अभिलाषा की कहानी केवल एक सैन्य अधिकारी की कहानी नहीं, बल्कि उस नए भारत की कहानी है जहां बेटियां सीमाएं नहीं, संभावनाएं देखती हैं। जहां वर्दी केवल ताकत का प्रतीक नहीं, बल्कि संवेदनशील नेतृत्व और मानवीय मूल्यों का चेहरा भी बन रही है।
दुनिया में सैनिकों की पहचान अक्सर युद्ध और सीमाओं से जुड़ी होती है। लेकिन कुछ सैनिक ऐसे भी होते हैं, जो वर्दी पहनकर केवल सुरक्षा ही नहीं देते, बल्कि भरोसा, संवेदनशीलता और उम्मीद भी बांटते हैं। भारतीय सेना में मेजर अभिलाषा बराक आज ऐसी ही पहचान बन चुकी हैं। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें वर्ष 2025 के प्रतिष्ठित ‘यूएन मिलिट्री जेंडर एडवोकेट ऑफ द ईयर अवॉर्ड’ के लिए चुना है।
लेबनान में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के दौरान महिलाओं और किशोरियों के बीच विश्वास निर्माण, संवाद और संवेदनशील नेतृत्व के लिए न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में उन्हें यह पुरस्कार प्रदान किया गया। यह उपलब्धि सिर्फ एक सैन्य अधिकारी की सफलता नहीं है। यह उस भारत की कहानी है, जहां बेटियां अब केवल सपने नहीं देख रहीं, बल्कि दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व भी कर रही हैं।
अभिलाषा बराक का संबंध हरियाणा के रोहतक से है। उनका बचपन सेना के अनुशासन और देशभक्ति के माहौल में बीता। उनके पिता कर्नल एस. ओम सिंह भारतीय सेना में रहे हैं। परिवार की सैन्य परंपरा ने अभिलाषा के व्यक्तित्व को प्रभावित किया। तभी उनके भीतर देशसेवा केवल एक पेशा नहीं, बल्कि जीवन का लक्ष्य बनती चली गई। हालांकि उनका जन्म तमिलनाडु के वेलिंगटन स्थित सैन्य अस्पताल में हुआ, लेकिन परिवार की जड़ें रोहतक से जुड़ी रहीं।
अभिलाषा ने जब भारतीय सेना की पहली महिला कॉम्बैट एविएटर बनकर इतिहास रचा, तब हरियाणा ने उन्हें गर्व के साथ ‘रोहतक की बेटी’ कहा। उन्होंने दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और बाद में चेन्नई की ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी से सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया।
साल 2022 भारतीय सेना के इतिहास में एक अहम मोड़ आया, जब अभिलाषा भारतीय सेना की पहली महिला कॉम्बैट एविएटर बनीं। यह भारतीय सेना के बदलते स्वरूप का प्रतीक भी थी। लंबे समय तक सेना के लड़ाकू और एविएशन विंग को पुरुष प्रधान क्षेत्र माना जाता रहा। महिलाओं की भूमिका सीमित समझी जाती थी। उन्होंने यह साबित किया कि साहस, नेतृत्व और क्षमता का कोई लिंग नहीं होता। उनकी इस उपलब्धि ने देशभर की हजारों लड़कियों को यह संदेश दिया कि अब भारतीय सेना में महिलाओं के लिए कोई ‘सीलिंग’ नहीं बची है।
आज संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं हैं। उनका उद्देश्य संघर्ष प्रभावित समाज में भरोसा बहाल करना भी है। लेबनान में संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल (यूएनआईएफआईएल) के तहत तैनात भारतीय बटालियन में अभिलाषा बराक महिला सहभागिता दल की कमांडर के रूप में कार्यरत हैं। युद्ध प्रभावित इलाकों में महिलाएं और बच्चियां सबसे ज्यादा असुरक्षित होती हैं। ऐसे क्षेत्रों में महिला सैनिकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि वे स्थानीय महिलाओं से ज्यादा सहज संवाद स्थापित कर पाती हैं। अभिलाषा बराक ने लेबनान में महिलाओं और किशोरियों के साथ संपर्क कार्यक्रम चलाए, सामुदायिक गतिविधियों में हिस्सा लिया और शांति सैनिकों को लैंगिक संवेदनशीलता का प्रशिक्षण भी दिया। उन्होंने यह दिखाया कि एक सैनिक केवल सुरक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास का चेहरा भी हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र ने उनके इसी मानवीय नेतृत्व और संवेदनशील कार्यशैली को सम्मानित करने का फैसला किया।
मेजर अभिलाषा बराक इस प्रतिष्ठित सम्मान को पाने वाली भारत की तीसरी महिला अधिकारी हैं। उनसे पहले सुमन गुवानी और राधिका सेन भी संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में अपने उल्लेखनीय कार्यों के लिए सम्मानित हो चुकी हैं। मेजर सुमन गवानी को दक्षिण सूडान में महिलाओं के अधिकारों और सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करने के लिए सम्मान मिला था। वहीं मेजर राधिका सेन ने संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में महिला सुरक्षा और सामाजिक भरोसा कायम करने की दिशा में अहम कार्य किया। अब अभिलाषा बराक का इस सूची में शामिल होना भारतीय महिला सैन्य नेतृत्व की निरंतर बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है।
एक समय था जब हरियाणा को बेटियों के प्रति रूढ़ सोच वाले राज्य के रूप में देखा जाता था। लेकिन आज वही हरियाणा खेल, सेना, विज्ञान और प्रशासन में देश को नई पहचान देने वाली बेटियां दे रहा है। अभिलाषा बराक इसी बदलाव का सबसे मजबूत चेहरा हैं। उनकी उपलब्धि यह भी दिखाती है कि यदि अवसर, शिक्षा और विश्वास मिले तो भारतीय महिलाएं किसी भी क्षेत्र में विश्व स्तर पर नेतृत्व कर सकती हैं। अभिलाषा बराक की सबसे बड़ी ताकत यही है कि उन्होंने सैनिक की कठोर छवि के भीतर मानवीय संवेदना को जीवित रखा। उन्होंने दिखाया कि शांति मिशन केवल सीमाओं की निगरानी नहीं, बल्कि टूटे हुए समाज में भरोसा लौटाने की जिम्मेदारी भी है। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें ‘जेंडर एडवोकेट’ यानी लैंगिक समानता की पैरोकार के रूप में सम्मानित करने का निर्णय लिया।
आज जब युवा पीढ़ी त्वरित सफलता और सोशल मीडिया की चमक से प्रभावित है, तब मेजर अभिलाषा बराक जैसी शख्सियतें यह याद दिलाती हैं कि असली पहचान मेहनत, अनुशासन और सेवा से बनती है। अभिलाषा की कहानी केवल एक सैन्य अधिकारी की कहानी नहीं, बल्कि उस नए भारत की कहानी है जहां बेटियां सीमाएं नहीं, संभावनाएं देखती हैं। जहां वर्दी केवल ताकत का प्रतीक नहीं, बल्कि संवेदनशील नेतृत्व और मानवीय मूल्यों का चेहरा भी बन रही है।

