अस्तित्व की जंग में किसानों का प्रतिकार

अस्तित्व की जंग में किसानों का प्रतिकार

गुरबचन जगत

गुरबचन जगत

वर्ष 1960 के दशक की शुरुआत में मैंने पंजाब के पैतृक गांव में दो साल बिताए। इस दौरान दो गर्मियां व दो सर्दियां देखी थीं, वह भी बिजली और जरूरी सहूलियतों के बगैर। गर्मियों में आम कृषक की दिनचर्या भोर से पहले अमूमन 3 बजे शुरू होती थी। अलसुबह बैलों के गले में बंधी घंटियों की आवाजें सुनाई देती थीं, जब वे कंधों पर हल उठाए किसान के साथ खेतों की ओर निकलते थे, ताकि सूर्य के ताप से पहले काम निपट सके। बैलों के जरिए एक दिन में बमुश्किल एकड़ भर रकबा ही जोता अथवा सींचा जा सकता था, वह भी जब अपना कुआं-रहट होने का सौभाग्य हो, वरना तो बीज डालो और बारिश की आस में आसमान तकते रहो। यहां बताना मौजूं होगा कि उस वक्त परंपरागत खेती थी और रासायनिक खाद, कीटनाशक और अन्य ऊपरी खर्चे नहीं थे। हल से खेत जोतने के अलावा पशुओं के चारे का इंतजाम करना होता था, चराने ले जाना पड़ता था, पीने का पानी कुओं से ढोया जाता था। जिंदगी बहुत कठिन किंतु सरल थी, जहां खुशी-गम सारे गांव के साझा थे। पैसे का टोटा था और विलासिता का नाम तक पता नहीं था। रोजमर्रा की जरूरतें ‘वस्तु के बदले वस्तु’ ले-देकर पूरी होती थीं। पूरा गांव एक बड़ा परिवार था। लेकिन समय के साथ विज्ञान व लालच जैसे इस शांतिमय संतुलन को बदलने की साजिश में लगे थे।

तब भारत में खाद्यान्न की भारी कमी थी, इसलिए अन्न का आयात करना पड़ता था, जो इस गरीब देश को बहुत भारी पड़ता था। केंद्र व राज्य सरकारों ने परिवर्तनकारी कदम उठाये, नयी कृषि तकनीकें आईं। पुरजोर प्रयासों से पंजाब-हरियाणा ‘हरित क्रांति’ के रूप में फलीभूत हुए। आधुनिक खेती से किसानों को रूबरू करते हुए नये किस्म के बीज-खाद-कीटनाशकों का आगमन हुआ, नलकूप एवं नहरी सिंचाई प्रणाली सुधरी। क्षेत्र के प्रयोगधर्मी व मेहनतकश किसानों ने प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के नारे ‘जय जवान-जय किसान’ से प्रेरित होकर देश से भुखमरी मिटाने की चुनौती स्वीकारी। नतीजतन, गेहूं व धान की पैदावार उत्तरोत्तर बढ़ी। केंद्र ने इन जिंसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया, जिससे बेशक किसान की जेब में पैसा आने लगा, लेकिन साथ ही खाद-कीटनाशक-बिजली-पानी-डीजल-नये कृषि उपकरणों पर खर्च के रूप में निकलने भी लगा। हिसाब-किताब में किसान वैसे भी सदा कच्चा रहा है और आढ़ती ही उनका बैंक व एटीएम रहे हैं। शादी-उत्सव से लेकर खेती और हर छोटे-बड़े काम के लिए वह अपने आढ़ती से अग्रिम उधार लेते हैं। फसल बिकने पर बकाया चुकता होता है। इस व्यवस्था की कुछ खामियां जरूर हैं, किंतु यह कारगर रही।

मगर सबसे बड़ी विडंबना यह कि बतौर उत्पादक किसान को अपने ही उत्पाद का मूल्य तय करने का हक नहीं है। यह काम सरकार या फिर खरीद एजेंसियां करती हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होने के बावजूद खरीद एजेंसियां गुणवत्ता व अन्य बहाने बनाकर औने-पौने दाम देने को मीन-मेख निकालती।

