वायु प्रदूषण की आपदा के लिए तंत्र की गलत नीतियां जिम्मेदार हैं। राज्यों में धान की कटाई के बाद मिलने वाली अल्प अवधि में पराली को खेतों में बंडल बनाकर दूर-दराज स्थित उद्योगों में निपटान करने वाला सरकारी प्रयास तकनीकी तौर पर अव्यावहारिक, महंगा और पर्यावरण हितैषी भी नहीं है।
दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या पर सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर, 2024 को कहा कि पड़ोसी राज्यों के किसानों को पराली जलाने के लिए मुक़दमे से पूरी तरह से छूट नहीं मिल सकती। कोर्ट ने सुझाव दिया कि वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग उल्लंघनकर्ताओं को जवाबदेह ठहराने के लिए दंडात्मक प्रावधान लागू करे। न्यायालय ने राज्यों और अन्य संबंधित अधिकारियों को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 15 के अंतर्गत आने वाले सभी उल्लंघनों के अनुसार जुर्माना वसूलने के निर्देश भी दिए।
केंद्र सरकार ने नए नियमों के तहत फसल अवशेष जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए जुर्माने की राशि खेत के आकार के आधार पर तय की है। वहीं समय पर जुर्माना न भरने पर इसे भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूला जा सकता है। इसके साथ ही, पराली जलाने से जुड़े खेतों को 15 महीने के लिए ‘रेड कैटेगरी’ में रखने जैसे प्रावधानों का मसौदा तैयार किया है। इसके तहत जमीन के रिकॉर्ड में ‘रेड एंट्री’ दर्ज होने से संबंधित किसान को फसल बेचने के साथ ऋण लेने और जमीन को बंधक रखने संबंधी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है और जुर्माने का प्रावधान भी है। इस मामले में बिना वैज्ञानिक तथ्यों को जाने और पराली प्रबंधन हेतु बिना व्यावहारिक विकल्प सुझाए किसानों पर दंडात्मक कार्रवाई करना सही नहीं है।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के राज्यों में वायु प्रदूषण की समस्या के प्रमुख कारणों में वाहनों का उत्सर्जन, औद्योगिक प्रदूषण, निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल और पराली दहन आदि को जिम्मेदार माना जाता है। दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक हर महीने बदलता रहता है। वायु प्रदूषण मानव निर्मित कारणों के अतिरिक्त मौसम और मानसून वर्षा चक्र जैसे अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है। अक्तूबर महीने में मानसून की वापसी के साथ हवाओं के उत्तर में हिमालय पर्वत की दिशा से दक्षिण की ओर बहने से मौसम में ठंडक बढ़ने लगती है और वायु गति में भारी कमी दर्ज होती है। आमतौर पर दिल्ली की हवा मानसून की वर्षा के महीनों (जून-सितंबर) में स्वच्छ होती है, जबकि सर्दियों के महीनों (अक्तूबर-मार्च) में प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। तब तापमान गिरने से धूल के कण पृथ्वी की निचली सतह के पर्यावरण में जम जाते हैं।
वैज्ञानिक तथ्यों के अनुसार सबसे ज़्यादा प्रदूषण नवंबर-मार्च के सर्द मौसम में होता है, जबकि धान की फसल की कटाई अक्तूबर तक होकर नवंबर में गेहूं की बुआई लगभग पूरी हो जाती है। इसलिए केवल किसान को वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराना तथ्यों के विपरीत है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, वायु प्रदूषण में फसल अवशेष जलाने की हिस्सेदारी सर्द मौसम के शुरुआती अक्तूबर महीने में 25 प्रतिशत तक पहुंच जाती है, जबकि अन्य महीनों में यह हिस्सेदारी बहुत कम, नाममात्र रह जाती है। लेकिन देश का प्रशासनिक तंत्र वायु प्रदूषण के मुख्य कारणों—वाहनों का उत्सर्जन, औद्योगिक प्रदूषण, निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल आदि—को रोकने में अपनी नाकामी को छिपाने के लिए वायु प्रदूषण का ठीकरा किसानों के सिर फोड़ता है।
उल्लेखनीय है कि पराली दहन उत्तर-पश्चिम भारत में वायु प्रदूषण का एक कारण है, जो मिट्टी की उर्वरता और मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। ये प्रदूषक धुंध की मोटी परत बनाते हैं, जो सूर्य की रोशनी को रोकती है और स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करती है।
निस्संदेह, वायु प्रदूषण की आपदा के लिए तंत्र की गलत नीतियां जिम्मेदार हैं। इन राज्यों में धान की कटाई के बाद मिलने वाली अल्प अवधि में पराली को खेतों में बंडल बनाकर दूर-दराज स्थित उद्योगों में निपटान करने वाला सरकारी प्रयास तकनीकी तौर पर अव्यावहारिक, महंगा और पर्यावरण हितैषी भी नहीं है।
इन नाकामियों के बावजूद, कृषि अवशेष जलाने की रोकथाम की दिशा में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग द्वारा भारी-भरकम मशीन वाले विकसित ढांचे ‘एक्स-सीटू’ पराली प्रबंधन के लिए कुशल और मजबूत आपूर्ति शृंखला सुनिश्चित करने के लिए राज्यों को हर साल सलाह जारी की जा रही है। ‘एक्स-सीटू’ पराली प्रबंधन में इस्तेमाल होने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों की करोड़ों रुपये मूल्य की मशीनों की सरकारी सब्सिडी पर बिक्री ही तंत्र का मुख्य उद्देश्य है। बिना सरकारी सब्सिडी वाले और किसान हितैषी समाधान के रूप में हरियाणा वायु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सरकार द्वारा 16 अगस्त, 2018 को वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम के तहत कंबाइन हार्वेस्टर के लिए स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम को अनिवार्य करने वाले आदेश को कंबाइन हार्वेस्टर मालिकों के दबाव के कारण पिछले 8 वर्षों से लागू ही नहीं किया गया है।
पराली निपटान का पर्यावरण हितैषी समाधान इसे खेत में ही समाविष्ट करके जैविक खाद बनाना है। साथ ही, धान की कटाई के बाद प्रति एकड़ 30 किलो यूरिया छिड़ककर और मोल्ड बोर्ड हल या हैरो से पराली को मिट्टी की गहरी परतों में दबाने से यह 45 दिनों में जैविक खाद में बदल जाती है। दरअसल, इससे पराली में मौजूद नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटेशियम संरक्षित होते हैं, जिससे अगली फसल की पैदावार में वृद्धि और मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है। इसके लिए सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम से लैस कंबाइन हार्वेस्टर ज़रूरी हैं, जो पराली को छोटे टुकड़ों में काटकर खेत में फैलाते हैं। सरकार को किसानों के हित में प्रोत्साहन और संसाधन प्रदान करने चाहिए।

