हिमालयी युद्ध को गौण लक्ष्य मानना चीन की दूरगामी सुरक्षा रणनीति के तहत है। वह भारत से युद्ध में उलझकर अपने संसाधन व ध्यान नहीं बंटाना चाहता। वजह, चीन की मुख्य स्पर्द्धा अमेरिका से है। उसका ध्यान यूरेशिया, समुद्री व्यापार मार्गों व तकनीकी वर्चस्व पर है। भारत को दक्षिण एशिया में पाक से उलझाना भी समुद्री क्षेत्र से भटकाने के लिए है। सीमा पर छोटे-मोटे टकराव दबाव बनाने के लिए हैं।
चीन का उद्भव बिना तैयारी के नहीं हुआ है; यह एक सुसंगत बृहद रणनीति परिलक्षित करता है जिसका उद्देश्य समय के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रभुत्व को कम करना है। वह रणनीति भौगोलिक रूप से चरणों में बंटी हुई है — पहले यूरेशिया और उन समुद्री मार्गों पर ध्यान केंद्रित करना जो चीन की अर्थव्यवस्था को कायम रखते हैं, न कि सीमावर्ती ज़मीनी युद्धों पर। इसके आलोक में देखें तो भारत के साथ हिमालयी सीमा एक गौण मुद्दा है। वहां पर बड़े पैमाने का युद्ध चीन को अपने मूल उद्देश्यों में आगे बढ़ने में बहुत कम मददगार रहेगा, और असल में, नुकसानदेह हो सकता है।
चीन के आधिकारिक दस्तावेज़ प्राथमिकता के क्रम का उतना ही खुलासा करते हैं जितना छिपाकर जता जाते हैं। ‘नए दौर में चीन की राष्ट्रीय रक्षा’ (2019) या ‘सैन्य रणनीति दिशानिर्देश, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (2015)’, और एक के बाद एक आई पार्टी संसदीय रिपोर्टें सुरक्षा को शासन के अस्तित्व, तकनीकी स्वायत्तता और महा-शक्ति प्रतिस्पर्धा जैसे शब्दों में परिभाषित करती हैं। रणनीतिक दिशा स्पष्ट है : समुद्री आवाजाही मार्गों में बनने वाले जोखिम, ऊर्जा और व्यापार के पहुंच मार्गों की सुनिश्चितता और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी हस्तक्षेप को रोकने की क्षमता बनाना। भारत का नाम खतरे के तौर पर नहीं लिया गया है। यह कोई अनदेखी नहीं; प्राथमिकताओं का निर्धारण है।
चीन की समृद्धि समुद्री व्यापार पर निर्भर करती है जो असुरक्षित ‘चोकपॉइंट्स’ (संकरे समुद्री रास्तों) से होकर गुज़रता है-ये मलक्का जलडमरूमध्य से लेकर बृहद हिंद-प्रशांत क्षेत्र, होर्मुज़ जलडमरूमध्य और स्वेज़ नहर तक हैं। इसलिए, इसके सैन्य आधुनिकीकरण का ध्यान नौसैन्य शक्ति सुदृढ़ता, बाधित पहुंच/प्रतिबंधित क्षेत्र स्थिति का उपाय और अंतरिक्ष, साइबर एवं इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में क्षमताओं पर केंद्रित है। इसके समांतर, सरकारी आर्थिक कूटनीति का उद्देश्य निर्यात में प्रभुत्व, बुनियादी ढांचा निर्माण, सपंर्क सुविधाएं और वित्तीय निवेश के माध्यम से यूरेशिया को नया रूप देना है।
आज जहां लंदन की सड़कों पर दौड़ती एक लोकप्रिय कार लैंड रोवर का सस्ता चीनी संस्करण मौजूद है वहीं जर्मनी की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी फॉक्सवैगन हजारों कर्मचारियों की छंटनी करने की योजना बना रही है। बढ़ती लागत के मद्देनज़र, सीमेंस जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां उत्पादन को चीन स्थानांतरित करने पर विचार कर रही हैं, जिससे उनके वित्तीय लाभ में तो सुधार हो जाएगा, लेकिन समाज को नुकसान पहुंचेगा। यह सब यूरेशिया में समुद्र नीत और पश्चिम नीत रणनीति की ओर इशारा करता है, न कि दक्षिण-नीत हिमालय में। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि बीजिंग किस चीज़ से बचना चाहता है : दो मोर्चों पर रणनीतिक दुविधा। उसकी मुख्य प्रतिस्पर्धा समुद्री क्षेत्र में अमेरिका के साथ है। भारत के साथ कोई बड़ा उपमहाद्वीपीय युद्ध शुरू करने से संसाधन और ध्यान बंट जाएंगे, बाहरी दखल बढ़ेगा और भारत को अमेरिका के और करीब आने का खतरा पैदा होगा- इससे वही गठबंधन विशेष मजबूत होगा, जिसे चीन कमजोर करना चाहता है। भारत के मामले में चीन की सैद्धांतिक चुप्पी का कारण डर नहीं, बल्कि समझदारी का हिस्सा है।