कालांतर खेती-लागत में बढ़ोतरी, अधिकांश किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य न मिलना, छोटी जोत व बदली जीवनशैली ने कृषक को कर्ज के मकड़जाल में फांसा है। वह किसान समुदाय, जो रिवायती तौर पर ‘वस्तु के बदले वस्तु’ ले-देकर काम चलाता था, उसे नकदी-आधारित व्यवस्था में खुद को ढालना पड़ा और पैसों की अधिक जरूरत पड़ने लगी, जबकि सिर पर पहले ही कई तरह के कर्ज होते थे। कृषक समाज में दिखावटी उपभोगवादी जीवनशैली के तौर-तरीके अपनाने का सामाजिक दबाव बढ़ा। अगली पुश्तों में बंटवारे से खेत सिकुड़ते गए और साल भर जमीन से अनवरत फसलें लेने, रासायनिक खाद और कीटनाशक की अंधाधुंध मात्रा से भूमि की उर्वरता घटती गई। एक भी मामला ऐसा नहीं दिखा, जिसमें खेती की लागत घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से पूरी हो पाए।

गांवों से सरलता गायब होने लगी, तिस पर पंचायती व्यवस्था अपने साथ चौधर की भूख के कारण धड़ेबंदी ले आई। 1960 से शुरुआत याद करूं तो हालांकि गरीबी-तंगी बहुत थी लेकिन किसान की खुदकुशी का एक भी मामला याद नहीं , जबकि आज हर साल हजारों की संख्या में किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। सिर पर चढ़ा कर्जा, नयी जीवनशैली की दौड़ और सामाजिक ताना-बाना भंग होने से यही होता है। क्या खुदकुशी उपरांत दो-एक लाख का मुआवजा किसी जीते-जागते किसान या परिजन की कमी को पूरा कर सकता है? पीछे से उसके खेत कौन संभालेगा (वह भी अगर उधार चुकता करने के बाद बचे तो)? उसके बच्चों का लालन-पालन व शिक्षा का खर्च कौन उठाएगा, और स्वास्थ्य खर्च भी? आज हमें ऐसी रेलगाड़ी देखते हैं, जिसका नामकरण ‘कैंसर-विशेष’ हो गया है। तुर्रा यह कि पिछले दिनों तक सरकारी एम्बुलेंसों पर राजनीतिक आकाओं की तस्वीरें चस्पां थीं (कितने शर्म की बात है)। सत्तारूढ़ कोई भी दल हो, सभी ने महज वादों की झड़ी लगाई है। मैंने वर्ष 1979 में एक मुख्यमंत्री को कहते सुना थाः ‘अमृतसर से मध्य-पूर्वी देशों के लिए विशेष विमानों से सब्जी पहुंचाई जाएगी, जिससे पंजाब को करोड़ों की कमाई होगी।’ यह ‘हवा-हवाई’ उड़ान आज भी शुरू होने को है।

पंजाब में औद्योगिकीकरण नहीं हुआ क्योंकि सरहदी सूबा मान केंद्र ने इसको बढ़ावा देना गवारा नहीं किया, नतीजतन कृषि से इतर वस्तु बनाने वाले बड़े उद्योग पंजाब में स्थापित नहीं हुए। कालांतर किसान का मामूली-सा विकास होकर रह गया। खाद्य सुरक्षा पाने के बाद केंद्र की रुचि सूबे के किसान के विकास में घटती गई। अगले चरण के रूप में जिस संख्या में कृषि आधारित उद्योग-धंधे लगने चाहिए थे, उसे नजरअंदाज किया गया। पंजाबियों ने इसका तोड़ यह निकाला कि विदेशों में जा बसो। लाखों की तादाद में युवा लड़के-लड़कियां बाहरी मुल्कों में जा चुके हैं। हमारी युवा-शक्ति को देश की सबसे बड़ी पूंजी और प्राकृतिक स्रोत माना जाता है, लेकिन अब हमारा घाटा विदेशी मुल्कों का फायदा बन रहा है। अब छोटे शहरों के व्यापारी भी अपना धंधा-जायदाद बेच विदेशों का रुख करने लगे हैं, क्योंकि उनके व्यापारिक हित किसान से जुड़े हैं। धनाढ्य वर्ग भी असुरक्षित महसूस करता है और बच्चों को विदेशों में पढ़ने के लिए भेजने लगा है, जहां पहले उन्हें स्नातकीय शिक्षा के बाद भेजा जाता था, अब स्कूली शिक्षा के बाद भेजा जा रहा है।

