चुनौतियों से मुकाबले को बरकरार रहे आत्मबल

चुनौतियों से मुकाबले को बरकरार रहे आत्मबल

सुरेश सेठ

सुरेश सेठ

महीने के बाद महीना बीतता चला गया, जिंदगी की गाड़ी पटरी पर नहीं आयी। लगभग छह माह हो गये जब एक रहस्यमय संक्रामक वायरस ने पूरे विश्व को झकझोर दिया। हर चिन्तन, हर उम्मीद और हर लक्ष्य पर अनिश्चय के बादल मंडराने लगे। यह भ्रम टूट गया कि यहां पर अधिकतर लोग सीमित संसाधनों के कारण सीधा-सादा जीवन जीते हैं, अत: स्वस्थ हैं। यह मृत्युवाहक कोरोना का वायरस चाहे चीन के वुहान से आया हो, या उसके आसपास जीते अजब प्राणियों के असंतुलन से, वायरस बेरोकटोक फैला और अपने ज्ञान, समृद्धि और चिकित्सा शोध पर गर्व करने वाले अमेरिका, इंग्लैंड जैसे देशों को छका अपनी गिरफ्त में ले लिया।

भारत के शासक दूरदर्शिता दिखाने में पीछे नहीं हटे। त्वरित सावधानी दिखाते हुए पूरे देश में चार चरण का असाधारण सख्त लॉकडाउन लगा दिया गया। इस 135 करोड़ के अत्यधिक आबादी वाले देश में एक बारगी सब थम गया। सुबह, दोपहर, शाम के मायने बदल गये। रोग थमा नहीं। महामारी के डैने फैलते गये, उन्होंने प्रकोप का रूप धारण कर लिया। ‘जान है तो जहान है’ का सहमा हुआ मूलमंत्र आज हर घर, हर परिवार की मौन वाणी बन गया। आम आदमी की उपलब्धियों, अपनी सफलताओं पर भरोसा क्षरित होने की शुरुआत हुई। आज इस कोरोना लहर के छह महीने गुजरने लगे, वह भरोसा नहीं लौटा। दुनिया के साथ-साथ इस देश का चिकित्सा विज्ञान भी इस बीमारी की विस्तृत होती दहशत के समक्ष पंगु नजर आया।

इक्कीसवीं सदी में दूसरे ग्रहों से अपनी बस्तियां बसा लेने की महत्वाकांक्षा रखने वाले युगपुरुषों को लगा कि ‘अरे हमसे तो अपना विश्व ही सम्भाला नहीं जा रहा, हम ब्रह्माण्ड की क्या थाह लेंगे?’ पहली बार अपने विकास पर गर्व करने वाले मानव समूहों को लगा कि ‘प्रकृति मानव से कहीं बड़ी है। सदियां गुजर जायेंगी, इसका बहुत कुछ उसके लिए अचिन्हा, अलभ्य रह जायेगा।’

भारत ने सख्त लॉकडाउन में बहुत सावधानी बरती। दावा किया गया कि इसके संदेश, सामाजिक अन्तर, स्वच्छता, प्रदूषण से बचाने वाले मास्क पीपीई किट‍्स और दस्तानों के इस्तेमाल से हमने अड़तीस से चालीस हजार जानें बचा लीं। लेकिन इससे क्या दिलासा मिले? दुनियाभर के सौ से अधिक चिकित्सा शोध संस्थान निरन्तर शोध, जांच और परीक्षण में जुटे हैं लेकिन दवा कोई है नहीं। संक्रमण का टेंटुआ दबाने के लिए कोई प्रभावी टीका सामने आया नहीं। महामारी का विकट समय गुजरता गया। लाॅकडाउन के दो महीने गुजरे, जानें तो जा ही रही थीं, अब आर्थिक जहान भी आहत होने लगा। प्रकोप का सामना करने का मूल मंत्र बदला, केवल जान ही नहीं अपना आर्थिक जहान भी बचाना है। लॉकडाउन के सहमे हुए चरण अनलॉक और छूट की घोषणाओं के पांच चरणों में रूप बदलते नजर आये। लेकिन अपनी भौतिक उपलब्धियों और वैज्ञानिक एवं चिकित्सा शिखरों को विजय कर सकने का भरोसा लौटा नहीं। देखते ही देखते देश की संक्रमण दर 78 लाख से पार हो गयी। पूरी सावधानी को कवच बताने वाली घोषणाओं के बावजूद इस महामारी से काल का ग्रास बनने वालों की संख्या एक लाख से पार हो गयी।

