Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

भारतीय आत्मनिर्भरता की आकांक्षा में रूस की अहम भूमिका

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा से दोनों देशों में संबंध बेहतर हुए। इस दौरान रणनीतिक साझेदारी पर ज़ोर दिया। हालांकि इस मामले में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देना जरूरी है। रक्षा क्षेत्र में सह-उत्पादन से सर्वाधिक फ़ायदा उठाने के...

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा से दोनों देशों में संबंध बेहतर हुए। इस दौरान रणनीतिक साझेदारी पर ज़ोर दिया। हालांकि इस मामले में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देना जरूरी है। रक्षा क्षेत्र में सह-उत्पादन से सर्वाधिक फ़ायदा उठाने के लिए भारत को रूस के साथ साझेदारी नये सिरे से उन्मुख करने की जरूरत है। हालांकि इस राह में चुनौतियां भी कम नहीं।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का नई दिल्ली का दो दिवसीय दौरा 2022 में यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद भारत की उनकी पहली यात्रा थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेजबानी में हुए इस शिखर सम्मेलन में दोनों देशों के बीच टिकाऊ रणनीतिक साझेदारी पर ज़ोर दिया गया, जिसे दशकों चले शीत युद्ध-काल के सहयोग के दौरान विकसित किया गया था।

इस यात्रा ने काफ़ी वैश्विक रुचि पैदा की, क्योंकि अमेरिका और यूरोपीय संघ की कोशिश रही है कि यूक्रेन के विरुद्ध युद्ध को लेकर रूसी राष्ट्रपति को 'अलग-थलग' किया जाए। अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने तो यूक्रेन में युद्ध अपराधों के संबंध में पुतिन की गिरफ्तारी का वारंट तक जारी कर रखा है। इसलिए,उनकी अगवानी पारंपरिक शिखर सम्मेलन की भव्यता और संबंधित प्रोटोकॉल के साथ करने के भारतीय निर्णय का अपना रणनीतिक महत्व रहा।

Advertisement

मोदी ने हवाई अड्डे पर रूसी नेता का स्वागत ट्रेडमार्क बन चुके गले लगाने के अपने अंदाज़ में किया, जोकि दोनों नेताओं के बीच संबंध को रेखांकित करता है। यह यात्रा भारत पर रूसी तेल आयात और रक्षा खरीद पर अंकुश लगाने के लिए बढ़ते अमेरिकी दबावों के बीच हुई; दोनों पक्षों ने इस बात की पुष्टि की कि उनके संबंध ‘बाहरी दबाव के परिप्रेक्ष्य में लचीले’ हैं।

Advertisement

1960 के दशक के मध्य से रूस रिवायती तौर पर भारत को सैन्य उपकरण और प्रमुख युद्धक सामग्री (टैंक, जहाज, विमान) का आपूर्तिकर्ता रहा है, लेकिन यात्रा से पूर्व जताई गई उम्मीदों और अटकलों के विपरीत, पुतिन की यात्रा के दौरान कोई बड़ा रक्षा सौदा घोषित नहीं हुआ। संयुक्त बयान में संदर्भ अपेक्षाकृत सामान्य था और इसमें कहा गया था कि सैन्य और सैन्य-तकनीकी सहयोग पारंपरिक रूप से भारत और रूस के बीच विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी का एक स्तंभ रहा है। आगे कहा गया: ‘भारत की आत्मनिर्भरता अभियान के जवाब में,साझेदारी वर्तमान में उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी और प्रणालियों के संयुक्त अनुसंधान एवं विकास, सह-विकास और सह-उत्पादन की ओर फिर से उन्मुख हो रही है’।

ज्यादा ज़ोर भारत में मेक इन इंडिया प्रोग्राम के तहत प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के माध्यम से रूसी मूल के हथियारों और रक्षा उपकरणों के रखरखाव के लिए स्पेयर पार्ट्स, घटकों, संलग्न एवं अन्य उत्पादों के भारत में संयुक्त निर्माण पर दिया गया; भारतीय सशस्त्र बलों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए संयुक्त उद्यम स्थापित करना; और आगे चलकर परस्पर मित्र तीसरे राष्ट्रों को निर्यात की तैयारी करना।

मोदी-पुतिन शिखर सम्मेलन ने भारत-रूस रक्षा संबंधों में एक संभावित रणनीतिक बदलाव का संकेत दिया, जो पारंपरिक खरीदार-विक्रेता गतिशीलता से आगे बढ़कर प्रगाढ़ सहयोग की तरफ बढ़ रहा है। यह रक्षा उत्पादन में भारत की आत्मनिर्भरता पहल के अनुरूप है, जिसका मकसद आयात पर निर्भरता को और कम करना है – रूस की हिस्सेदारी 2010-15 के बीच 72 प्रतिशत के उच्च स्तर से घटकर 2020-24 में 36 फीसदी रह गई।

यह सबक लेने लायक है कि 1960 के दशक के मध्य में सोवियत संघ से काफी सैन्य साजो-सामान (पहला मिग फाइटर एयरक्राफ्ट, पेट्या/कमोर्टा-क्लास नौसैन्य पोत और टैंक)हासिल करने के बावजूद, भारत कभी भी अपने करीबी सहयोगी से कोई डिज़ाइन संबंधी जानकारी हासिल नहीं कर पाया। इस प्रकार, सोवियत/रूसी मूल के अधिकांश उपकरण जो कहने को तो भारत में 'निर्मित' किए गए थे, उनमें भी मुख्य रूप से काम आयातित किट/पुर्जों को असेंबल करने का ही था। इसका मतलब था कि चाहे वह गोला-बारूद फैक्ट्रियां हों या हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, मुख्य गतिविधि पुर्जों को जोड़ना भर था और रिवर्स-इंजीनियरिंग करने या स्वदेशी डिज़ाइन पर काम करने का बहुत कम या कोई प्रयास नहीं किया गया। डिज़ाइन के क्षेत्र में प्रवेश करने की यह अक्षमता/अनिच्छा चीनी उदाहरण के बिल्कुल विपरीत है।

