रहज़नों से गिला नहीं, रहबरी का सवाल

रहज़नों से गिला नहीं, रहबरी का सवाल

गुरबचन जगत

गुरबचन जगत

हाल ही में चंद पंक्तियां नज़र से गुजरीं, साझा कर रहा हूं; देश की मौजूदा स्थिति पर एकदम मौजूं है:-

बाज़ार खाली, सड़कें सूनी

मोहल्ले वीरान हैं

खौफ बरपा है हर तरफ़

लोग हैरान हैं

यह वो खौफ है

जो दुनिया को डराने आया है

इतिहास गवाह है

कि यह मसला भी सुलझ जाएगा

भले ही कोई महान कविता न हो, लेकिन मौजूदा यथार्थ को बयां करती है, लेकिन अंत में सकारात्मकता भी जगाती है। हम, बतौर राष्ट्र, अल्पकाल में इन हालात में कैसे पहंुचे और मुसीबत ने दूसरी बार हमें अधूरी तैयारी के बीच आ घेरा है। कोविड-19 की पहली लहर बहुत ज्यादा प्रलयंकारी नहीं थी और हम अपने सीमित संसाधनों के बावजूद उसे झेल पाए थे। क्योंकि दूसरी लहर के दौरान सरकार की जो कमियां रही हैं, उन पर खूब मीडिया कवरेज हो चुकी है, लिहाजा उन्हें दोहराना बेमानी होगा।

तथापि, मौजूदा त्रासदी की एक सबसे बड़ी वजह है– सरकार में ऊपर से लेकर नीचे तक डींगें हांकना। देश का नेतृत्व कोरोना की पहली लहर से निपटने को लेकर खुद अपनी पीठ थपथपाने में लगा रहा, और इस ‘जीत’ के कसीदे पढ़े जा रहे थे। सत्तारूढ़ भाजपा द्वारा फरवरी, 2021 में जारी किए गए राजनीतिक घोषणापत्र में बताया गया ‘कोविड महामारी के दौरान भारत ने कोविड से कैसे निपटें दिखाकर दुनिया के सामने उदाहरण पेश किया।’ हमने दावा किया कि हम ऐसी वैक्सीन बनाने वाले हैं, जिससे सारी दुनिया को बचाया जा सकता है। हालांकि, यह ठीक है कि दूसरे देशों द्वारा विकसित की गई वैक्सीन का उत्पादन करने की सबसे बड़ी क्षमता भारत के पास है और विश्वभर को हम बनाकर दे सकते हैं। जब सरकार की कोताहियों की आलोचना विदेशी अखबारों में होने लगी, तब हमारे विदेश मंत्री ने पश्चिमी मीडिया को बताया कि भारत सरकार चंद विदेशी अखबारों के हुक्म पर चलने को बाध्य नहीं है, यदि कोई सरकार हमें ‘धकियाने’ की कोशिश करेगी तो हम उलटा उसे ‘धकिया’ देंगे। साथ ही उन दावों को दोहराया, जिसमें देश को नया ‘आर्थिक पॉवरहाउस’ बनने के अलावा ‘विश्वगुरु’ बनने का दंभ भरा जाता है। हमने अपनी सैन्य शक्ति को लेकर भी डींग हांकी कि चीन की घुसपैठ वाली हरकत को निष्फल कर दिया है, जबकि आज भी वह वहीं जमा बैठा है। सत्तारूढ़ दल के चोटी के मंत्री-राजनेता विपक्ष की छीछालेदर करने में ऐसे व्यस्त रहे कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सुझावों के प्रत्युत्तर में उनका मजाक उड़ाता पत्र लिखा। संक्षेप में, कोरोना पर ‘जीत’ की खुमारी तारी थी और डींगें हांकना भारी पड़ा।