अपनी सेहत पर नाज करने वाला पंजाब और हरियाणा भी इससे बच नहीं पाया। हरियाणा में मृत्यु दर सीमित रही तो संक्रमित मरीजों की संख्या पंजाब से ऊपर चली गयी। लेकिन उससे क्या संतोष? पंजाब की मृत्यु दर, तीन प्रतिशत, हरियाणा ही नहीं देश में सबसे ऊपर चलने लगी। न जान बचती नजर आ रही है और न आर्थिक जहान! बस प्रशासकों की अब एक ही आवाज है-तुम्हें इस महामारी के साथ रहकर जीना सीखना होगा। ‘जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं।’ अब मास्क ही तुम्हारा कवच है और सामाजिक अन्तर जिरह बख्तर।

लेकिन प्रकृति के अभेद्य सत्यों को कौन पहचान सकता है? लोग हर्ड इम्युनिटी का इंतजार कर रहे थे, उनके शरीरों में एंटीबाॅडी के विकास की खबरें आ रही थीं कि माहौल बदल गया। रोजी-रोटी का नहीं, आर्थिक विकास का नहीं, आंकड़ों ने रुख बदलकर बताया, ‘महामारी थक रही है।’ संक्रमण के आंकड़े कम होने लगे। मृत्यु दर घटकर 1.5 प्रतिशत तक आ गयी, रिकवरी दर नब्बे प्रतिशत से ऊपर हो गयी। चौकस प्रशासक सचेत करते हैं, ऐसा सामाजिक अन्तर न छोड़ना, मास्क ही कवच है, क्योंकि सटीक दवा अभी कोसों दूर है।’

उत्सव-त्योहार का महीना है, मना लो इसे, मांग बढ़ाने के लिए सरकार ने आर्थिक तोहफे भी बांट दिये, लेकिन याद रखना जब उत्सव जायेंगे, कंपा देने की दूसरी लहर आ सकती है। इस वर्ष खेतों में लोग अधिक पराली जला रहे हैं। ‘सफर’ मापक कहता है कि पिछले वर्ष दिल्ली में इसने चालीस प्रतिशत वायु प्रदूषण की घटनायें कर दीं। इसे रोकिये, क्योंकि इस वर्ष इससे जितना अधिक प्रदूषण होगा, उतनी ही कोरोना के संक्रमण की लहर गंभीर होगी। खैर, इन सत्यों को कौन नकार सकता है? देश को सावधानी हटी-दुर्घटना घटी का स्मरण करते हुए घटते हुए कोरोना संक्रमण को लौटने नहीं देना है। लेकिन नयी प्रतिबद्धता अपनाने के इस माहौल में न भूलिये कि प्रशासकीय अन्यमनस्कता, भ्रष्टाचारी और अराजक तत्वों द्वारा मौके का लाभ उठाकर खुलकर खेलने के प्रयास के बावजूद देश का आम इनसान हारा नहीं।

इस दहशत भरे माहौल में भी इसके जीवट, उसकी जिजीविषा, उसके परिश्रम ने उसका दामन नहीं छोड़ा। औषधि रहित महामारी से मन्दी का संकट पैदा हो गया। लेकिन कृषक भारत के धरती पुत्र इस परीक्षा में खरे उतरे। उनके खेतों में फसलें और भी खुल कर मुस्करायीं। पहले गेहूं और फिर धान से उन्होंने राज्य के ओसारे भर दिये। नहीं तो सोचिये अगर महामारी के साथ अन्न संकट का ताण्डव होने लगता, तो जन समुदाय कैसे त्राहिमाम करता?

स्कूल-कॉलेज बन्द होने से ऑनलाइन शिक्षा ने सिर उठा लिया। युवा पीढ़ी का अकादमिक वर्ष नष्ट नहीं होने देना है। अब शिक्षालयों के द्वार खोलने का प्रयास है। स्पष्ट है अभी सब आधा-अधूरा है। ऑनलाइन शिक्षा से लेकर कक्षागत पढ़ाई और परीक्षायें अभी मात्र सुगबुगायेंगी, धीरे-धीरे जीवित हो जायेंगी, भरोसा रहे। कम से कम इतना संतोष तो कर लें कि इन्हें निर्रथक नहीं होने दिया गया। इन छह महीनों में निष्ठा और आस्था के प्रतीक देवालयों के कपाट बन्द रहे, अब धीरे-धीरे खुल रहे हैं। लेकिन गुजरता वक्त साफ बता रहा है कि लोगों ने अपने आत्मबल से इस विकट समय को पार कर लिया। आत्मबल की निष्ठा से उनके अन्तस में देवालयों का निर्माण होने लगा।

कोरोना का यह विकट समय गुजर ही जायेगा, लेकिन जिजीविषा का जो साक्षात्कार इस बीच आम आदमी ने किया है, उसे बने रहना है। अन्तस में अगर देवालयों का स्पर्श हो गया है तो उसे सार्थक करना है।

लेखक साहित्यकार एवं पत्रकार हैं।

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