट्टर दक्षिणपंथी विचारधारा की लहर है, दुनिया कुछ तानाशाह शासकों के रहमोकरम पर है।

मनुष्य के विकास क्रम में ‘नियंत्रित आग’ की क्षमता हासिल करना शायद सबसे अहम पलों में एक था, क्योंकि एक बड़े आकार का दिमाग होने एवं जटिल गणना करने की उसकी क्षमता के लिए ईंधन के रूप में जितनी मात्रा में कैलोरी की जरूरत होती है, वह पका हुआ भोजन मिलने से संभव हुआ (इंसानी दिमाग शरीर की कुल ऊर्जा का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा खर्च करता है)। ऐसा माना जाता है कि आग ने इंसानों की भोजन हजम करने वाली क्षमता बढ़ाने में मदद की, जिसके अभाव में अन्य जीव-जंतुओं के दिमाग छोटे रह गए। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में जैविक मानव-विज्ञान के प्रोफेसर रिचर्ड रैंगहम ने इसे ‘कुकिंग हाइपोथिसिस’ का नाम दिया है। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के जिन पूर्वजों ने ‘नियंत्रणयुक्त आग’ की सामर्थ्य विकसित की, वे न केवल अपने समय के बल्कि सर्वकालिक खोजकर्ता/वैज्ञानिक गिने जाएंगे।

ऋग्वेद की सर्वप्रथम पंक्ति है ‘अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवामृत्विजम‍्, होतारं रत्नधातमम‍्’ अर्थात‍् ‘अग्नि की मैं आराधना करता हूं, वह जो ईश्वर के सम्मुख प्रज्वलित है, देवता जो देखता है सत्य को, योद्धा, और है भरपूर आनंद प्रदाता’। यह अग्नि देव का आह्वान है, जिसमें उनकी स्तुति मनुष्य और दिव्य ऊर्जा के बीच माध्यम के रूप में की गई है। ‘नियंत्रणयुक्त आग’ और पके भोजन की बदौलत इंसान की सूझबूझ खोज एवं आविष्कार करने में तरक्की करती गई। हालांकि, मध्य युग के महान वैज्ञानिकों और खोजकर्ताओं ने ज़बरदस्त तरक्की की थी, तथापि बड़ी छलांग औद्योगिक क्रांति के समय लगी, जिसके दौरान इंसानी सूझबूझ एवं आविष्कारों की एक बड़ी लहर देखी गई। इसने पूरे यूरोप में लोकतांत्रिक आंदोलनों को भी जन्म दिया। विज्ञान के साथ-साथ साहित्य भी फला-फूला।

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लोकतांत्रिक शासन और संस्थानों के विकास के कारण औद्योगिक क्रांति के परिणाम अभी भी काफी हद तक मनुष्यता के नियंत्रण में थे। ये स्वभाव से उदार थीं, जब तक कि जर्मनी, स्पेन और इटली जैसे राज्यों में तानाशाही का उदय नहीं हुआ, जिसने इन देशों की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर दिया। हालांकि, प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ज़बरदस्त जनसमर्थन के चलते लोकतंत्र कायम रहा। इस समय ने अगली बड़ी छलांग देखी— आण्विक ऊर्जा, जिसने सांस थामे बैठी दुनिया पर कहर बरपा दिया। सौभाग्य से, दुनिया में सहमति बनी और इस ऊर्जा को नियंत्रण में रखने के लिए संस्थान बनाए गए। परमाणु संपन्न शक्तियों ने संधियों पर हस्ताक्षर किए और उनपर अमल किया। अब तक तो हम कामयाब रहे हैं और इसका इस्तेमाल अधिकांशतः सकारात्मक तरीके से होता आया है। ऐसा हमारे लोकतंत्रों, उदारवादी सरकारों और संस्थानों की वजह से संभव हो पाया।

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आज जब इंसान कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और क्वांटम कंप्यूटर विकसित करने में लगा है और चूंकि ये दोनों साथ मिल रहे हैं, ऐसे में ‘सेंटिएंट’ एआई (चेतन कृत्रिम बुद्धिमत्ता) की तगड़ी संभावना है। सैद्धांतिक तौर पर यह ऐसा एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) है जो स्वयं सोच-विचार कर सके और अपने फैसले खुद ले सके। क्या हम एक बार फिर से अहम मोड़ पर हैं... क्या मनुष्य अगली ‘नियंत्रित आग’ विकसित करने ही वाला है? तकनीक के विकास के साथ-साथ मानवता के विकास के लिए सदा से चुनौती रही है कि पैदा की गई आग को ‘काबू में कैसे रखा जा सके’, क्योंकि नियंत्रण न रहने पर यह तबाही मचा देगी। चेर्नोबिल और अन्य न्यूक्लियर आपदाएं इसका एक उदाहरण है, इतने ही ‘हिरोशिमा’ और ‘नागासाकी’ पर बम गिराने जैसे कृत्य भी।