विशेषज्ञों ने चेताया था कि कोविड-19 की दूसरी लहर जल्द आ सकती है और ज्यादा खतरनाक होगी, इसके बावजूद एक के बाद एक राज्यों ने कोरोनारोधी तंत्र को कमतर कर दिया था। 26 अप्रैल को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुखपृष्ठ पर छपी खबर में बताया गया है कि कैसे दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड, बिहार इत्यादि सूबों ने साल की शुरुआत से कोविड संबंधी अतिरिक्त प्रबंधन और कोविडरोधी संहिता पालन को इस मुगालते में आकर कमतर करना शुरू कर दिया था मानो महामारी का अंत हो चुका है। अस्थाई अस्पतालों को बंद कर दिया और अनुबंध पर रखे गए स्वास्थ्य कर्मियों को हटा दिया गया। भावी आपातस्थिति के लिए जरूरी विशिष्ट स्वास्थ्य तंत्र जैसे कि वेंटिलेटर, मेडिकल ऑक्सीजन, आईसीयू बिस्तर संख्या, स्टाफ और अतिरिक्त अस्थाई अस्पतालों की संख्या बढ़ाने की ओर बहुत कम प्रयास किए गए। जबकि राज्यों को दूसरी लहर को निशि्चत जानकर निपटने हेतु समांतर योजनाएं अलग से तैयार रखनी चाहिए थीं–आखिरकार स्वास्थ्य क्षेत्र राज्यों का विषय है। उधर केंद्र सरकार को भी तकनीकी उपकरणों और अन्य बुनियादी ढांचा विकास हेतु तमाम आवश्यकताओं के मद्देजनर राष्ट्रीय कार्य-योजना बनाकर पहले से तैयार रहना चाहिए था, खासकर जब वैक्सीन के आवंटन-नियंत्रण और इसमें जरूरी धन के लिए राज्य सरकारें पूरी तरह से केंद्र पर निर्भर हों।

स्वास्थ्य क्षेत्र हेतु केंद्र सरकारों ने हमेशा कंजूसी दिखायी, यहां तक कि कोरोना काल के बाजजूद मौजूदा बजट में यह मद कुल आर्थिकी का महज 2 फीसदी रखी गई। लिहाजा, जब कोविड-19 की सुनामी ने देश को हिला डाला और राज्य सरकारों की ओर से ज्यादा आपातकालीन मांग होने लगी, खासकर ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, वैक्सीन इत्यादि की, तो वे केंद्र के पास नहीं थे, क्योंकि वक्त रहते राष्ट्रीय योजना नहीं बनी। हमारे पास पर्याप्त वैक्सीन थी, लेकिन विदेश मंत्रालय की महत्वाकांक्षी ‘वैक्सीन-डिप्लोमेसी’ से अभिभूत केंद्र सरकार ने बहुत-सा हिस्सा विदेशी मुल्कों को दान दे दिया। कोरोना-प्रबंधन पर बढ़िया करने के दावे और जीत के दंभ के चलते हम अन्य देशों की मदद पर आश्रित हैं। कुछ देश पहले मदद को तैयार नहीं थे लेकिन स्थिति की विकरालता देखकर अब सहायता भेजने लगे हैं। इस विफलता हेतु विदेशी मीडिया ने हमारे राजनीतिक नेतृत्व, खासकर प्रधानमंत्री, को आड़े हाथों लिया। प्रतिष्ठित मीडिया द्वारा की गई कवरेज को झुठलाने का कोई फायदा नहीं होगा, बेशक उनके आगे कोर्निश करने की जरूरत नहीं लेकिन बिला वजह नकारना भी ठीक नहीं।

इसी बीच, कोविड महामारी घटने के बजाय लगातार विकराल होती जा रही है। हमें सबक लेकर सुधार के कदम उठाने होंगे क्योंकि अब तीसरी-चौथी लहर आने की बात है। हम कठिन स्थिति का सामना कर रहे हैं, हमें तैयारियों को बढ़ाना होगा। जो कुछ हम खुद बना सकते हैं या आयात कर सकते हैं, जहां स्टाफ बढ़ाना हो, वह किया जाए। केंद्र और राज्य सरकारों को आपदा को अवसर की तरह लेकर स्वास्थ्य तंत्र को सुधारना चाहिए। गरीबों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा और बच्चों हेतु अच्छी शिक्षा की दरकार रही है। इस ध्येय की पूर्ति के लिए केंद्र को अपनी छवि चमकाने जैसे काम, मसलन, विशाल मूर्तियां बनाने और पार्लियामेंट विस्टा जैसे गैरजरूरी फिजूलखर्ची रोककर, राज्यों को खुलकर आर्थिक मदद देनी चाहिए, क्योंकि युद्धकालीन संकट जैसी महामारी में इन योजनाओं का कोई फौरी लाभ नहीं है।

