जीवन की सार्थकता भावनाओं से पलायन करने में नहीं, बल्कि उन्हें उस राह में रूपांतरित करने में है, जो अंतर्मन के अंधेरे से निकलकर शाश्वत प्रकाश की ओर जाती हो।
पहाड़ों या घने जंगलों में लोगों के सतत आवागमन से कुछ रास्ते स्वतः ही बन जाते हैं। इन्हें हम पगडंडी कहते हैं। इनमें कुछ पगडंडियां सुगम होती हैं, जिन पर चलना आसान होता है। वहीं कुछ इतनी संकरी और उबड़खाबड़ होती हैं कि उन पर चलना एक चुनौती बन जाता है। कुछ पगडंडियां हमें हमारे गंतव्य स्थल तक पहुंचाती हैं तो कुछ भटकाव की भूल-भुलैया में छोड़ देती हैं।
दरअसल, मानवीय भावनाओं का संसार भी कुछ ऐसी ही पगडंडियों से बना होता है। प्रसन्नता की पगडंडी हमें खिले हुए फूलों जैसी दुनिया में ले जाती है, जहां सौंदर्य के रिश्तों की अनूठी छटा बिखरी होती है। वहीं दुख की राह किसी घने अंधेरे जंगल में ले जाती है, जहां केवल निराशा और हताशा का वास होता है। भय की राहों पर आशंकाओं के कांटे बिछे होते हैं, तो क्रोध की राह अंगारों से दहक रही होती है।
यहां प्रश्न उठता है कि आखिर भावनाओं की इन पगडंडियों का उद्गम स्थल कहां है? कहां से यह कारवां शुरू होता है? आधुनिक विज्ञान मानता है कि भावनाओं का जन्म हमारे मस्तिष्क में होता है। मस्तिष्क में स्थित ‘लिम्बिक सिस्टम’ भावना का केंद्र होता है। इसमें विशेष रूप से अमिगडाला की भूमिका प्रमुख होती है, जो भय, क्रोध और आनंद जैसी तत्काल भावनाओं को जन्म देता है। साथ ही डोपामिन, सेरोटोनिन और ऑक्सिटोसिन जैसे रसायनों से भावनाओं का निर्धारण करता है।
मनोविज्ञान इस विमर्श को थोड़ा सूक्ष्म रूप में परिभाषित करता है। इसके अनुसार भावनाएं हमारे विचारों से जन्म लेती हैं। अवचेतन मन में दबी हुई इच्छाएं, पुरानी यादें और गहरे संस्कार सुप्त अवस्था में रहते हैं, जो अचानक किसी उत्प्रेरक के मिलने पर भावना के रूप में फूट पड़ते हैं। कई बार किसी घटना के प्रति हमारा नजरिया भी भावनाओं को जन्म देता है। भारतीय दर्शन और अध्यात्म इसे और गहराई से देखता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने कहा है कि भावनाओं का असली घर हमारा चित्त है, जो एक गहरे सरोवर की तरह है। इस सरोवर की तलहटी में हमारे पुराने संस्कार और वृत्तियां जमा रहती हैं। जैसे शांत सरोवर में कंकड़ फेंकने से लहरें उठती हैं, वैसे ही संस्कारों के इस मानस सरोवर में जब बाहरी दुनिया का कोई विषय स्पर्श करता है, तो जो कंपन होता है, वही भावनाएं हैं और यहीं से जन्म होता है -भावनाओं की पगडंडी का।
भावनाओं की पगडंडी के निर्माण के संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक 62 में भी एक श्लोक मिलता है— ‘पहले मन में किसी विषय का चिंतन होता है, चिंतन से उस विषय में आसक्ति पैदा होती है। आसक्ति से कामना जन्म लेती है और जब कामना पूरी नहीं होती या उसमें बाधा पड़ती है, तो क्रोध जन्म लेता है। और इस तरह क्रोध की भावना की पगडंडी का निर्माण होता है।’
दरअसल, इन पगडंडियों पर चलते हुए अक्सर हम दिशा-भ्रमित हो जाते हैं। भावनाओं की जटिलता से निपटने के लिए अक्सर हमारी सहज प्रतिक्रिया उनके ‘दमन’ की हो जाती है। बचपन से ही हमें ‘क्रोध न करने’ या ‘आंसू रोकने’ का प्रशिक्षण दिया जाता है। हम समझते हैं कि भावनाओं का दमन कर देने से हम संयमित कहलाएंगे। जबकि सच्चाई यह है कि भावनाओं का जबरन दमन, बहते पानी पर कच्चा बांध बनाने जैसा है, जिसमें पानी क्षणिक रूप से रुक सकता है, परंतु उसका बढ़ता दबाव अंततः किसी घातक मानसिक विस्फोट का कारण बनता है। तो फिर अप्रिय भावनाओं से निपटने का समाधान अगर दमन नहीं है तो दूसरा सही मार्ग क्या है? उत्तर है- ‘उदात्तीकरण’।
यहां यह समझना जरूरी है कि भावना, मूल रूप से, केवल एक ‘ऊर्जा’ है। विज्ञान का नियम है कि ऊर्जा को न तो पैदा किया जा सकता है और न ही नष्ट, उसे केवल रूपांतरित किया जा सकता है। ठीक इसी तरह, हमारी भावनाएं न अच्छी होती हैं, न बुरी; वे सिर्फ एक शक्ति हैं जो प्रवाहित होना जानती हैं। जीवन की कला इस पगडंडी को अवरुद्ध करने में नहीं, बल्कि इसकी दिशा ऊंचाई की ओर मोड़ देने में है। जब भावना की दिशा बदलती है, तो वही ऊर्जा जो पतन का कारण बन सकती थी, उत्थान का आधार बन जाती है।
इतिहास गवाह है कि जब-जब मनुष्य ने अपनी भावनाओं की दिशा बदली है, तब-तब साधारण व्यक्ति महामानव बना है। तुलसीदास जी का पत्नी के प्रति घोर ‘मोह’, उसके कर्कश व्यवहार से उनके चिंतन की दिशा बदलते ही शाश्वत ‘भक्ति’ में परिणत हो गया।
वस्तुतः भावनाएं हमारे अस्तित्व का शाश्वत सत्य हैं। उनसे मुख मोड़ना, उनसे भयभीत होना या उन्हें शत्रु मानकर लड़ना व्यर्थ है। जो पगडंडी गहन अंधकार की ओर जाती है, सजगता और दिशा बदलते ही, वही प्रकाश के शिखर तक भी पहुंचा सकती है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम आवेग में बहने के बजाय, उस ऊर्जा को सृजन में रूपांतरित कर सकें। निःसंदेह, जीवन की सार्थकता भावनाओं से पलायन करने में नहीं, बल्कि उन्हें उस पगडंडी में रूपांतरित कर देने में है, जो अंतर्मन के अंधेरे से निकलकर शाश्वत प्रकाश की ओर जाती हो।