पिछले कुछ सालों में सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्योग, छोटे किराना दुकानदार और मजदूर वर्ग की कमर टूट गई है। यह चोट नोटबंदी-जीएसटी-लॉकडाउन के गलत क्रियान्वयन के रूप में पड़ी है, नतीजे में बेरोजगारी बढ़ी और जीडीपी घटी है। आज जब अर्थव्यवस्था में निरंतर गिरावट है, हम तब भी सांस्कृतिक व शिक्षा में प्रयोगबाजी करने में मस्त हैं। अब बात भारत के आखिरी बचे आर्थिक दुर्ग की करें यानी ग्रामीण कृषक वर्ग, जो पहले से काफी संत्रास में है, उसके लिए नये कृषि कानूनों की घोषणा मौत का आखिरी फरमान बनकर आई है। अन्य मुद्दों पर चर्चा छोड़ भी दें तो क्यों अब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य का विकल्प नहीं ढूंढ़ा गया? क्यों एफसीआई पहले की तरह फसल की खरीद नहीं कर रहा? क्यों किसान को लूटने को बड़े व्यापारिक घरानों को खुली छूट दी जा रही है? क्या किसानों की ओर से नये कृषि-कानून बनाने की मांग उठी थी? क्या किसी राज्य सरकार ने इनके लिए गुजारिश की थी? फिर कैसे केंद्र सरकार ने ‘संज्ञान’ लेकर, किसानों के भले के नाम पर एकतरफा निर्णय ले लिया? अब यदि केंद्र कह रहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था बरकरार रहेगी, यदि सच में ऐसा है तो फिर क्यों नहीं इसे नये कानून में बाकायदा शामिल किया गया? आपकी गलत मंशा इसी से जाहिर होती है, क्योंकि वादे तोड़ना आपका इतिहास रहा है। क्यों कर किसान को बड़े घरानों के रहमोकरम पर छोड़ा जा रहा है, जो बेहिचक उनकी जमीन हड़पने लगेंगे? महज दो-ढाई एकड़ का मालिक किसान किसी खरबपति से कैसे कानूनी लड़ाई लड़ पाएगा? किंतु इतना तय है वह अपनी भूमि गंवाने को हरगिज़ तैयार नहीं है क्योंकि यह किसान के लिए सिर की पगड़ी है, जो खुदमुख्तार होने का गर्वीला अहसास है। आगे अब वह इस मुद्दे पर सामूहिक आत्महत्या करने की राह नहीं बल्कि भिड़ने का रास्ता अख्तियार करेगा। किस तरह, यह मुझे नहीं मालूम। विगत का वह ‘अन्नदाता’, जिसने अपनी जमीन को देश का ‘भोजन-थाल’ बना डाला था और खाद्यान्न के लिए विदेशों पर निर्भर रहने वाले भारत को चंद सालों में अतिरिक्त अन्न भंडारों से लबरेज देश बना दिया, आज वह आपके सामने भीख का कटोरा लेकर खड़ा होना गवारा नहीं करेगा। पिछले वक्त को याद कर मैं उम्मीद करता हूं कि नये फरमान किसान का विदाई-रुदन नहीं बन पाएंगे। ऑलीवर गोल्डस्मिथ के इन शब्दों के साथ मैं आपसे विदा लेता हूं :

उस मुल्क की क्या कीजे तारीफ,

अपने शिकार को पहले करते निर्बल,

इक ऐसा मर्ज बनाने को देते दवा,

तगड़ा होए अमीर, गरीब बने निढाल,

फलते-फूलते राजकुमार ओ धन्ना सेठ,

पलभर में राजकृपा से जो हैं बने-मिटे,

पर मेहनती किसान जो है देश का मान,

गर इक बार मिट गया दुबारा न मिल पाएगा।

लेखक मणिपुर के राज्यपाल, यूपीएससी के चेयरमैन और जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक रहे हैं।

सब से अधिक पढ़ी गई खबरें

ज़रूर पढ़ें

संदेह के खात्मे से विश्वास की शुरुआत

संदेह के खात्मे से विश्वास की शुरुआत

चलो दिलदार चलो...

चलो दिलदार चलो...