गांव को हॉटस्पॉट बनने से बचाइए

गांव को हॉटस्पॉट बनने से बचाइए

आर. कुमार

आर. कुमार

कुछ महीने पहले तक, जब कोविड-19 दुनिया में अन्य जगहों पर कहर बरपा रहा था तो भारतीयों को लगने लगा था कि वायरस उनको बख्श कर विदेशों की ओर हो लिया है। अफसोस कि कोविड-19 ने इस बार मानो कसर निकालने वाली वापसी की है। नित दिन संक्रमित और मौतों की संख्या पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ रही है। सूची में भारत पहले ही ब्राजील को पछाड़कर विश्वभर में अमेरिका के बाद दूसरे पायदान पर पहुंच चुका है। रोजाना लगभग 3 लाख से ज्यादा पॉजिटिव मामले सामने आ रहे हैं। स्थिति इसलिए बिगड़ रही है क्योंकि दूसरी लहर में अब बच्चे और युवा भी संक्रमित हो रहे हैं और उनमें वायरस के लक्षण अधिकांशतः सौम्य नहीं हैं।

वर्ष 1919 में आई स्पैनिश फ्लू महामारी से मिले सबक से यह सबको पता है कि किसी महामारी में आने वाली दूसरी-तीसरी लहर पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा घातक होती है। जैसे-जैसे दूसरी लहर के साथ मानवीय जानें ज्यादा जाने लगी हैं वैसे-वैसे भारतीय शहरों में स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं की भारी कमी होने होने लगी है–ऑक्सीजन, दवाएं, बिस्तर, वेंटिलेटर, वैक्सीन, यहां तक कि श्मशान घाट में दाह संस्कार की जगह भी। डॉक्टर और अन्य कोविड योद्धा भी मरने लगे हैं या नौकरी छोड़ने की सोच रहे हैं, वे पहले ही लंबी लड़ाई से थककर चूर हैं, हताश हैं, कई तो भड़की भीड़ के हाथों बेइज्जती या मार तक झेल चुके हैं। भारत का शहरी स्वास्थ्य तंत्र तो पहले ही कोविड के भार से चरमराया पड़ा है, जबकि ग्रामीण सेवाएं की जरूरतें सिरे से नजरअंदाज़ हैं। मीडिया और राजनेता महानगरीय अस्पतालों में बिस्तरों की कमी को लेकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप में उलझे पड़े हैं। किसी एक ने ग्रामीण भारत में आसन्न कयामत को लेकर बयान तक नहीं दिया, जहां स्वास्थ्य सेवा ढांचा लगभग नगण्य है। ग्रामीण अंचल में प्रति 10000 व्यक्तियों पर अस्पताल बिस्तर उपलब्धि की औसत केवल 2-3 ही है। इसके अलावा जितने अस्पताल हैं भी, उनमें प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, आईसीयू, विशेषज्ञ डॉक्टर, अतिरिक्त देखभाल संस्थान या अत्याधुनिक एम्बुलेंस नदारद हैं। गांवों में व्याप्त अज्ञानता और गरीबी के चलते वहां आज भी लोगों का जमावड़ा लगना आम बात है, चाहे यह कोई धार्मिक सभा-उत्सव हो या चुनाव या धरने-प्रदर्शन। लांसेट संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में जून के पहले हफ्ते में कोविड की वजह से मौतों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि देखने को मिलेगी, भले ही इस बीच मृत्यु दर 1.3 से घटकर 0.87 होगी। भारत के ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा तंत्र और जागरूकता में निवेश करने की जरूरत फौरी और अति आवश्यक है। वैक्सीन अभियान को अब ग्रामीण अंचल पर केंद्रित करना होगा।

हाल-फिलहाल भारत की लगभग 9 प्रतिशत जनसंख्या को वैक्सीन की पहली या दोनों खुराकें लग पाई हैं। सरकार ने 1 मई से 18 साल से ऊपर वालों को भी वैक्सीन लगवाने की इजाजत दे दी है। तथापि भारतीय वैक्सीन निर्माता (कोवैक्सीन और कोविशील्ड) की उत्पादन क्षमता 70-80 लाख टीके प्रति माह है। यदि इसकी 100 प्रतिशत आपूर्ति केवल देश में ही इस्तेमाल की जाए, तब भी रोजाना 50 लाख टीके लगाने के ध्येय के मुताबिक कुल मासिक उपलब्धि आधी रहेगी। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना हैः ‘सरकार को वैक्सीन निर्माताओं को अनिवार्य लाइसेंस, धन और अन्य सहायता उपलब्ध करवाकर उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी करने में मदद करनी चाहिए।’ केंद्र सरकार ने आपातकालीन उपायों के तहत उन वैक्सीनों को मंजूरी दे दी है, जिन्हें विश्व के अन्य देशों में प्रभावशीलता, सुरक्षा और अन्य मानकों पर नियामकों की हरी झंडी मिल चुकी है। इनमें रूस की स्पूतनिक 5, फाइज़र-बायोटेक, मॉडर्ना और जॉनसन एंड जॉनसन के नाम शामिल हैं। भले ही वैक्सीन स्वीकार्यता में बढ़ोतरी हुई है, फिर भी अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कर्मियों में पहले चरण में केवल 37 प्रतिशत को ही टीका लग पाया है और इनमें भी दूसरे चरण के योग्य पात्रों में 57 फीसदी को दूसरी खुराक अभी लगनी है। कोविड-19 की वैक्सीन को लेकर फैली विभिन्न भ्रांतियों की वजह से लोगों में टीका लगवाने को लेकर बनी असमंजसता और डर की वजह से स्थिति और बिगड़ी है।