रहा सवाल जिम्मेवारी व जवाबदेही तय करने का, मैंने अभी तक इस बारे में कहीं नहीं पढ़ा है। जबकि यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है, क्योंकि महामारी ने देश के लाखों नागरिकों की जानें लील ली हैं और लाखों-लाख लोगों का शहरों के अस्पतालों में भर्ती होने का आंकड़ा है (ग्रामीण इलाके का डाटा बहुत कम उपलब्ध है)। मैंने अभी तक किसी बड़े राजनेता की अस्पताल या प्रभावित इलाके में दौरे की तस्वीर भी नहीं देखी है। चूंकि इन ‘माननीयों’ में अधिकांश खुद को तरजीह पर वैक्सीन के दोनों टीके लगवाकर पूरी तरह महफूज़ हो चुके हैं, लिहाजा पीपीई किट और मास्क पहनकर अस्पताल का दौरा तो कर ही सकते हैं, इससे वहां सेवा में लगे स्टाफ और मरीजों का मनोबल बढ़ता है। लेकिन हमें डॉ. मनमोहन सिंह के पत्र के उत्तर में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री की भोंडी प्रतिक्रिया के सिवा कुछ देखने को नहीं मिला। जब पिछले साल स्थिति कुछ बेहतर थी तब स्वास्थ्य मंत्रालय के नौकरशाह रोजाना टेलीविज़न पर कोविड की ताजा स्थिति के बारे में बताया करते थे। लेकिन दूसरी लहर में वे चेहरे दिखाई नहीं दिए, खासकर अग्रिम पंक्ति में, जहां हमें सड़कों-अस्पतालों-श्मशान घाट के बाद सड़कों पर बिलबिलाते नागरिक या शवों की पंक्ति देखने को मिल रही है। यहां तक कि स्वास्थ्य मंत्री, जो स्वयं एक डॉक्टर हैं, वे भी कम ही दिखाई दिए हैं। मुझे उम्मीद थी कि सभी सांसद अपने क्षेत्र में नागरिकों के भलाई-कार्यों की स्वयं निगरानी करेंगे।

इसी तरह, राज्यों की जिम्मेवारी और भी ज्यादा है। अब तक तो मुख्यमंत्री-विधायकों को अपने क्षेत्र में काम करते दिखाई देना चाहिए था। सचिवालय में बैठने वाले नौकरशाह, जिलाधीश, पुलिस अधीक्षकों को भी कार्यक्षेत्र में दिखाई देना चाहिए था। आखिर वे अपने राजकीय या जिला मुख्यालयों में बैठकर कर क्या रहे हैं? यदि ये सब इस मुश्किल घड़ी में लोगों के बीच खड़े हुए दिखाई नहीं दे रहे तो क्या चुनाव के वक्त ही नमूदार होंगे? जिस एक बड़े तबके का इस्तेमाल इस मुसीबतज़दा वक्त में किया जाना लाभदायक रहता, वह है, सभी राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं का इकट्ठा होकर जनसेवा में लगना। कहने को भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास सबसे बड़ा, अनुशासित काडर है, जिसका बखूबी उपयोग हो सकता था, अफसोस, उनकी सेवाएं पश्चिम बंगाल के चुनाव में लेने को तरजीह दी गई। यही बात अन्य दलों पर भी लागू है।

आखिर में, केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेवारी तय की जाए, खासकर संबंधित विभाग से जुड़े नौकरशाहों और राजनेताओं की और कोताही करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो। सभी को संदेश दिया जाए कि ‘सब चलता है वाला रवैया’ और ज्यादा स्वीकार्य नहीं है, काम न करने वालों को निकाल बाहर किया जाए। केंद्र और राज्य सरकारों की आपराधिक गलती के कारण ही इतने बड़ी स्तर की त्रासदी देश भुगत रहा है और इस चूक के लिए उनको अदालत में घसीटा जाना बनता है। जहां तक देश के नेतृत्व का संबंध है, इस बारे में शहाब ज़ाफरी का शे’र याद आ रहा है

‘तू इधर-उधर की न बात कर,

यह बता कि काफिला क्यूं लुटा

मुझे रहज़नों से गिला नहीं

तेरी रहबरी का सवाल है!’

लेखक मणिपुर के राज्यपाल, संघ लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष एवं जम्मू-कश्मीर में पुलिस महानिदेशक रहे हैं।

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