इसी प्रकार, कोविड महामारी के बारे में कई सवाल अनसुलझे हैं, तकनीक के गलत इस्तेमाल के बारे में बहुत कुछ लिखा जा सकता है, कि कैसे अपने फायदे के लिए बनाई गई तकनीक को मनुष्य जनसंहार करने का हथियार बनाने अथवा फिर दूसरों पर नियंत्रण बनाने में बदल देता है। क्योंकि जब हम इतनी आधुनिक तकनीक बना रहे हैं, तब हमें कार्ल सैगन की दी संज्ञा ‘तकनीक की किशोरावस्था’ को ध्यान में रखना चाहिए, जिसमें अपनी खासियत के अनुसार, इंसान के पास दुनिया बदलने की ज़बरदस्त ताकत तो है, लेकिन उसका इस्तेमाल समझदारी या दूरंदेशी से करने की अक्लमंदी नहीं है।

आज यह गौरतलब है कि धुरी ठेठ दक्षिणपंथ की तरफ सरक रही है, इसे अमेरिका को पुनः महान बनाओ (मागा) अभियान और यूरोप, एशिया, दक्षिण अमेरिका वगैरह में इस किस्म की राजनीतिक लहरों में देखा जा सकता है। हमारी महान तकनीकी तरक्की ऐसे वक्त में हो रही है जब राजनीति एवं सरकार में उदारवाद की जगह ठेठ दक्षिणपंथ लेता जा रहा है। उदारवादी लोकतंत्र और उदारवादी अर्थव्यवस्था की जगह अधिनायकवादी राजनीति और अर्थव्यवस्था लेती जा रही है... विश्व व्यवस्था फिर से राष्ट्रवादी राज्य की तरफ लौट रही है। इतना भऱ नहीं, 'सरकारी नियंत्रण' शासन के कहीं ज़्यादा कठोर स्वरूप की तरफ जा रहा है, जोकि अधिनायकवाद है। कोशिश यही है कि लोकतांत्रिक चुनाव का दिखावा बना रहे और व्यवस्था को अंदर से खोखला कर दिया जाए।

अधिनायकवाद और संरक्षणवाद मायावी रूप धरकर चुनी हुई सरकारों के दरवाज़े से घुस चुका है। दार्शनिक प्लेटो ने लोकतंत्र की एक बुराई की आलोचना की थी और कहा था कि धीरे-धीरे यह तानाशाही में बदल जाएगी क्योंकि शक्ति उन धूर्तोंं के पास चली जाएगी जो जनता को मूर्ख बनाने में माहिर होंगे – इसमें काफी सच्चाई है अगर हमने संस्थानों को नज़रअंदाज किया और सत्ता पर अंकुश एवं संतुलन को कमजोर कर दिया। मध्यमार्गी, उदारवादी विचारधारा को कट्टर दक्षिणपंथी लहर ने पीछे धकेल दिया है।

इस घटनाक्रम के अलावा, यूरोप, एशिया वगैरह के ज़्यादातर देशों के रक्षा बजट में बढ़ोतरी की गई है और उन्होंने लगभग तत्काल प्रभाव से हथियार खरीदने शुरू कर दिए हैं। यह बदलाव विकासशील एवं विकसित अर्थव्यवस्थाओं को विकासोन्मुख होने के बजाय फिर अधिक शस्त्रीकरण की तरफ मोड़ देता है।

इसका फ़ायदा बड़े सैन्य उद्योग प्रतिष्ठानों को मिलता है। आज की तारीख में, देशों के बजट को फिर से और ज्यादा हथियार खरीदने के हिसाब से बनाया जा रहा है, परमाणु संधियों को रद्द किया जा रहा है और आण्विक हथियारों के जखीरे को और भरा जा रहा है... यह सब एक बड़ी मुसीबत आने की ओर इशारा करता है। दुनिया भर में अलग-अलग जगहों पर युद्धों के साथ यह शुरू हो भी चुका है। इसमें एआई की आमद भी जोड़ दें तो आपके पास एक ऐसी दुनिया है जो चंद तकनीक-मठाधीशों और तानाशाह शासकों के रहमोकरम पर है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी, निशस्त्रीकरण आयोग और संयुक्त राष्ट्र के तहत कई अन्य संस्थान, परमाणु ऊर्जा विकास एवं उपयोग पर एक व्यवस्थागत नियंत्रण प्रणाली बनाने में सहायक रहे थे। संयुक्त राष्ट्र निरीक्षकों द्वारा निरीक्षण किए जाने की भी एक व्यवस्था थी। भले ही एआई अभी विकास चरण में है, लेकिन बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रही है और दीर्घकालिक असर डालने वाले बदलाव और मुश्किलें पैदा करने में सक्षम है, जिस पर अभी तक कोई व्यवस्थागत नियंत्रण नहीं है।

तुरंत जरूरत इस बात की है कि एआई के इस हमले का सामना करने के लिए राष्ट्र एकजुट हों और नियंत्रण एवं संतुलन व्यवस्था लागू करें, यदि ऐसा न कर पाए तो ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है जिसमें एआई एक ‘बेकाबू आग’ बन सकती है।

लेखक मणिपुर के राज्यपाल एवं जम्मू-कश्मीर में पुलिस महानिदेशक रहे हैं।

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