सोवियत-युग के सैन्य उपकरणों की चीन की सबसे सफल रिवर्स-इंजीनियरिंग उपलब्धि एसयू-27 'फ्लैंकर' की नकल कर शेनयांग जे-11 फाइटर जेट परिवार का विकास करना है। पीएलए वायु सेना ने शुरू में 1990 के दशक में लाइसेंस प्राप्त उत्पादन समझौते के तहत रूस से एसयू-27 एसके फाइटर जेट खरीदे, और रूसी-आपूर्ति वाली किट का उपयोग करके उन्हें जे-11ए के रूप में असेंबल किया। हालांकि, 2000 के दशक के मध्य तक, चीन विमान की रिवर्स-इंजीनियरिंग करने में सफल रहा - प्रमुख घटकों को बाहर निकालकर, उनका विश्लेषण और नकल करके - बिना किसी और रूसी भागीदारी के पूरी तरह स्वदेशी जे-11बी संस्करण का उत्पादन कर लिया। इसमें एयरफ्रेम, एवियोनिक्स, राडार सिस्टम और प्रोपल्शन की नकल करना, फिर डब्ल्यूएस-10 टर्बोफैन इंजन (रूसी एएल-31एफ की रिवर्स-इंजी.), एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐर्रे (एईएसए) राडार और घरेलू स्तर पर उत्पादित हथियार प्रणालियां जैसे कि चीनी अपग्रेड को एकीकृत करना शामिल था।

एसयू-27 खुद सोवियत संघ में बना था (1970 के दशक में डिज़ाइन किया गया, 1985 में सेवा में आया), जिससे जे-11 सोवियत तकनीक का सीधा रूपांतरण बन गया। इस डिज़ाइन सफलता ने चीन को अपनी आयात निर्भरता कम करने, आत्मनिर्भरता हासिल करने और फिर इस फाइटर का निर्यात करने के काबिल बनाया, जिसका एक प्रमुख खरीदार पाकिस्तान है। वहीं, भारत ने अपना पहला सुखोई, एसयू-30, 1997 में खरीदा, लेकिन मौजूदा राष्ट्रीय पारिस्थितिकी तंत्र संकोची रहा और आयात निर्भरता जारी रही, जिसमें फ्रांसीसी लड़ाकू विमान (राफेल) एक वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरा। पुतिन की यात्रा में पांचवीं पीढ़ी के एसयू-57 फाइटर जेट में फिर से दिलचस्पी देखी गई, जिसमें भारत ‘सोर्स कोड एक्सेस’ और ‘स्टेल्थ एन्हांसमेंट’ तकनीक हस्तांतरण की मांग कर रहा है। क्या यह बतौर संभावित अधिग्रहण स्वदेशी तेजस का पूरक बनेगा, यह बहस का मुद्दा बना हुआ है।

इससे इनकार नहीं कर सकते कि रूस (सोवियत युग के दौरान और उसके बाद भी) ने भारत को कुछ खास क्षेत्रों में अमूल्य तकनीकी सहायता प्रदान की है जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है - मिसाइलें और पानी के नीचे परमाणु चलित पनडुब्बी (आईएनएस अरिहंत) इसकी मिसाल हैं। संयुक्त उद्यम ब्रह्मोस मिसाइल एक सफलता गाथा है, और इस यात्रा में इस मिसाइल के हल्के वेरिएंट को सहयोग के संभावित क्षेत्र के रूप में सूचीबद्ध किया गया। अहम सैन्य उपकरणों का डिज़ाइन ज्ञान किसी राष्ट्र के लिए गौरवपूर्ण है और ऐसा ज्ञान बाजार से आसानी से नहीं खरीदा जा सकता। सोवियत संघ/रूस, जिससे भारत के मजबूत सैन्य आपूर्तिकर्ता संबंध रहे हैं, उसने भी डिज़ाइन ज्ञान साझा नहीं किया है।

पुतिन की यात्रा के परिणाम बढ़िया हो सकते हैं बशर्ते भारत आत्मनिर्भरता को उत्साह और दृढ़ संकल्प के साथ प्राथमिकता दे पाए और रूस के साथ साझेदारी की ओर फिर से उन्मुख होकर चुनिंदा उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों के संयुक्त अनुसंधान एवं विकास, सह-विकास और सह-उत्पादन की पूरी क्षमता का अहसास कर पाए। लेकिन यह कठिन यात्रा होगी और इसके लिए भारतीय पारिस्थितिकी तंत्र में निहित बाधाओं को दूर करना होगा होगा। हालांकि रूस के लिए भी कुछ लाल लकीरें हैं, कि भारत के साथ सैन्य सहयोग कितना प्रगाढ़ रखा जाए और इस बाबत रूस चीन की चिंता कैसे दूर करेगा। इसी प्रकार, भारत को रूस के साथ जुड़ाव को लेकर अमेरिका के कड़े नियमों को ध्यान में रखना होगा।

पुतिन की यात्रा ने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत किया है, लेकिन दोनों देशों के लिए नई चुनौतियां उभर रही हैं।

लेखक रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं।

Advertisement
×