तिरछी नज़र

कहे दिल की लगी, कुर्सी न हुई सगी

कहे दिल की लगी, कुर्सी न हुई सगी

सहीराम

इधर श्रीलंका के प्रधानमंत्री भागने के चक्कर में हैं और उधर फिलीपींस से भागे हुए पूर्व राष्ट्रपति मार्कोस के पुत्र मार्कोस जूनियर वापस लौट रहे हैं। वो उस्ताद ज़ौक़ ने कहा था न कि न अपनी मर्जी आए थे, न अपनी मर्जी से जा रहे हैं। यह कुछ-कुछ वैसा ही मामला है जनाब। जनता भगा रही है तो भाग रहे हैं और जनता वापस ला रही है तो आ रहे हैं। श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को जनता भगा तो रही है, पर वे भाग नहीं पा रहे। त्रिकोमाली के नौसैनिक अड्डे में छुपे बैठे हैं। जी हां, यह वही त्रिकोमाली है, जहां से उन्होंने तमिल टाइगर्स को भगाया था। अब खुद वहां छुपे हैं और भागने के चक्कर में हैं। जैसे अपने यहां इन दिनों हिंदू-मुसलमान खूब चल रहा है न, वैसे ही श्रीलंका में भी राजपक्षे परिवार ने तमिल-सिंहली खूब चलाया था। ऐसे मुद्दे जब चलते हैं तो खूब चलते हैं खोटे सिक्के की तरह। सिंहली राष्ट्रवाद चलाकर राजपक्षे परिवार ने बरसों तक खूब राज भोगा। एक भाई राष्ट्रपति तो एक भाई प्रधानमंत्री। उनके और भी दो भाई हैं और वे भी बड़े पदों पर हैं। राजपक्षे परिवार का राज तो चलता रहा, पर श्रीलंका डूबता रहा। वह कर्ज में डूबा, वह तबाही में डूबा, वह बर्बादी में डूबा। लेकिन अब जब श्रीलंका की जनता खड़ी हुई तो राजपक्षे परिवार का राज डूब रहा है। वो फैज साहब ने कहा था न कि वह वक्त करीब आ पहुंचा है, जब तख्त गिराए जाएंगे, जब ताज उछाले जाएंगे। श्रीलंका में साक्षात हो रहा है। देख लो।

तो इधर जब श्रीलंका का प्रधानमंत्री भागने के चक्कर में है,तब मार्कोस पुत्र की वापसी हो रही है। यह वापसी वैसे नहीं हो रही है जैसे अफगानिस्तान में कम्युनिस्ट नजीबुल्ला को हटाने और मारने के बाद वहां के बादशाह को लाने की कोशिश हुई थी या रूस में कम्युनिस्ट शासन के खात्मे के बाद जार के वशंजों को लाने की कोशिश हुई थी। मार्कोस पुत्र को तो जनता ही ला रही है, जिसने उसके बाप को भगाया था। अपने यहां पाकिस्तान में नवाज शरीफ ऐसे ही लौटे थे और ऐसे ही कभी बेनजीर भी लौटी थी। खैर, पाकिस्तान में नवाज शरीफ परिवार फिर लौट आया है और इस बार कमान छोटे भाई के हाथ में है। इमरान खान छाती पीट रहे हैं कि उन्हें विदेशी ताकतों ने हटा दिया। अरे भाई, तुझे पाकिस्तानी फौज नजर नहीं आती, जो सालों से पाकिस्तान में कठपुतली का तमाशा दिखा रही है-यह लो, देखो लोकतंत्र का खेल। जनता जब लोकतंत्र से ऊबने लगती है तो जनरल साहब खुद बूट-वूट कसकर चले आते हैं-अगला तमाशा शुरू होने तक शांत रहो बच्चो। तो जी, कोई भाग रहा है, कोई वापस आ रहा है। सबक यही है कि सत्ता महाठगिनी हम जानी। कुर्सी किसी की सगी नहीं। वैसे भी कहा तो है ही न कि दुनिया आनी-जानी है। सत्ता भी!

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