इसलिए, भारत को साधने के लिए चीन की नीति अपरोक्ष और किफायती तरीका अपनाती है। दशकों से, उसने व्यवस्थित रूप से पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को मजबूत किया -जिसमें पारंपरिक युद्धक तंत्र,मिसाइल फोर्स, परमाणु क्षमता और उपग्रह प्रदत्त सुविधाओं तक पहुंच जैसी सहायक तकनीकें शामिल हैं। इसका मकसद यह यकीनी बनाना है कि भारत अपने सुरक्षा संबंधी गुणा-भाग का दायरा दक्षिण एशिया तक ही रखे और यह सुनिश्चित करना कि भारत का ध्यान लगातार अपनी पश्चिमी सीमा पर बना रहे। इससे समुद्री क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने में भारत की क्षमता सीमित हो जाती है, जहां भूगोल उसे हिंद महासागर के अहम समुद्री मार्गों पर एक अपरोक्ष फायदा देता है-एक ऐसा लाभ जो, चरम स्थिति में, चीन की ऊर्जा जीवनरेखा और समृद्धि के लिए खतरा बन सकता है। 1962 का युद्ध पूर्व उदाहरण पेश करता है। चीन ने सीमित राजनीतिक लक्ष्य हासिल किए और फिर एकतरफा तौर पर पीछे हट गया। सार्वजनिक किए गए सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि युद्ध से छह महीने पहले माओ ने अपने सेना कमांडर को बुलाकर चार शब्दीय निर्देश दिया थाः ‘भारत को सबक सिखाओ’। सबक क्या था? माना जाता है, ‘कन्फ्यूशियस संहिता’ के अनुसार भारत को उसकी ‘जगह दिखाना’, न कि इलाके पर कब्जा। आज, लद्दाख जैसे इलाकों में, चीन पहले से ही उस जमीन पर नियंत्रण रखे हुए है, जिसे वह रणनीतिक रूप से अहम मानता है। प्रभुत्व बनाने का सिद्धांत हिमालयी सीमा पर और बड़े पैमाने पर इलाके पर कब्जे की जरूरत का संकेतक नहीं है।
मौजूदा भंगिमाएं निरंतर इस नजरिए को दर्शाती हैं। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ‘स्थानीय युद्ध’ जैसी स्थिति में सीमित, फुर्तीले और कम समय तक चलने वाले टकराव की तैयारी कर रही है-जिसका मकसद बातचीत के दौरान दबाव बनाना, लड़ाई रोकना और अपनी शर्तों पर बातचीत करवाना है। तिब्बत में बुनियादी ढांचा निर्माण और समय-समय पर आमने-सामने की स्थिति पैदा करना मोल-भाव करने की ताकत को बढ़ाता है। बाकी सभी देशों के उलट, चीन की युद्ध संबंधी मुख्य रणनीति विरोधी को धोखे में रखना है। भारत की ज़मीन में घुसपैठ का खतरा भी ठीक इसी रणनीति का हिस्सा है। यूरेशिया से बाहर चीन के अनुभव ने उसकी सावधानी को और बढ़ाया है। लैटिन अमेरिका, खासकर वेनेजुएला जैसे इलाकों में कदम रखने से उन्हें पता चला कि अमेरिका के पारंपरिक प्रभाव वाले क्षेत्र में ज़रूरत से ज़्यादा दखल के क्या खतरे हो सकते हैं। आर्थिक जोखिम और राजनीतिक अस्थिरता ने उन्हें एक सरल सबक सिखाया है: बृहद वैश्विक मुकाबलों के बारे में सोचने से पहले यूरेशिया और आस-पास के समुद्रों में अपना प्रभाव पुख्ता करो। अमेरिका के दबदबे को चुनौती देने की उनकी योजना इसलिए चरणों में बंटी हुई और सीमित है।
हिमालय में फुल स्केल वॉर इस तर्क के उलट जाता है। इससे आर्थिक स्थिरता बिगड़ेगी, टकराव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फैल जाएगा और बाहरी ताकतों के इसमें शामिल होने का खतरा पैदा हो जाएगा। इससे यूरेशिया में स्थिरता लाने वाली आर्थिक ताकत के तौर पर चीन ने अपनी जो छवि बहुत मेहनत से बनाई है, उसे नुकसान पहुंचेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे प्रतिद्वंद्विता के मुख्य मंच-यानी समुद्री और तकनीकी प्रतिस्पर्धा, जो इक्कीसवीं सदी में ताकत का संतुलन तय करेगी-उससे ध्यान भटक जाएगा। बीजिंग की ज़मीनी रणनीति यह है कि हथियारों से लैस पाकिस्तान के ज़रिए भारत को उलझाए रखो और भारत को समुद्री ताकत के तौर पर मज़बूत होने से रोको। निष्कर्ष सीधा है। चीन एक बृहद रणनीति सोचे हुए है और वह अपनी प्राथमिकताओं को लेकर अनुशासित है। वह उन जगहों पर ध्यान साधकर करके अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का स्वरूप बदलना चाहता है जहां दांव सबसे बड़ा है : यूरेशिया और समुद्री क्षेत्र। इस योजना के अंदर, भारत एक ऐसा अवयव है जिसे काबू में रखना और संभालना है, न कि मुख्य दुश्मन।
हिमालयी क्षेत्र में युद्ध चीन को अपने लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के बजाय उसे नुकसान पहुंचाएगा। अंतिम विश्लेषण में, बृहद मुकाबले वाले परिदृश्य में उसके लिए यह कम ध्यान देने योग्य मुद्दा है।
लेखक पूर्व सहायक नौसेना प्रमुख हैं।