वायरस के रूपांतरों की समय रहते शिनाख्त करने के लिए जीनोम सीक्वेंसिंग करने में तेजी लानी होगी। जहां कहीं भी कोविड केस हों, हमें तुरंत परीक्षण और संपर्क में आए सभी लोगों की त्वरित ट्रेसिंग करके कोविड पॉजिटिव मिले लोगों को एकांत में रखना होगा। संयुक्त रणनीति के तहत टीका अभियान चलाने और संक्रमण की कड़ी तोड़ने की जरूरत है। ग्रामीण भारत में, बहते पानी की कमी की वजह से हाथ होने जैसे मामूली रोकथाम उपाय भी एक चुनौती की तरह हैं। तिस पर ‘दो गज की दूरी... मास्क है जरूरी’ की पालना तो सिरे से नदारद है।

सरकार को यदि आसन्न प्रलयंकारी स्थिति बनने से रोकनी है तो ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की दशा को वरीयता से तत्काल उपाय करने होंगे। इसमें कोविड संबंधित ही नहीं, अन्य संबंधी स्वास्थ्य सेवाएं भी शामिल हैं। लांसेट संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय भाषा में कहें तो भारत को सितम्बर, 2021 तक कोविड आपदा की वजह से 7.8 खरब डॉलर से ज्यादा परीक्षण (टेस्टिंग) पर तो 1.8 खरब डॉलर स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं पर खर्च करने पड़ेंगे।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने चेतावनी दी है कि कोरोना का अगला हॉटस्पॉट ग्रामीण भारत अंचल हो सकता है और उन्होंने समय रहते प्राथमिक स्वास्थ्य तंत्र को सुदृढ़ और विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है। भारत का ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा ढांचा कोविड-19 संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए पर्याप्त और तैयार नहीं है, खासकर उत्तर भारत के ज्यादा जनसंख्या घनत्व वाले सूबों में, क्योंकि वहां पहले ही डॉक्टरों, अस्पताल, बिस्तर और उपकरणों की कमी है। यहां तक कि गांवों में जागरूकता बनाने और टीकाकरण के लिए सुविधा जुटाने की भी कमी है।

परीक्षण सुविधाओं में कमी, कमजोर जांच व्यवस्था और सबसे ऊपर निम्नस्तरीय स्वास्थ्य सेवा ने कोविड महामारी से बनी चुनौती को विकराल कर डाला है। ग्रामीण अंचलों से लोगों को बीमारी का विशेषज्ञ इलाज पाने के लिए लंबा सफर और काफी पैसा खर्च करके शहरों का रुख करना पड़ता है। तकनीक यहां हमारी कुछ मदद कर सकती है। ई-संजीवनी नामक बाह्य रोगी विभाग व्यवस्था के जरिए ग्रामीण क्षेत्र के डॉक्टर भी अपने शहरी समकक्षों से विशेषज्ञ सलाह पा सकते हैं। कोविड संक्रमित व्यक्ति की ट्रेसिंग और निगरानी वाली एप्लीकेशन की मदद से किसी व्यक्ति का अथवा सरकार द्वारा डाटा इकट्ठा कर सावधानी-संहिता का पालन करवा फैलाव को नियंत्रित किया जा सकता है। ग्रामीण अंचलों में इस प्रकार की सूचनाएं मुहैया करवाना और आवंटन करना एक चुनौती हुआ करता था, जिसे अब मोबाइल फोन और विभिन्न एप्लीकेशंस के माध्यम से पार पाना आसान हो गया है। हजारों लोगों को एक साथ वीडियो स्ट्रीमिंग के माध्यम से प्रशिक्षित किया जा सकता है। यह सब इस बात पर निर्भर है कि उपलब्ध तकनीक का सर्वोत्कृष्ट लाभ कैसे लिया जाए।

लेखक सोसायटी फॉर प्रोमोशन ऑफ एथीकल एंड एफोर्डेबल हेल्थकेयर के अध्यक्ष हैं।

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